
बैजनाथ मिश्र
प्रयागराज में माघ मेला चल रहा है. यह मेला हमारी सनातनी परंपरा का हिस्सा है. लेकिन मेला लगे और झमेला न हो तो विघ्नसंतोषियों को मजा नहीं आता. इस बार यह मौका कथित शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन ने दिया है.
मौनी अमावस्या (18 जनवरी) को संगम में स्नान करने के लिए भारी भीड़ उमड़ी थी. इसी बीच अविमुक्तेश्वरानंद अपनी शिष्यमंडली के साथ स्नान के लिए पालकी पर सवार होकर जुलूस की शक्ल में निकल पड़े. कुछ आगे बढ़े तो अधिकारियों ने उन्हें यह कहते हुए रोक दिया कि आप पैदल चलकर स्नान कर लें, अन्यथा व्यवस्था बिगड़ जायेगी. यह भी कि आप वापसी मार्ग रोके हुए हैं. इससे श्रद्धालुओं को परेशानी हो रही है. लेकिन जड़ विनय तो मानता नहीं है और वह भी तब जब साथ में बिगड़ैल चेले चपाटी हों. फिर क्या था, चेले बढ़ने लगे तो पुलिस अपनी शैली में उन्हें समझाने लगी. चिल्ल-पों मचनी ही थी. इससे अविमुक्तेश्वरानंद बिदक गये. उन्हें लगा कि यह एक शंकराचार्य की तौहीन है. लेकिन रानी अपना पानी खुद नहीं बचा सकती तो उनकी इज्जत दूसरा कौन बचाएगा?
बहरहाल, अब अपने शिविर के द्वार पर बैठे हैं. कहा जा रहा है कि वह धरने पर हैं. लेकिन उन्होंने टीवी चैनलों पर इससे इनकार किया है. हां, इतना जरूर कहा है कि वह संगम में तब तक स्नान नहीं करेंगे जब तक उन्हें पूरी व्यवस्था के साथ स्नान की अनुमति नहीं मिलती है. प्रशासन के रवैये से ऐसा लगता है कि वह नहायें या नहीं, लेकिन उनके लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं की जाएगी, क्योंकि किसी के लिए भी खास इंतजाम नहीं किया गया है.
प्रशासन ने अविमुक्तेश्वरानंद के जले पर मिर्च पाउडर एक नोटिस जारी कर छिड़क दिया कि आप प्रमाण के साथ बताइए कि शंकराचार्य हैं कैसे? आपका तो पट्टाभिषेक (कोरोनेशन) सुप्रीम कोर्ट ने रोक दिया है. अब वह विफर पड़े हैं. कह रहे हैं कि जब राष्ट्रपति शंकराचार्य तय नहीं कर सकते तो प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री की क्या हैसियत है? उन्होंने अधिकारियों के विरुद्ध मानहानि का नोटिस भेज दिया है. यह भी कह रहे हैं कि गो माताएं कट रही हैं, उस पर पाबंदी नहीं लगाने वाली सरकार साधु संतों को पीट रही है, संगम स्नान के उनके मौलिक अधिकार से रोक रही है और अपनी भूल का प्रायश्चित भी नहीं कर रही है.
अब लौटते हैं कुछ मुख्य बिंदुओं और सवालों पर. यदि अविमुक्तेश्वरानंद मेला प्रशासन की बात मानकर पैदल स्नान करने चले जाते तो उनकी कथित श्रेष्ठता क्षीण कैसे हो जाती? यदि वह सचमुच संत हैं तो यह क्यों भूल गये कि "संत हृदय नवनीत समाना" यानी संत का हृदय मक्खन के समान होता है जो ताप (दुःख) देखकर पिघल जाता है. क्या अविमुक्तेश्वरानंद का दिल श्रद्धालुओं की तकलीफ से पिघला, जिनकी राह उनके काफिले ने रोक दी थी? क्या उनकी वाणी और भाषा संतोचित है? दरअसल वह संत नहीं मठाधीश हैं, वह भी स्वघोषित और अहंकार की ऊंची पालकी पर सवार होकर अपनी सर्वोच्चता का आख्यान स्वयं दे रहे हैं.
वह असली शंकराचार्य हैं या नकली, यह सुप्रीम कोर्ट साफ कर चुका है. उनके गुरु स्वामी स्वरुपानंद ने अपने जीते जी न तो किसी को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था ना ही अविमुक्तेश्वरानंद अपनी विधिवत ताजपोशी का प्रमाण अब तक दे पाये हैं. एक तर्क यह दिया जा रहा है कि जनता जिसे चाह ले, वह शंकराचार्य बन जाता है. लेकिन क्या इस बाबत कोई रायशुमारी हुई है? सवाल यह है कि यदि माघ मेले में अविमुक्तेश्वरानंद को अपमानित किया गया और वह न केवल लोकप्रिय हैं, बल्कि वैध रुप से ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य हैं तो वहां उपस्थित करोड़ों सनातनियों ने उनके समर्थन में धावा क्यों नहीं बोल दिया?
