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भाजपा के बड़े नेताओं को एडजस्ट करने के फेर में फंसा नेता विपक्ष का पद

Avinash Ranchi: झारखंड में यह दूसरी बार हो रहा है. विपक्ष के नेता के बिना विधानसभा चल रहा है. 23 नवंबर को झारखंड विधानसभा चुनाव का परिणाम आया. तीन माह से अधिक समय बीत गया. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विधानसभा में अपना नेता नहीं चुन सकी है. एक अदद नेता, जो विधानसभा में भाजपा को जागृत कर सके. दहाड़ सके. और भाजपा को फिर से झारखंड में पुनर्जीवित कर सके. कार्यकर्ता इसी उम्मीद में है कि कोई नेता आएगा जो विधानसभा में दहाड़ेगा और उसी दहाड़ से वह राज्य में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा पाएंगे. विपक्ष के तौर पर मजबूती से लड़ाई लड़ेंगे, लेकिन यहां तो विपक्ष का नेता ही नहीं चुना जा पा रहा है. राज्य के नेता केंद्र की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं और ऐसा लगता है केंद्रीय नेतृत्व को कोई मतलब नहीं है. प्रायोरिटी लिस्ट में तो बिल्कुल नहीं. कुल मिलाकर झारखंड भाजपा ऑटो मोड में है. कहीं ऐसा तो नहीं कि यहां के किसी भी नेता पर केंद्र का विश्वास ही नहीं रहा. क्या केंद्रीय नेतृत्व यह मानने लगा है कि झारखंड में कोई नेता इतना मजबूत या सक्षम नहीं है, जो झारखंड में अपने दम पर कुछ कर सके. जिसे बागडोर दिया जा सके. इससे पहले भी पंचम विधानसभा-2019 में भी भाजपा की यह स्थिति रही. बाबूलाल मरांडी की भाजपा में वापसी हुई. पार्टी ने विधानसभा में उन्हें विपक्ष का नेता बनाया. लेकिन विधानसभा ने इसे नहीं माना. मंजूरी या मान्यता नहीं दी. अंत में थक-हार कर भाजपा ने अमर बाउरी को विपक्ष का नेता बनाया. नेता प्रतिपक्ष को लेकर भाजपा में फिलहाल जो असमंजस है, उसकी एक वजह प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव ना होना भी है. प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष में पार्टी जातीय समीकरण और बड़े कद वाले नेताओं के बीच सामंजस्य नहीं बैठा पा रही है. भाजपा के अंदर खाने में जो चर्चा है, उसके मुताबिक, फारवर्ड क्लास से शायद ही प्रदेश अध्यक्ष या प्रतिपक्ष का नेता बनाया जा पायेगा. इस क्लास के नेताओं को उम्मीद भी नहीं है. पार्टी की नजर ओबीसी और आदिवासी पर है. लेकिन कुड़मी जाति ने बीच में तनाव बढ़ा दिया है. सब जानते हैं, सत्ता में बाहर रहते हुए पार्टी में दो ही पद हैं, जो उन्हें पावरफुल बना सकता है. और वह है नेता प्रतिपक्ष व प्रदेश अध्यक्ष. इस कारण दोनों पद पाने के लिए लॉबिंग और जोड़तोड़ इतनी अधिक है कि केंद्रीय नेतृत्व भी परेशान हो चला है. नेता प्रतिपक्ष का ना होना बड़ा सवाल है. नेता प्रतिपक्ष नहीं बना पाने के कई कारणों में पहला कारण बाबूलाल मरांडी हैं. बाबूलाल मरांडी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हैं. पार्टी विधानसभा चुनाव में बुरी तरह पराजित हुई. यह सवाल उठने लगा है कि आदिवासियों के बीच उनकी पकड़ मजबूत नहीं रही. बाबूलाल मरांडी जेनरल सीट से चुनाव लड़ते हैं. पार्टी में एक तबका उनके विरुद्ध यह बात स्थापित करने में लगा है कि आदिवासी उन्हें अपना नेता नहीं मानते. अगर पार्टी उन्हें दुबारा अध्यक्ष या प्रतिपक्ष का नेता नहीं बनाती है, तो बड़ा सवाल यह है कि उन्हें कहां एडजस्ट किया जाए. दूसरा करण चंपाई सोरेन हैं. चंपाई एक मात्र आदिवासी नेता हैं, जो आदिवासी सीट से जीत हासिल कर सके. उनके नाम को लेकर फिलहाल पार्टी में ही असमंजस की स्थिति है. असमंजस यह कि वो पार्टी में रहेंगे भी या नहीं. और अगर वो बने रहते हैं तो उन्हें भी एडजस्ट करना भाजपा के लिए चुनौती होगी. पार्टी का एक तबका तो यह भी चाहता है कि वो वापस झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) में ही चले जाएं. ताकि एडजस्टमेंट वाली समस्या कुछ कम हो. चंपाई जब पार्टी में आये थे, तब पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह तक ने उन्हें लेकर कसीदे गढ़े थे. तीसरी वजह यह है कि इस विधानसभा चुनाव में यह बात खुलकर सामने आ गया कि महतो, यानी कुड़मी वोटरों ने भाजपा से दूरी बना ली है. अब भाजपा का एक खेमा यह चाहता है कि दोनों में से एक पद किसी महतो जाति के नेता को दिया जाये, ताकि कुड़मी वोटरों को साधा जा सके. वैश्य व कुड़मी की वजह से पार्टी में दो फाड़ की स्थिति है. ओबीसी के नाम पर पार्टी ने ज्यादातर पद वैश्य जाति को दे दिए हैं. जबकि कुड़मी जाति के नेताओं को कम पद मिला है. इस कारण ओबीसी में प्राथमिकता किसे दिया जाये, पार्टी यह तय नहीं कर पा रही है. चौथी वजह रघुबर दास माने जा रहे हैं. वह राज्यपाल का पद छोड़ कर आए हैं. तब से यह चर्चा है कि वह प्रदेश अध्यक्ष बनेंगे और पार्टी को धार देंगे. कुल मिलाकर अभी भाजपा के पास स्थापित आदिवासी और कुर्मी नेता की कृत्रिम कमी नजर आ रही है और जब तक प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव न हो जाए, तब तक नेता प्रतिपक्ष का नाम फाइनल होना संभव नहीं दिखता. हां, इस दौरान बड़े कद वाले नेताओं को भी एडजस्ट करने की कोशिश जरुर होगी.  

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