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लगभग खामोश चुनाव के सियासी मायने

Ravikant 2024 का लोकसभा चुनाव अंतिम पायदान पर है. ज्यादातर चुनाव विश्लेषकों और पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस चुनाव में मतदाता बहुत शांत हैं. यहां तक कि पार्टियों के कार्यकर्ता और समर्थक भी मुखर नहीं दिखाई दे रहे हैं. जबकि आमतौर पर भाजपा के समर्थक मुखर ही नहीं बल्कि विपक्षियों पर आक्रामक भी रहते हैं. यही कारण है कि जमीन पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार भी हैरान हैं. इन पत्रकारों का कहना है कि उन्होंने इतना खामोश चुनाव पहले कभी नहीं देखा. लेकिन उनका मानना है कि अंदर ही अंदर एक धारा है जो चुनाव को निर्णायक बना रही है. यह धारा क्या है? क्या इस धारा ने चुनाव को बदल दिया है? इस साल के जनवरी महीने में राम मंदिर का उद्घाटन हुआ. कर्पूरी ठाकुर और चौधरी चरण सिंह जैसे अतिपिछड़ा और किसान समाज के राजनेताओं को मोदी सरकार द्वारा भारत रत्न दिया गया. उस समय भाजपा और नरेंद्र मोदी के पक्ष में माहौल बन रहा था. विपक्षी गठबंधन की एकता बिखरने लगी थी. नीतीश कुमार ने फिर से पाला बदल लिया और ममता बनर्जी ने ऐलान किया कि बंगाल में इंडिया एलाइंस नहीं होगा. इससे विपक्षी एकता को झटका लगा. एक तरफ भाजपा के पास संसाधनों की भरमार है तो विपक्ष लगभग खाली हाथ है. कांग्रेस ने जो क्राउड फंडिंग के जरिए चंदा इकट्ठा किया था, उस पर भी ताला लगा दिया गया. कांग्रेस के खाते सील कर दिए गए. विपक्षी नेताओं पर ईडी सीबीआई की एक के बाद एक छापेमारी शुरू हो गयी. कांग्रेस सहित विपक्ष के तमाम नेताओं को डरा धमकाकर बीजेपी में शामिल कराया जाने लगा. इतना ही नहीं, हेमंत सोरेन जैसे चुने हुए आदिवासी मुख्यमंत्री को ईडी ने जेल भेज दिया. इसके बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भी तिहाड़ भेज दिया गया. विपक्ष को निपटाने के लिए एक तरह का गुरिल्ला वार चल रहा था. इन तमाम वजहों से विपक्ष में कोई खास उम्मीद नहीं दिख रही थी. जबकि मोदी और सत्ता पक्ष का उत्साह चरम पर था. इसलिए नरेंद्र मोदी ने `अबकी बार 400 पार` का नारा दिया. जब यह सवाल उठा कि इतना बड़ा बहुमत क्यों चाहिए तो भाजपा के कई सांसदों और प्रत्याशियों ने ऐलान कर दिया कि संविधान बदलने के लिए दो तिहाई से ज्यादा बहुमत की ज़रूरत है. `भाजपा संविधान बदलना चाहती है.` इस ऐलान का तेजाबी असर दलित और आदिवासी समाज में हुआ. डॉ. आंबेडकर द्वारा लिखित संविधान ने दलित और आदिवासियों को राजनीतिक और सरकारी महकमों में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण का अधिकार दिया. बाबा साहब ने दलितों की गुलामी और वंचना मिटाने के लिए आजीवन संघर्ष किया. स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस के साथ तमाम अहसमतियों के बावजूद डॉ. आंबेडकर, गांधी और नेहरू के आमंत्रण पर संविधान सभा में पहुंचे. डॉ. आंबेडकर ने स्वीकार किया कि दलितों के हितों की रक्षा हेतु वे संविधान सभा में आना चाहते थे. लेकिन सभा ने उन्हें प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाकर सबसे बड़ी जिम्मेदारी सौंपी. इस