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पेसा नियमावली 2025 (4) :  बाजार, मेला व जतरा के प्रबंधन को लेकर गंभीर सवाल

पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) झारखंड नियमावली, 2025 (PESA नियमावली 2025) के नियम 34 (i) और 34 (ii) को लेकर आदिवासी समाज और पारंपरिक ग्राम व्यवस्था पर गहरा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है. इन नियमों के तहत ग्राम सभा को अपने क्षेत्र में स्थित सभी बाजारों, मेलों और पारंपरिक जतराओं के नियंत्रण और प्रबंधन का अधिकार दिया गया है. लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यह अधिकार राजस्व गांव की ग्राम सभा के पास होगा या टोला स्तर पर गठित ग्राम सभाओं के पास.
 


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देव कुमार धान


पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) झारखंड नियमावली, 2025 (PESA नियमावली 2025) के नियम 34 (i) और 34 (ii) को लेकर आदिवासी समाज और पारंपरिक ग्राम व्यवस्था पर गहरा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है. इन नियमों के तहत ग्राम सभा को अपने क्षेत्र में स्थित सभी बाजारों, मेलों और पारंपरिक जतराओं के नियंत्रण और प्रबंधन का अधिकार दिया गया है. लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यह अधिकार राजस्व गांव की ग्राम सभा के पास होगा या टोला स्तर पर गठित ग्राम सभाओं के पास.

 

ग्रामीणो का मनना है यदि नियम 34 (i) और 34 (ii) को PESA नियमावली 2025 के नियम 2 (छ), 3, 4, 5 तथा प्रपत्र 1 और प्रपत्र 2 के साथ पढ़ा जाए, तो तस्वीर और भी चिंताजनक हो जाती है. इन प्रावधानों के तहत हर टोले को अलग ग्राम सभा और अलग गांव के रूप में मान्यता पाने का अवसर दिया गया है.

 

ऐसी स्थिति में जिन टोलों के भौगोलिक क्षेत्र में बाजार, मेला या पारंपरिक जतरा स्थित हैं, वे खुद को अलग गांव घोषित कर इनका पूरा नियंत्रण अपने हाथ में ले सकते हैं.

 

अब तक परंपरागत रूप से राजस्व गांव की ग्राम सभा और सभी टोलों के हित में बाजारों, मेलों और जतराओं का संचालन और प्रबंधन करती रही है. यह व्यवस्था आदिवासी समाज की सामूहिक संस्कृति, रीति-रिवाज और साझा संसाधनों पर आधारित रही है.

 

लेकिन नए नियमों के तहत टोले अलग होकर मूल राजस्व गांव से नाता तोड़ सकते हैं और अन्य टोलों के लोगों को इन पारंपरिक आयोजनों के प्रबंधन से वंचित कर सकते हैं.

 

आलोचकों का आरोप है कि PESA नियमावली 2025 के ये प्रावधान भ्रष्ट, लालची और आदिवासी विरोधी ताकतों को गांव-गांव में आदिवासी समाज को बांटने का अवसर देते हैं. इससे न केवल पारंपरिक ग्राम व्यवस्था कमजोर होगी, बल्कि आदिवासी रीति-रिवाज, सामाजिक एकता और सामुदायिक नियंत्रण व्यवस्था भी टूट सकती है.

 

इसलिए यह निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि PESA नियमावली 2025 के नियम 2 (छ), 3, 4, 5, प्रपत्र 1, प्रपत्र 2 तथा नियम 34 (i) और 34 (ii), मूल PESA अधिनियम 1996 की भावना और उद्देश्यों के अनुरूप नहीं हैं और इन पर पुनर्विचार आवश्यक है.

 

लेखक मांडर के पूर्व विधायक और बिहार सरकार में मंत्री रह चुके हैं...

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