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PESA नियमावली 2025(5): ग्राम सभा के अधिकारों पर खतरे की घंटी

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देव कुमार धान

 

अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को सशक्त बनाने के उद्देश्य से बनाए गए पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) की मूल भावना से झारखंड की PESA नियमावली 2025 भटकती हुई नजर आ रही है. नियमावली के कुछ प्रावधान न केवल ग्राम सभा की शक्तियों को कमजोर करते हैं, बल्कि आदिवासी स्वशासन, परंपरागत व्यवस्था और सामुदायिक अधिकारों पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं.


PESA नियमावली 2025 के नियम 21 (क) और 21 (ख) के तहत ग्राम सभा द्वारा एक निधि स्थापित करने का प्रावधान किया गया है, जिसमें हाट-बाजार, जल स्रोत, बालू घाट, तालाब, लघु वन उपज, खनिज और बाजार प्रबंधन शुल्क से प्राप्त राशि जमा होगी. लेकिन नियमावली यह स्पष्ट नहीं करती कि यह निधि किस ग्राम सभा की होगी - राजस्व गांव की, टोला ग्राम सभा की या पंचायत स्तर की.


यही नहीं, नियम 2 (छ), 3, 4, 5 तथा प्रपत्र 1 और 2 के माध्यम से एक ही राजस्व गांव के भीतर कई टोला ग्राम सभाएं गठित करने की व्यवस्था की गई है. इससे ग्राम सभा की एकीकृत अवधारणा टूटती है और अधिकारों का बंटवारा होने लगता है. नतीजतन, यह स्पष्ट नहीं रह जाता कि प्राकृतिक संसाधनों पर अंतिम निर्णय कौन लेगा.


विशेषज्ञों का मानना है कि इस व्यवस्था से लघु वन उपज, लघु खनिज, जल स्रोत, चारागाह, हाट-बाजार और तालाब जैसे संसाधनों पर सामूहिक नियंत्रण कमजोर होगा. आदिवासी समाज की पारंपरिक ग्राम व्यवस्था, जो सामूहिक निर्णय और साझा स्वामित्व पर आधारित रही है, इस नियमावली से प्रभावित हो सकती है.


आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि ग्राम सभा को टुकड़ों में बांटने से न केवल आपसी विवाद बढ़ेंगे, बल्कि बाहरी हस्तक्षेप की संभावनाएं भी बढ़ेंगी. इससे आदिवासी रीति-रिवाज, परंपराएं और सामाजिक ताना-बाना कमजोर पड़ सकता है.


PESA अधिनियम 1996 स्पष्ट रूप से ग्राम सभा को सर्वोच्च इकाई मानता है और प्राकृतिक संसाधनों पर सामूहिक निर्णय का अधिकार देता है. इसके विपरीत, PESA नियमावली 2025 ग्राम सभा की परिभाषा और अधिकारों को अस्पष्ट बनाकर संवैधानिक भावना से टकराती दिखाई देती है.


इसलिए सामाजिक संगठनों और आदिवासी बुद्धिजीवियों की मांग है कि PESA नियमावली 2025 की तत्काल पुनर्समीक्षा की जाए. ग्राम सभा की स्पष्ट परिभाषा तय हो, अधिकारों का केंद्रीकरण न होकर सामूहिक सशक्तिकरण हो और नियमावली को PESA अधिनियम 1996 की मूल भावना के अनुरूप संशोधित किया जाए. अन्यथा, यह नियमावली ग्राम स्वशासन को मजबूत करने के बजाय उसे कमजोर करने का कारण बन सकती है.

(लेखक मांडर के पूर्व विधायक और बिहार सरकार में मंत्री रह चुके हैं)

 

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