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धार्मिक उन्माद की राजनीति किसी भी देश को श्रीलंका बना दे सकती है

Faisal Anurag धार्मिक उन्माद और एक परिवार की सत्ता किस तरह देश को बर्बाद कर देती है, इसका ताजा उदाहरण है श्रीलंका. 2012 तक श्रीलंका के ग्रोथ की कहानी पूरी दुनिया का अध्यानाकर्षण करती रही थी. उस समय श्रीलंका 9 प्रतिशत के दर से विकास कर रहा था जब कि 2015 में भारत का विकासदर 8 प्रतिशत था. उसी समय 50 साल तक देश को शासित करने और धर्म के आधार पर लोगों को बांट कर सत्ता  में टिके रहने के राजपक्षे परिवार की नीतियों,अक्षमता और कुप्रबंधन ने देश को उस हालत में पहुचा दिया है जहां तबाही का तांडव है. आर्थिक तबाही के शिकार लोगों में ताकतवर महिन्द्रा राजपकक्षे के घर को आग के हवाले कर दिया और राष्ट्रपति भवन के समाने लोग जम कर प्रदर्शन कर रहे हैं और सेना पुलिस के दमन का सामना कर रहे हैं. वैश्विक कर्ज में डूबे श्रीलंका ने कर्ज चुकाने से इंकार कर दिया है. भारत समेत कई देश उसकी मदद के लिए आगे आए हैं लेकिन राजपक्षे परिवार के खिलाफ लोग उबल रहे हैं. महिन्द्रा राजपक्षे ने जनआंदोलन के दबाव में इस्तीफा जरूर दे दिया है. लेकिन इससे हालत सुधर ही जाएंगे कहना मुश्किल है. क्योंकि राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे अब भी पुरानी नीतियों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं दिख रहे हैं. राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे के इस्तीफे की मांग लगातार मजबूत हो रही है. आर्थिक अराजकता के बीच  राजनैतिक अस्थिरता अराजकता को फैला रही है. रास्ता निकलने के बजाय श्रीलंका की हालत हर दिन खराब हो रही है. विदेशी मदद मात्र श्रीलंका को इस तबाही से नहीं बचा सकेंगे. श्रीलंका में  लोगों के लिए अनाज  नहीं है,इलाज के लिए दवाइयां नहीं हैं, विदेशी कर्ज़ चुकाने के लिए पैसे नहीं हैं,राजनीतिक स्थिरता नहीं है और बिजली भी नहीं है. सबसे बड़ा संकट तो यह है कि इन हालतों से निपटने के लिए राजनैतिक नेतृत्व भी नहीं है. सरकार की साख खत्म हो चुकी है और विपक्ष के पास भी ऐसा एजेंडा नहीं दिख रहा है जो तुरत लोगों को घरों में वापस जाने का भरोसा दिला दे. राष्ट्रीय सहमति की सरकार बनाने के बात की जा रही है लेकिन गोटाबाया राजपक्षे को राष्ट्रपति के रूप में स्वीकार करने के लिए जनता तैयार नहीं है. किसी भी देश के इतिहास में ऐसे हालत कम ही आते हैं. श्रीलंका की तबाही की कहानी उस देश के सरकार को खत्म करने के लिये सिर्फ एक समुदाय की भावनाओं को उन्माद में बदल देने के साथ ही शुरू हो गयी थी. गोटाबाया राजपक्षे गर्व से कहते रहे हैं कि वे एक ही समुदाय के वोट के सहारे 50 साल तक शासन कर सकते हैं.उन्माद का ऐसा माहौल बनाया गया कि सरकारी संपत्ति की लूट और भ्रष्टाचार जो देश को भीतर से ही खोखला करती चली गयी.धर्म के जहरीले नशा में डूबी जनता को संकट का जबतक अहसास हुआ जहाज डूबने लगा था. लोकतंत्र को चुनावी तानाशाही में बदलने का ही नतीजा है कि विपक्ष के सवालों को नजरअंदाज किया गया. यही नहीं सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वालों को देशद्रोही जैसा ट्रीट करने की प्रवृति को बढ़ा दिया गया. अल्पसंख्यकों पर हमला करने की पूरी छूट दी गयी और इसका सीधा असर पर्यटन पर पड़ा. श्रीलंका की अर्थव्यवस्था में पर्यटन की बड़ी भूमिका रही है. किसी देश की खद्यान आत्मनिर्भरता किस तरह नष्ट कर दी जाती है इसका एक बड़ा उदाहरण कृषि क्षेत्र में किए गए वे प्रयोग हैं जिसके लिए राजपक्षे परिवार की सनक को जिम्मेदार बताया जा रहा है. कृषि शत प्रतिशत आर्गेनिक बनाने की सनक का ही नतीजा यह है देश अनाज के लिए तरस रहा है. श्रीलंका में संसद को कमजोर बनाने की सुनियोजित प्रवृति ने राजपक्षे परिवार की तानाशाही को मजबूत किया.महेंद्र राजपक्षे अब कह रहे हैं कि अगर उनके इस्तीफ़े से देश का मौजूदा आर्थिक संकट ख़त्म होता है तो वे इसके लिए तैयार हैं. लेकिन महत्वूपर्ण सवाल तो यह है कि श्रीलंका की वर्तमान तबाही की जिम्मेदारी से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बचने का प्रयास कर रहे हैं और इससे लोगों का गुस्सा लगतार उबल रहा है. दुनिया में शायद ही कोई धार्मिक सत्ता वाला राज्य हो जहां लोकतंत्र और विकास लोगों को सहजता से उपलब्ध हो. पाकिस्तान में भी राजनैतिक अस्थिरता के हालत हैं. इमरान खान को सत्ता से हटा कर शहबाज शरीफ ने न केवल तेल और गैस के दाम बढ़ा दिए हैं बल्कि गोश्त और मुर्गी के दाम भी असामान छू रहे हैं. पाकिस्तान में एक मुर्गी 900 रूपए में बिक रही है.पाकिसतानी प्रेस का एक तबका कह रहा है कि शरीफ खनदान के मुर्गी के गोश्त  और चीनी के धंधे में मुनाफे को ध्यान में रखकर दाम को बढ़ाया गया है. चीजों के  दाम तो इतने बढ़ गए हैं कि प्रधानमंत्री को कहना पड़ रहा है कि वे अपने कपड़े बेच देंगे लेकिन आटे का दाम कम करेंगे. पाकिस्तान की यह हालत पिछले तीस सालों के भ्रष्टाचार और आतंकवादियों को पनाह देने की नीति का ही प​रिणाम है. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के खिलाफ 40 अरब के भ्रष्टाचार के केस दर्ज हैं और वे जमानत पर हैं. इमरान खान का आरोप है कि शरीफ सरकार के आधे से ज्यादा मंत्री जमानत पर हैं. पाकिस्तान भी श्रीलंका की तरह आर्थिक तबाही को और तेजी से बढ़ा रहा है. डालर के मुकाबले पाकिस्तानी रूपया रिकार्ड नीचे चला गया है.श्रीलंका या पाकिस्तान तो उदाहरण भर हैं ​दक्षिण एशिया सहित दुनिया के अनेक देशों में जिस तरह दक्षिणपंथी ताकतों का राजनैतिक उभार हो रहा है. कब कौन देश श्रीलंका नहीं बनेगा  कहना मुश्किल है. धार्मिक उन्माद की राजनीति से सावधान होने के ये उदाहरण सामने हैं. [wpse_comments_template]

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