तरह बाबा साहब आंबेडकर संविधान निर्माता बने. दलितों, अल्पसंख्यकों और पिछड़ों को संविधान ने तमाम मौलिक और कानूनी अधिकार प्रदान किए. भाजपा के संविधान बदलने के ऐलान के बाद देश का जागरूक दलित और आदिवासी समाज संगठित होकर उसके खिलाफ खड़ा हो गया. तमाम पत्रकारों को यह बात समझ में नहीं आ रही है कि अचानक खासकर दलित समाज मुखर होकर भाजपा का विरोध क्यों करने लगा? यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि इस चुनाव में केवल दलित ही मुखर दिखाई दे रहा है. दरअसल, उसके लिए संविधान बदलने का मामला केवल आरक्षण तक सीमित नहीं है बल्कि सदियों बाद मनुष्य होने का जो एहसास उसे प्राप्त हुआ है, उसे वह खोना नहीं चाहता. संविधान और बाबा साहब के प्रति उसका भावनात्मक लगाव है. दलित समाज किसी भी कीमत पर संविधान पर आंच नहीं आने दे सकता. संविधान पर उठने वाली उंगली को दलित समाज क़तई नहीं बर्दाश्त कर सकता. वह अपनी आने वाली पीढ़ियों को स्मृतिकाल और पेशवाई दौर की तरह गुलाम नहीं देख सकता. क्या यह चेतना अचानक दलितों के मन में घर कर गई? ऐसा कतई नहीं है. पिछले 5 साल से लगातार सामाजिक जागरूकता कार्यक्रमों और गोष्ठियों में इसकी चर्चा होती रही है कि भाजपा और आरएसएस का छुपा हुआ एजेंडा बाबा साहब के संविधान को बदलना है. संघ से जुड़े तमाम हिंदुत्ववादी संगठन लगातार भारत को हिंदूराष्ट्र बनाने और मनुस्मृति के आधार पर संविधान लागू करने की बात करते रहे हैं. इसीलिए बहुजन नायकों पर होने वाली गोष्ठियों में संविधान बचाने की शपथ ली जाती रही. जिन लोगों को लगता है कि अचानक संविधान कैसे मुद्दा बन गया, वे दरअसल, इस चेतना प्रक्रिया से अनजान हैं. यही कारण है कि देशभर का करीब 70 फ़ीसदी दलित समाज आज विपक्ष यानी इंडिया एलाइंस के साथ खड़ा है. वे संविधान बदलने वालों को ही बदलने के लिए विपक्ष के साथ आ गए हैं. दरअसल, नरेंद्र मोदी के 10 साल के शासन में देश के शीर्षस्थ चुनिंदा अमीरों और पूंजीपतियों को छोड़कर प्रत्येक वर्ग की आर्थिक क्षति हुई. पहले नोटबंदी ने छोटे दुकानदारों और गरीब परिवारों को उजाड़ दिया. काला धन समाप्त करने के नाम पर की गई नोटबंदी ने देश की अर्थव्यवस्था को मानो ठप्प कर दिया. इसके बाद जीएसटी ने मझोले कारोबारियों को तबाह कर दिया. रही सही कसर कोरोना आपदा के समय पूरी हो गई. तालाबंदी के कारण लघु और मध्यम उद्योग धंधे बंद हो गए. असंगठित क्षेत्र में लगे तमाम मजदूर अपने गांव वापस आ गए. उन्हें 5 किलो राशन देकर भिखमंगा बना दिया गया. लेकिन उन्हें रोजगार नहीं मिला. इससे इन मजदूरों का स्वाभिमान ही नहीं छलनी हुआ बल्कि बच्चों की पढ़ाई और परवरिश भी ठीक से नहीं हो रही है. डीजल, खाद और बीज के दामों की बढ़ोतरी ने किसानों को कंगाल कर दिया. आवारा पशुओं ने उनकी रात की नींद छीन ली. कर्ज के बोझ तले दबा किसान आत्महत्या के लिए मजबूर होने लगा. जब उसने एमएसपी की मांग की तो उस पर केंद्र सरकार ने लाठियां बरसाईं. किसानों की जमीनों पर अंबानी अडानी की नज़र गड़ी हुई है. मोदी का मक़सद किसानों को जमीनों से बेदखल करके अंबानी और अडानी का साम्राज्य स्थापित करना है. मोदी अपने पूंजीपति मित्रों के लिए किसानों को खेत मजदूर बनाना चाहते हैं. किसान मजदूर ही नहीं आज देश का नौजवान भी मोदी सरकार से बेहद नाराज है. पिछले 10 सालों में ना के बराबर सरकारी नौकरियां दी गयीं. अग्निवीर जैसी योजना लाकर नरेंद्र मोदी ने नौजवानों का सैनिक बनने का भी सपना छीन लिया. 