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धनखड़ के न्यायपालिका पर दिये बयान पर सियासी घमासान, विपक्ष ने लोकतंत्र के खिलाफ बताया

LagatarDesk :  भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा न्यायपालिका पर की गयी कड़ी टिप्पणी के बाद देश की राजनीति गरमा गयी है. उन्होंने हाल ही में एक बयान में कहा था कि न्यायपालिका की भूमिका पर जनता का भरोसा घटता जा रहा है और यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है. उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस बयान के बाद कई विपक्षी दलों के नेताओं ने पलटवार किया है और इसे संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध बताया है.
झारखंड के कांग्रेस नेता राकेश सिन्हा ने कहा कि जब भी लोकतंत्र खतरे में होता है, तब संविधान न्यायपालिका को हस्तक्षेप करने की अनुमति देता है. न्यायपालिका हमेशा संविधान के प्रावधानों के अनुसार ही अपना फैसला सुनाती है. यह केंद्र सरकार की तरह नहीं है, जो सदन में बहुमत के बल पर कोई विधेयक पारित कर देती है.
  https://twitter.com/PTI_News/status/1913104698682613932

कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने कहा कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति संवैधानिक पद पर हैं और उनकी एक गरिमा है, इसलिए मैं उन पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा. भारत के संविधान में चार स्तंभ (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया) हैं.  उनके अपने कर्तव्य हैं और उन्हें एक-दूसरे के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.
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समाजवादी पार्टी के नेता फखरुल हसन चांद इस मामले में कहते हैं कि संविधान में राष्ट्रपति, राज्यपाल, केंद्र और राज्य सरकारों की भूमिकाएं परिभाषित की गयी हैं. समाजवादी पार्टी को लगता है कि कुछ विधेयक राज्यपाल के पास भेजे जाते हैं, लेकिन अगर वे विधेयक पारित नहीं होते हैं, तो इससे राज्य को नुकसान होता है. इसलिए समाजवादी पार्टी को लगता है कि (न्यायपालिका) विधेयकों के लिए समयसीमा निर्धारित करने पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए.
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समाजवादी पार्टी के सांसद राजीव राय ने कहा कि जब देश तानाशाही की ओर बढ़ रहा है. वे बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं कि न्यायपालिका उनके खिलाफ बोल रही है. जब भी कोई न्यायाधीश सेवानिवृत्त होता है, तो उसे किसी समिति का अध्यक्ष बना दिया जाता है या राज्यसभा सांसद बना दिया जाता है. यह पूरी व्यवस्था का मजाक है.
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दरअस उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भारतीय न्यायपालिका की कार्यशैली, भूमिका और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाये थे. उन्होंने कहा था कि  जनता का न्यायपालिका पर भरोसा लगातार कम हो रहा है, जो लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है. उन्होंने न्यायपालिका द्वारा राष्ट्रपति को कार्यवाही के निर्देश दिये जाने पर भी सवाल उठाया और कहा कि इस तरह की व्यवस्था भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के अनुरूप नहीं है. हाल ही में दिल्ली में एक न्यायाधीश के आवास से बड़ी मात्रा में नकदी बरामद होने की घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने पूछा कि अब तक एफआईआर क्यों नहीं हुई और कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गयी. उन्होंने कहा कि आज हालात ऐसे हो गये हैं कि जज कानून भी बना रहे हैं, कार्यपालिका का काम भी कर रहे हैं और संसद से ऊपर खुद को रख रहे हैं. उन्होंने तीखा सवाल किया कि आखिर हम जा कहां रहे हैं. देश में हो क्या रहा है.  धनखड़ ने यह भी कहा कि हमने ऐसा लोकतंत्र नहीं चाहा था, जहां न्यायपालिका सभी स्तंभों पर हावी हो जाये. 

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