जहां तक गोहत्या पर रोक लगाने के अभियान का सवाल है, बिसुकी गायों और अनुपयोगी बछड़ों को कसाइयों के हाथों बेचता कौन है? क्या किसी धर्माचार्य या सरकार के पास इस धंधे को रोक पाने का सामर्थ्य है? जिस देश में लोग अपने अनुपयोगी मां-बाप को छोड़ दे रहे हैं, उन्हें वृद्धाश्रम भेज दे रहे हैं, वहां बेकार पशुओं के दाना-पानी का इंतजाम कौन करेगा? स्वामी करपात्री जी ने यह बीड़ा उठाया था और उनके आह्वान पर साधु संतो का हुजूम दिल्ली पहुंच गया था. इंदिरा सरकार ने गोलियां चलवा दी. कुछ मरे, कुछ घायल हो गये. करपात्री जी ने रामराज्य परिषद नामक पार्टी बनाकर अपने समर्थकों को चुनाव भी लड़वाया, लेकिन बुरी तरह पिट गये.
विनोबा भावे ने भी "कत्लगाहों" के खिलाफ सत्याग्रह अभियान चलाया. न सत्याग्रह सफल हुए, न गोकशी बंद हुई. योगी आदित्यनाथ भी यथाशक्ति उत्तर प्रदेश में गो हत्या रोकने का प्रयास कर रहे हैं, गोशालाएं बनवा रहे हैं, लेकिन पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहे हैं. अगर शंकराचार्यों को लगता है कि वे यह काम कर करा लेंगे तो समवेत स्वर में सामने आयें और अपनी हैसियत व असर का अंदाज लगा लें.
रही बात अविमुक्तेश्वरानंद की तो वह विद्वान तो नहीं ही हैं, जब बोलते हैं कचरा ही फैलाते हैं. इनके गुरु स्वरूपानंद को भी नरसिंह राव ने चंद्रास्वामी के सहयोग से बने रामालय ट्रस्ट का मुखिया बनाया था. इसका उद्देश्य यही था कि राम मंदिर आंदोलन की बागडोर विश्व हिंदू परिषद और भाजपा से छीन ली जाये. लेकिन यह अभियान शुरु होते ही फुस्स हो गया. यदि शंकराचार्य सचमुच जनोन्मुख होने और सनातन के उन्मेष के प्रति कटिबद्ध होते तो क्या अयोध्या में राम मंदिर निर्माण में पांच सौ साल लग जाते? ये केवल छत्रधारी हैं, वैभवाभिलाषी हैं. इनके पास अकूत संपत्तियां हैं. लेकिन सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय इनका उपयोग ये करना ही नहीं चाहते हैं.
खैर, माघ मेले से उपजा विवाद थोड़ा चटक, थोड़ा फीका हो ही रहा था कि "नाच रही पतुरिया कूद गया भाड़" की तर्ज पर राजनीतक दल इसमें कूद गये, आपदा में अवसर तलाशने. अखिलेश यादव ने अविमुक्तेश्वरानंद से फोन पर बतियाया, अपना एक प्रतिनिधिमंडल नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय के नेतृत्व में प्रयागराज भेजा, शायद इस संदेश के साथ "चढ़ जा बेटा सूली पर, भला करेंगे राम." 2027 में योगी के खिलाफ एक बवंडर खड़ा कीजिए, हम आपके साथ हैं. अखिलेश को लग रहा है कि 2015 में वाराणसी में इन्हीं अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्यों को पिटवाने के कारण वह 2017 में हार गये थे. अब योगी ने पिटवाया है तो उन्हें भी संतों का श्राप लग जायेगा.
इसी बीच कांग्रेस भी अविमुक्तेश्वरानंद के स्तुति गान और उनके महिमामंडन में लग गयी है. वह भी योगी पर लानत भेज रही है जबकि दो हफ्ते पहले अविमुक्तेश्वरानंद कह चुके हैं कि यदि राहुल गांधी राम मंदिर जाते हैं तो उन्हें घुसने न दिया जाये, क्योंकि वह हिंदू नहीं हैं. राहुल ने मनुस्मृति का विरोध किया था. आज कांग्रेस बेबस लाचार दिखती है. वह यह कहने का साहस नहीं दिखा पा रही है कि देश संविधान से चलेगा न कि मनुस्मृति और शरिया से. चुनाव जो न कराये.
गैर भाजपाई प्रवक्ता योगी मोदी पर लानत भेज रहे हैं. इसे आप "हारे को हरि नाम" भी कह सकते हैं. देखना है कि अविमुक्तेश्वरानंद संगम में नहाते हैं या नहीं, मेला प्रशासन झुकता है या नहीं और शंकराचार्य कब तक अनशन या धरने पर रहते हैं. अविमुक्तेश्वरानंद कोई संत रविदास तो हैं नहीं जो अपनी भक्ति के उद्रेक से "मन रहे चंगा तो कठोते में गंगा" कहते हुए गंगा जी को अपने पास बुला लेंगे.

Leave a Comment