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PESA नियमावली 2025 (2) : पारंपरिक गांवों की सीमाएं और आदिवासी स्वशासन पर संकट

पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) झारखंड नियमावली, 2025 (PESA नियमावली 2025) के कुछ प्रावधानों को लेकर आदिवासी समाज और सामाजिक चिंतकों में गहरी चिंता उभरकर सामने आ रही है. नियमावली के नियम 2(छ), 3, 4, 5 तथा प्रपत्र 1 और प्रपत्र 2 के तहत जिला उपायुक्त को पांचवीं अनुसूचित क्षेत्रों में मौजूदा राजस्व गांवों के टोलों से अलग ग्राम सभा और नए गांव बनाने से जुड़े दावों पर विचार करने, उन्हें मान्यता देने और उनकी सीमाएं तय करने का अधिकार दिया गया है.
 
  • PESA नियमावली 2025 : पारंपरिक आदिवासी ग्राम व्यवस्था पर मंडराता खतरा

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देव कुमार धान


पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) झारखंड नियमावली, 2025 (PESA नियमावली 2025) के कुछ प्रावधानों को लेकर आदिवासी समाज और सामाजिक चिंतकों में गहरी चिंता उभरकर सामने आ रही है. नियमावली के नियम 2(छ), 3, 4, 5 तथा प्रपत्र 1 और प्रपत्र 2 के तहत जिला उपायुक्त को पांचवीं अनुसूचित क्षेत्रों में मौजूदा राजस्व गांवों के टोलों से अलग ग्राम सभा और नए गांव बनाने से जुड़े दावों पर विचार करने, उन्हें मान्यता देने और उनकी सीमाएं तय करने का अधिकार दिया गया है.


झारखंड की जमीनी हकीकत के अनुसार, यह प्रावधान झारखंड की पारंपरिक आदिवासी ग्राम व्यवस्था से गंभीर टकराव की स्थिति पैदा कर सकता है. आदिवासी समाज ने ब्रिटिश शासन द्वारा किए गए सर्वे और सेटलमेंट से पहले ही अपने गांवों की सीमाएं निर्धारित कर ली थीं.

 

पिछले लगभग 175 वर्षों से विभिन्न राजस्व सर्वेक्षणों और बंदोबस्ती के दौरान इन्हीं सीमाओं को मान्यता मिलती रही है. राजस्व रिकॉर्ड में प्रत्येक गांव की पहचान अलग थाना नंबर से होती है, जबकि एक गांव के अंतर्गत कई टोले होते हैं और सभी टोले उसी मूल गांव के थाना नंबर से जुड़े होते हैं. टोलों का अलग थाना नंबर नहीं होता. 

 

अब PESA नियमावली 2025 के तहत यदि मौजूदा टोलों को नए गांव के रूप में मान्यता दी जाती है, तो कई अहम सवाल खड़े होते हैं. क्या इन नए गांवों की सीमाएं मौजूदा राजस्व गांवों से अलग होंगी? क्या उन्हें नए थाना नंबर दिए जाएंगे? यदि टोलों को अलग कर नए गांव बनाए जाते हैं, तो क्या पुराने राजस्व गांवों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करना पड़ेगा?

 


इसके साथ ही यह आशंका भी जताई जा रही है कि क्या मौजूदा परगना और पड़हा जैसी पारंपरिक प्रशासनिक सीमाओं को दोबारा पुनर्गठित (बनाया) किया जाएगा या नए परगना और पड़हा बनाने पड़ेंगे. ऐसी स्थिति में पारंपरिक मानकी, मुंडा, हातु मुंडा, महतो, डोकलो सोहोर जैसे पारंपरिक मुखियाओं के अधिकार क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं. भूमि राजस्व संग्रह, विवाद निपटारे और सामाजिक प्रशासन में उनकी पारंपरिक भूमिका कमजोर पड़ने का गंभीर खतरा है.


आदिवासी समाज के जानकारों का मानना है कि इन प्रावधानों के लागू होने से पारंपरिक आदिवासी गांव, समुदाय, गांव समाज, रीति-रिवाज और परंपरागत स्वशासन व्यवस्था को गहरा आघात पहुंच सकता है. उनका स्पष्ट मत है कि PESA नियमावली 2025 के नियम 2(छ), 3, 4, 5 तथा प्रपत्र–1 और प्रपत्र–2, PESA अधिनियम 1996 की मूल भावना और उद्देश्यों के अनुरूप नहीं हैं. 
इसी पृष्ठभूमि में इन नियमों पर पुनर्विचार की मांग तेज होती जा रही है, ताकि आदिवासी समाज की ऐतिहासिक पहचान, पारंपरिक सीमाएं और स्वशासन व्यवस्था सुरक्षित रह सके.

 

 

लेखक मांडर के पूर्व विधायक और बिहार सरकार में मंत्री रह चुके हैं

 

 

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