
बैजनाथ मिश्र
जिस समय समूची दुनिया खाड़ी युद्ध के कारण बेतरह परेशान है, उसी समय भारत के पड़ोसी नेपाल में आये एक राजनीतिक भूकंप ने पूरी राजनीति ही उलट-पुलट दिया है. नेपाली राजनीति के सभी सूरमा भूलंठित और लहूलुहान है. केपी शर्मा ओली पर इतने बड़े-बड़े ओले पड़े हैं कि उनके कुकर्मों का भूत उन्हें कराहने तक की मोहलत नहीं दे रहा है. पुष्प कमल दहल प्रचंड का घमंड चूर-चूर हो गया है. शेर बहादुर देउबा गीदड़ बन गये हैं. बाबूराम भट्टराई सिर्फ बाबू बन कर रह गये हैं.
नेपाल में संपन्न हुए चुनाव में मतदाताओं ने नयी-नवेली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) को छप्परफाड़ समर्थन दिया है. यह जनादेश हिमालय के राजनीतिक परिदृश्य में एक अमूलचूल बदलाव का संकेत है. यह बदलाव सकारात्मक होगा या नकारात्मक यह तो समय बतायेगा, लेकिन अभी तो राज्य की कोसी, नारायणी, बागमती आदि नदियों की छाती हिलोरें ले रही है और आरएसपी के संस्थापक राव लछिमाने तथा प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी बलेंद्र (बालेन) शाह की बलाइयां ले रही है.
इस जोड़ी ने सारे पुराने समीकरणों को उलट-पुलट दिया है. दो तिहाई बहुमत से जीती आरएसपी ने वामपंथ से लेकर दक्षिण पंथ और राजशाही समर्थक दल को धूल धूसरित कर दिया है. गिरते-पड़ते, पिटते-पिटाते नेपाली कांग्रेस दूसरे नंबर पर आ तो गयी है, लेकिन उसने ऐसी भीषण पराजय की कल्पना भी नहीं की होगी. प्रचंड की पार्टी तीसरे पायदान पर खिसक गयी है. ओली तो खुद चुनाव हार गये हैं. संक्षेप में कहें तो टुकड़ों में बंटे वाम दलों का शिराजा बिखर गया है. संभव है कि इस करारी हार से चिंतित वामपंथी नये सिरे से एकजुट होने की कोशिश करें और आरएसपी से मुकाबले के लिए खुद को तैयार करें, लेकिन तब तक नेपाल की नदियों में बहुत पानी बह चुका होगा.
चुनाव प्रचार के दौरान लगभग सभी प्रतिस्पर्धी पार्टियों ने बालेन शाह को मधेशी और मैथिल बताकर मतदाताओं को भड़काने की कोशिश की. लेकिन वे पता नहीं क्यों भूल गये कि यह चुनाव पिछले साल हुए जेन जी के उस आंदोलन की पीठिका पर हो रहा था जिसने पूरे नेपाल को हिला दिया था. उस आंदोलन के पीछे भी बालेन शाह थे और जब आरएसपी ने "अबकी बार बलेंद्र सरकार" टैग लाइन से प्रचार अभियान शुरु किया तो उसके प्रवाह में विपक्षियों के सारे छल-प्रपंच बह गये. यानी युवाओं ने आरएसपी के समर्थन में ऐसी लामबंदी कर दी थी कि सारे आरोप निष्प्रभावी हो गये.
दरअसल, नेपाली जनता 1990 में लोकतंत्र की बहाली के कुछ वर्षों बाद से ही स्वयं को छला महसूस कर रही थी. वह बेमेल गंठबंधनों और छह-छह, आठ-आठ महीने की सरकारों से आजिज आ चुकी थी. ऊपर से भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और विकास की अनदेखी ने जनता को कुपित कर रखा था. वह एक मौके की तलाश में थी और इसीलिए उसने आरएसपी को रिकॉर्ड बहुमत दे दिया है. उसने एक तरह से पारंपरिक राजनीति से तौबा कर ली है.
आप चाहें तो इस विजय की तुलना असम के असम गण परिषद की उस ऐतिहासिक विजय से कर सकते हैं जब प्रफुल्ल महंत और भृगु फुक्कन ने छात्रावासों से निकलकर राज्य की सत्ता हथिया ली थी. कुछ लोग अरविंद केजरीवाल के उदय से भी इसकी तुलना कर सकते हैं. कुछ लोग इसे जनता पार्टी की उस विजय के रूप में रेखांकित कर सकते हैं. जब इंदिरा गांधी और संजय गांधी (गाय बछड़ा) दोनों हार गये थे. लेकिन क्या उपर्युक्त तीनों उदाहरण नेपाल में इस परिवर्तन की सफलता पर आशंका व्यक्त करने के लिए काफी नहीं हैं?