10 साल से सरकारी भर्तियों की राह देखते देखते नौजवानों की आंखें पथरा गयीं. उनके हौसले टूट गए. इस दरम्यान सैकड़ों नौजवानों ने आत्महत्या कर ली. कांग्रेस पार्टी ने अपने घोषणापत्र में पांच न्याय का ऐलान किया. युवाओं को 30 लाख सरकारी नौकरियां छह माह के भीतर देने का वादा बहुत आकर्षक बन गया. अग्निवीर योजना को समाप्त करने के वादे ने खासकर ग्रामीण पृष्ठभूमि के नौजवानों को आकर्षित किया. कर्जमाफी से लेकर एमएसपी का वादा देश के किसानों के लिए, महिलाओं के लिए प्रतिवर्ष 1 लाख रुपए की नगदी महालक्ष्मी योजना, बेरोजगार नौजवानों के कौशल विकास हेतु प्रतिवर्ष 1 लाख की सहायता; ऐसी योजनाएं हैं जिनसे लोगों की आत्मनिर्भरता ही नहीं बढ़ेगी बल्कि रुका हुआ आर्थिक पहिया भी चल निकलेगा. लोगों के पास जो नगदी पहुंचेगी वह बाजार में आएगी, खरीदारी बढ़ेगी. इससे उत्पादन बढ़ेगा. जब उत्पादन बढ़ेगा तो रोजगार भी सृजित होगा. राहुल गांधी इस आर्थिक प्रक्रिया को आसान शब्दों में लगातार लोगों को समझा रहे हैं. भारत जोड़ो यात्रा और न्याय यात्रा के दौरान राहुल गांधी जाति जनगणना और दलित, आदिवासियों के मुद्दों पर मुखर रहे हैं. कांग्रेस के मैनिफेस्टो पर इन मुद्दों की स्पष्ट छाप दिखाई दे रही है. 50 फ़ीसदी की आरक्षण की सीमा हटाने यानी दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को आबादी के अनुपात में आरक्षण देने का ऐलान किया गया. बैकलॉग की भर्ती, निजी क्षेत्र और न्यायपालिका में आरक्षण का वादा सामाजिक न्याय की ओर बढ़ता एक जरूरी कदम है. सामाजिक और आर्थिक न्याय का दस्तावेज बने कांग्रेस के मैनिफेस्टो ने इस चुनाव में निर्णायक भूमिका अदा की है. कांग्रेस के पास भाजपा की तरह प्रचारतंत्र नहीं है. लेकिन जब नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस के मैनिफेस्टो पर मुस्लिम लीग की छाप बताई तो उसका स्वतः प्रचार हो गया. कांग्रेस के अनुसार मोदी के हमले के बाद तीन दिन में 80 लाख लोगों ने उसके घोषणा पत्र को डाउनलोड किया. कांग्रेस मैनिफेस्टो पर हमला एक तरह से नरेंद्र मोदी का सेल्फ गोल साबित हुआ. इस तरह जमीन पर महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ लोगों का गुस्सा और संविधान बदलने के ऐलान ने भाजपा के खिलाफ पूरा माहौल पैदा कर दिया. भाजपा और हिंदुत्ववादियों ने 10 साल में एक डर पैदा किया. इस वजह से लोग खामोश हैं. लेकिन वे बदलाव के लिए वोट करने के लिए निकल रहे हैं. जबकि भाजपा का आधार मतदाता महंगाई और बेरोजगारी से इतना पीड़ित है कि मोदी द्वारा बार-बार मुसलमानों से डराने के बावजूद वह निष्क्रिय और खामोश बना हुआ है. इसलिए चुनाव बेहद शांत दिख रहा है. लेकिन आंतरिक विरोधी हवा से भाजपा सत्ता से बाहर जाती हुई दिखाई दे रही है. डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं. 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