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लोकतंत्र के आंगन में सत्ता का खेला!

Dr. Kaushalendra Batohi वर्तमान दौर में स्व. अटल बिहारी वाजपेयी का लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर दिये गये प्रसिद्ध भाषण की चर्चा करना आवश्यक है- ‘सरकारें आएंगी जाएंगी, पार्टियां बनेंगी बिगड़ेंगी, मगर यह देश रहना चाहिए, लोकतंत्र रहना चाहिए’. तो वर्तमान परिस्थितियों में ऐसे महान विचारों का क्या हुआ? भारतीय राजनीति के दो खेमों में खेमाबंदी, दोनों के बीच की संवादहीनता, देश के मुद्दों पर भी चर्चा का अभाव चिंताजनक है. भविष्य में यह किस दिशा की ओर राजनीति को लेकर जाएगा, यह कहना अभी संभव नहीं है. अधिकांश राजनीतिक पार्टियां या तो व्यक्ति आधारित हो गई हैं या फिर परिवार आधारित. पार्टियां लोकतंत्र बचाने के नाम पर अपना वजूद और पारिवारिक सदस्यों को बचाने में लगे हैं. देश के जिस भी प्रदेश की बात करें तो यह कहीं न कहीं उस राज्य की राजनीति को प्रभावित करता है और जनमानस की भावना के रूप में उसे अग्रेसित राजनैतिक पार्टियों द्वारा किया जाता है. झारखंड से ही शुरू करते हैं. यहां व्यवस्था के दो पहलू उभरे हैं. एक तो व्यक्ति कितना भी ताकतवर हो, अगर वह भ्रष्टाचार में लिप्त है तो वह भी कानून के सामने बराबर है और बच नहीं सकता. यह लोकतांत्रिक व्यवस्था द्वारा स्थापित कार्यपालिका एवं न्यायपालिका की गतिशीलता एवं उत्तरदायित्व का बोध उसके मतदाताओं एवं देश के नागरिकों को कराता है. दूसरा क्या भारतीय लोकतंत्र केवल संख्याबल के आधार पर चलेगा? लोकतंत्र में संख्याबल के आगे सिर सभी झुकाते हैं, परन्तु विचारों का क्या होगा? क्या अगर केंद्र की सत्ता मजबूत होगी तो संख्यात्मक रूप से कमजोर सरकार उसका शिकार बनेगी? भारत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में नियम कायदे के अलावा एक महत्वपूर्ण तथ्य परंपरा है, जिसके सहयोग से सहयोगात्मक व्यवस्था उत्पन्न हुई और समयानुकूल उन परंपराओं के आधार पर सरकारें चलीं. इसमें कोई दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार अपने देश में संस्थागत हो चुका है और वह नासूर हो गया है. उसको व्यवस्था में नियंत्रित करने के लिए हर तरह की कार्रवाई होनी चाहिए. परन्तु क्या ये कार्रवाइयां विपक्ष के नेताओं पर ही होगी? क्या भाजपा से जुड़े लोग एवं सरकार पूर्णत भ्रष्टाचाररहित है? अगर आप ईमानदार हैं तो ईमानदार दिखना भी चाहिए. यह हो सकता है कि भारत सरकार साफ एवं नेक नीयत से ही यह सब कार्रवाइयां कर रही है और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ कर रही है. सफलता भी मिल रही है, परन्तु समाज की राजनैतिक लड़ाई की तरह समस्त कारवादयाँ प्रतित हो रही है. अब महाराष्ट्र शांत हो गया, छत्तीसगढ़ में सत्ता बदलते ही केन्द्रीय एजेंसियों की कार्रवाइयां नियंत्रित हो गई हैं, अभी झारखंड और दिल्ली में ताबड़तोड़ कारवाई हो रही है, सरकार बदलते ही लालू परिवार पर फिर से कार्रवाई शुरू हो गयी है. इसमें कोई दो राय नहीं कि इन पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप हैं और एजेसियों ने अपनी कार्रवाई के माध्यम से न्यायालय में सिद्ध भी किया है, परन्तु छापेमारी की तारीख, जगह एवं व्यक्ति से नीयत पर शंका जरूर पैदा हो जाती है. पार्टी तोड़कर सत्ता के लिए रोज बनते नये गठबंधन, पार्टी तोड़कर बनती राज्य सरकारें अपने भारतीय लोकतांत्रिक परंपरा के अनुरूप नहीं हैं. पार्टियां तोडना, उनको मान्यता दिलवाना नित्य नये हथकंडे का उपयोग करना यह