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Political News: झारखंड कांग्रेस में चुप्पी या शांति?, के. राजू के दौरे के इंतजार में थमा विरोध

Ranchi: झारखंड प्रदेश कांग्रेस में पिछले कुछ सप्ताह से चल रही अंदरूनी खींचतान फिलहाल धीमी पड़ती दिख रही है. पार्टी के भीतर इसे प्रदेश प्रभारी के. राजू के झारखंड दौरे के टलने से जोड़कर देखा जा रहा है. जानकारी के अनुसार, पैर में चोट लगने के कारण के. राजू कुछ समय तक झारखंड नहीं आ पाएंगे. माना जा रहा है कि उनका दौरा करीब एक महीने तक टल सकता है. ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश के खिलाफ चल रही राजनीतिक हलचल को फिलहाल विराम मिला है.
 

Ranchi: झारखंड प्रदेश कांग्रेस में पिछले कुछ सप्ताह से चल रही अंदरूनी खींचतान फिलहाल धीमी पड़ती दिख रही है. पार्टी के भीतर इसे प्रदेश प्रभारी के. राजू के झारखंड दौरे के टलने से जोड़कर देखा जा रहा है.

 

जानकारी के अनुसार, पैर में चोट लगने के कारण के. राजू कुछ समय तक झारखंड नहीं आ पाएंगे. माना जा रहा है कि उनका दौरा करीब एक महीने तक टल सकता है. ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश के खिलाफ चल रही राजनीतिक हलचल को फिलहाल विराम मिला है.

 

झारखंड कांग्रेस में हाल के दिनों में नेतृत्व और संगठनात्मक कामकाज को लेकर असंतोष खुलकर सामने आया था. मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने सबसे पहले प्रदेश नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठाए थे. बाद में सांसद सुखदेव भगत ने भी संगठन के संचालन को लेकर नाराजगी जताई. इसके बाद कई जिलों में भी पार्टी के भीतर मतभेद की चर्चा तेज हो गई थी.

 

कांग्रेस नेतृत्व ने फरवरी 2025 में के. राजू को झारखंड का नया प्रभारी बनाया था. पूर्व आईएएस अधिकारी रहे के. राजू को संगठन मजबूत करने और बूथ स्तर तक पार्टी ढांचे को सक्रिय करने की जिम्मेदारी दी गई थी.

 

प्रदेश प्रभारी बनने के बाद के. राजू लगातार संगठन विस्तार, बीएलए नियुक्ति और पंचायत स्तर पर समितियों के गठन पर जोर देते रहे हैं. इसी क्रम में उन्होंने नेताओं और विधायकों के साथ अलग-अलग बैठकें भी की थीं और राज्य में 30 हजार बीएलए बनाने का लक्ष्य तय किया गया था.

 

हालांकि पार्टी के भीतर जारी असमंजस का असर अब संगठनात्मक गतिविधियों पर भी दिखाई देने लगा है. मतदाता सूची पुनरीक्षण और बीएलए नियुक्ति की प्रक्रिया कई जिलों में धीमी पड़ गई है. स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देने और उन्हें सक्रिय करने की रफ्तार भी कम हुई है.

 

फिलहाल विरोध के स्वर पहले की तुलना में कमजोर पड़े हैं और असंतुष्ट नेता भी सार्वजनिक रूप से ज्यादा सक्रिय नहीं दिख रहे हैं. पार्टी के भीतर अब नजर इस बात पर टिकी है कि के. राजू का अगला झारखंड दौरा कब होता है और उसके बाद संगठन में क्या राजनीतिक संकेत निकलते हैं.

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