आज असम गण परिषद भाजपा की पिछलग्गू है. केजरीवाल और उनकी पार्टी ने भी सिर्फ निराश ही किया है. वह स्वयं एक डपोरशंखी बन कर रह गये हैं. जनता पार्टी तो खत्म ही हो गयी है और उसके अवशेष से पैदा दल कांग्रेस के साथ मिलकर भाजपा को हराने में लगे हैं. तो क्या यह मान लिया जाय कि नेपाल की विजयी पार्टी आरएसपी भी कुछ नये-नवेले महत्वकांक्षी और परिवर्तनकारी नेताओं का ऐसा संगठन है जो अपने अंतर्विरोधों तथा महत्वकांक्षाओं के टकराव के चलते दीर्घजीवी नहीं हो सकता है? यह भी कि जिन चुनावी घोषणाओं की लहर पर सवार होकर यह कामयाबी हासिल की गयी है, उन्हें अमली जामा पहनाना असंभव नहीं तो श्रमसाध्य तो है हीं.
भावी प्रधानमंत्री बलेन शाह फिलहाल काठमांडू के मेयर रहे हैं. यह जीत भी उन्होंने बतौर निर्दलीय हासिल की थी. वह साहित्यिक-सांस्कृतिक अभिरूचि के एक डिग्रीधारी इंजीनियर हैं. लेकिन काठमांडू को संभालना और पूरे देश को चलाने तथा पटरी पर लाने में बहुत अंतर है. एक तो इस पार्टी की अपनी कोई परंपरागत विचारधारा नहीं है. यह स्वतंत्र है, समस्याओं के बोझ और उसके निराकरण के क्रम में यह कितना स्वतंत्र रह पायेगी, इसका आकलन तो बाद में होगा, लेकिन क्या बालेन शाह अपने दोनों बड़े पड़ोसियों चीन और भारत के साथ संतुलन बनाने की राह पर चलेंगे या अपने नेपाल फर्स्ट की नीति की आड़ में अपने राष्ट्रवाद को समन्वयवादी के बदले साम्यवादी बनाने की राह पर चल पड़ेंगे?
वह "वृहत नेपाल" और नेपाल में भारतीय फिल्मों के अस्थायी रोक के पक्षधर रहे हैं. वह कालापानी-लिपुलेख सीमा विवाद गर्म कर भारत को चिढ़ाने की कोशिश भी कर सकते हैं. लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और विदेशी निवेश का मुख्य स्रोत भी है.
अब तक की सरकारें भारत के साथ कई किंतु-परंतु के बावजूद स्थिर संबंधों को तवज्जो देती रही है. यदि शाह का राष्ट्रवाद भारत विरोध के बरक्स चीन की ओर झुका तो उन्हें लेने के देने पड़ सकते हैं, वह भी भारत के बिना कुछ किये-कराये. कारण यह कि बालेन के अमेरिका से अच्छे संपर्क सूत्र हैं. विदेशों में बसे और नोकरीपेशा नेपालियों ने इस चुनाव में उनकी अच्छी खासी मदद की है. वे कभी नहीं चाहेंगे कि नेपाल की नयी सरकार आंतरिक समस्याएं ठीक करने के बदले विदेश नीति के मुद्दे पर उलझ जाये. आरएसपी का घोषणा पत्र मूलतः विकास पर केंद्रित है. शाह देश की जीडीपी सौ अरब डॉलर तक बढ़ाने, शहरी बुनियादी ढ़ांचे में सुधार और बारह लाख नौकरियां सृजित करने के वादे के साथ जीते हैं. इसलिए उन्हें भारत की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहायता की जरूरत पड़ेगी.
चीन भी नेपाल में अपने रणनीतिक कूटनीतिक हित साधने में लगा है. यह वैश्विक शक्ति संतुलन में व्यापक परिवर्तन का दौर है. इसलिए उन्हें भारत-चीन-अमेरिका के बीच संतुलन साधकर चलना होगा और इन अर्थव्यवस्थाओं से लाभ उठाने के क्रम में भू-राजनीतिक परिदृश्य पर भी नजरें गड़ाये रखना होगा.
बहरहाल, हमें तो प्रसन्नता यही है कि नेपाल में चुनाव शांतिपूर्ण संपन्न हो गये हैं. एक युवा मैथिल (मधेशी) प्रधानमंत्री बन रहा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि वह अपने वादों को पूरा करेगा और जन अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा. भारत ने हमेशा नेपाल को अपना माना है और तब तक मानता रहेगा जब तक कि वह अति न कर दे.
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