Gyanendra awasthi
भारत की सरकारी तेल कंपनियां (OMCs) अब केवल व्यापार नहीं कर रहीं, बल्कि उन पर ‘संगठित आर्थिक डकैती’ चलाने के आरोप लग रहे हैं. ‘कंसोर्टियम ऑफ इंडियन पेट्रोलियम डीलर्स’ (CIPD) द्वारा HPCL जैसी कंपनियों को लिखा गया पत्र संकेत देता है कि जनता को जबरन महंगा पेट्रोल खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है.
जबरन वसूली का ‘पावर’ मॉडल
यह पूरा मामला किसी संगठित दबाव तंत्र जैसा दिखाई देता है. आरोप है कि तेल कंपनियों के क्षेत्रीय कार्यालय डीलरों पर साधारण पेट्रोल (EBMS) के बजाय महंगा ‘पावर पेट्रोल’ बेचने का दबाव बना रहे हैं. डीलरों का कहना है कि जब तक वे साधारण पेट्रोल के ऑर्डर को प्रीमियम पेट्रोल में नहीं बदलते, तब तक उनके सप्लाई इंडेंट क्लियर नहीं किए जा रहे. साधारण और प्रीमियम पेट्रोल के बीच लगभग 9 रुपये प्रति लीटर का अंतर है. यानी आम उपभोक्ता की जेब से अतिरिक्त पैसा निकलवाने का सीधा दबाव.

आवश्यक वस्तु अधिनियम की धज्जियां
तेल कंपनियों की यह मनमानी केवल अनैतिक नहीं, बल्कि संभावित रूप से गैरकानूनी भी बताई जा रही है. साधारण पेट्रोल की उपलब्धता को कृत्रिम रूप से सीमित करना आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की भावना के खिलाफ माना जा सकता है. सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि एक तरफ कंपनियां सार्वजनिक रूप से कहती हैं कि ईंधन की कोई कमी नहीं है और दूसरी तरफ साधारण पेट्रोल की सप्लाई पर कथित दबाव बनाया जा रहा है.
उपभोक्ता अधिकारों पर हमला
लोकतंत्र में उपभोक्ता को अपनी पसंद का उत्पाद चुनने का अधिकार होना चाहिए. लेकिन अगर कंपनियां तय करेंगी कि आपकी गाड़ी में क्या डलेगा और आपको कितना महंगा ईंधन खरीदना पड़ेगा, तो यह सीधे उपभोक्ता अधिकारों पर हमला है. डील
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