भारतीय लोकतंत्र की परंपरा नहीं रही है. इन सारी घटनाओं में दोनों पक्ष शामिल हैं. समस्त राजनैतिक पार्टियों की ‘हम्माम में सभी नंगे हैं’ वाली स्थिति है. इस संख्या के खेल से सबसे ज्यादा नुकसान हुआ तो लोकतंत्र के मूल्यों एवं विचार- धाराओं का. उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र की वर्तमान सरकार को ही लें. वह किस विचारधारा की सरकार है, किन किन पार्टियों की सरकार है, वहां बस सरकार चल रही है. महाराष्ट्र से बिहार आते ही नीतीश कुमार के लोकतांत्रिक नंगापन का नायाब उदाहरण है. नीतीश कुमार किस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं? समाजवादी हैं या रामवादी है? लोहियावादी, साम्यवादी या धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक हैं? पता नहीं, क्योंकि हर साल बिहार के विकास के नाम पर सबके साथ गठबंधन बना लेते हैं. इसलिए किस विचारधारा का माना जाएगा. अगर विचारधारा के आधार पर बात करेंगे तो शायद ही कोई राजनैतिक पार्टी होगी, जो समय और परिस्थिति के अनुरूप स्वार्थवश आपस मे गठबंधन कर सत्ता की मलाई न खाई हो. यही हेमंत सोरेन भाजपा से गठबंधन में रह चुके हैं और वर्तमान में कांग्रेस के साथ है, तो किस विचारधारा का प्रतिनिधित्व हुआ. यह भी अपने अनुसार चयनात्मक विचारधारा हो गया. जैसे भारत में नेताओं का अपनी जाति का प्रयोग चयनात्मक है. वैसे ही विचारधारा भी हो गया है. जब सत्ता का सुख भोगना हो तो राज्य का विकास, उसकी विचारधारा की रक्षा की बात ध्यान में आ जाता है और जैसे ही नेताओं को अपने कर्मों की सजा, भ्रष्टाचार के आरोप आते हैं, कार्रवाइयां होती हैं उसे जाति कि अस्मिता से जोड़ते ही समाज को जोड़ते हैं अपने कर्मों के लिए. शायद ही कोई राजनैतिक दल है, जिसने भाजपा या कांगेस के साथ गठबंधन कर सरकार न चलाई हो. समाजवाद, एकात्मवाद, लोहियावाद, साम्यवाद, साम्राज्यवाद, अल्पसंख्यकवाद या किसी का भी प्रतिनिधि करें, सब सारे चोला उतार कर सत्तावाद में समाहित हो जा रहे हैं. परिणामस्वरूप इस सत्तावाद ने विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग गया है. वर्तमान दौर में एक और मुद्दा को राज्यवाद भी कहा जा सकता है. वह पुन: विकसित हो गया है और यह राज्यपालवाद केंद्रीय सत्ता की मजबूती का द्योतक है. आजाद भारत में यह नेहरू जी के काल से शुरू होकर वर्तमान दौर तक जारी है. पश्चिम बंगाल हो, केरल, तमिलनाडु जैसे राज्यों में राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच कशमकश जारी है. मुद्दा दर मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक मामले जा रहे हैं. इन राज्यों में राज्य सरकारें भी व्यवस्थित तरीके से केंद्र के विरोध के नाम पर लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन करते हैं. ये विरोध-समर्थन का खेल बंद होना चाहिए. विचारधारा की राजनीति ध्रुवीकरण से परिवर्तित हुई है और ध्रुवीकरण लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं होता है, चाहे वह साम्प्रदायिक आधार पर हो, भाषाई हो, रंग के आधार पर हो, उपराष्ट्रवाद के आधार पर हो, बंद होना चाहिए. आइए एक विचारधारा आधारित विभिन्न विचारधारों के प्रतिनिधित्व करते हुए उनके बीच का स्वस्थ संवाद आधारित, कटुता रहित, सत्ता को मात्र साधन के रूप में प्रतिष्ठापित करने का आधार बना कर भारत की लोकतान्त्रिक परंपराओं एवं मूल्यों को स्थापित करने का आह्वान करे. डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं. 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