
श्रीनिवास
1975 और 2026 के दिल्ली का नजारा देख कर तो ऐसा ही लगता है! परिदृश्य वही, पात्र बदल गये हैं. ‘इतिहास अपने को दोहराता है.’ कार्ल मार्क्स की यह पंक्ति बहुत प्रसिद्ध है, बार-बार कोट की जाती है- 'History repeats itself, first as tragedy, second as farce. (हिंदी में- ‘इतिहास खुद को दोहराता है- पहली बार त्रासदी के रूप में, दूसरी बार प्रहसन के रूप में.') इसी भाव और रूप की पंक्ति मार्क ट्वेन की है : 'इतिहास खुद को दोहराता नहीं, पर तुकबंदी जरूर करता है.’ जवाहर लाल नेहरू की यह पंक्ति भी सटीक है- ‘इतिहास खुद को दोहराता है, पर हर बार नये वेश में.’
अब जरा 1975 और 2026 के परिदृश्य की तुलना करें- 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का चुनाव (1971) रद्द कर दिया. तब विपक्ष ने इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग की. जवाब में कांग्रेस भी इंदिरा गांधी के सरकारी आवास पर भीड़ जुटा कर प्रदर्शन करने लगी. उस समय ये नारे लग रहे थे- ‘कोर्ट को जनादेश रद्द करने का अधिकार नहीं.’.. 'इंदिरा तुम संघर्ष करो, देश तुम्हारे साथ है.' ‘देश की पुकार- इंदिरा गांधी’. सड़कों पर जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा का पुतला भी जलाया गया.
उसी समय कांग्रेस नेता देवकांत बरुआ ने नारा दिया था- ‘तेरे शाम की जय, तेरे सुबह की जय.' ‘इंडिया इज इंदिरा एंड इंदिरा इज इंडिया' दिसंबर 1974 में नेहरू स्मारक पर कहा था, पर चर्चित जून 1975 में हुआ! उन्होंने ही 20 जून 1975 को बोट क्लब (दिल्ली) की रैली में. कहा- तेरी सुबह की जय, तेरे शाम की जय, तेरे काम की जय, तेरे नाम की जय.
वह चाटुकारिता की पराकाष्ठा थी. देवकांत बरुआ को ईनाम भी मिला, जून 1975 में ही कांग्रेस के अध्यक्ष बन गये, शंकर दयाल शर्मा की जगह- 1977 के अंत तक, यानी इमरजेंसी के पूरे दौर में अध्यक्ष रहे.
तब विपक्ष का नारा वैसा ही था, जो आज मौजूदा विपक्ष का है- ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’- दिनकर की कविता से, जिसे जेपी ने 25 जून को रामलीला मैदान में बुलंद किया था.
"इंदिरा तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं" बाद में हर पार्टी ने अपना लिया. ‘देश तुम्हारे साथ है’ वाला रूपांतर भी वहीं से निकला.
आज एक बार फिर देश वैसी ही चाटुकारिता का गवाह बन रहा है! एक व्यक्ति (प्रधानमंत्री) को देश का पर्याय घोषित कर दिया गया है. स्वाभाविक ही उनकी आलोचना को देश का (और हिंदू धर्म-समाज का भी) अपमान बना दिया गया है! अतीत से एक कदम आगे, अब नरेंद्र मोदी ने खुद को नन-बायोलॉजीकल घोषित कर दिया है, जिसे ‘परमात्मा' ने किसी खास मकसद से भेजा है! तो ऐसे ‘अवतार’ की आलोचना तो स्वाभाविक ही ‘ईशनिंदा’ की श्रेणी का अपराध है! वह किसी भी नियम-कानून से परे हैं!
बेशक अभी प्रधानमंत्री पर सीधे कोई आरोप नहीं है, न ही उनके इस्तीफे की मांग हो रही है. मगर ज्ञानेश कुमार पर जो भी आरोप हैं, उस अनुरूप उन्होंने कोई गड़बड़ी की है (और अब यह लगभग स्पष्ट हो चुका है), तो उसके लिए जवाबदेह मोदी और शाह हैं, उस कथित गड़बड़ी के लाभुक भी. उनकी पार्टी भी. इसीलिए भाजपा पूरी ताकत और आक्रामकता के साथ उनके बचाव में उतर गयी है.
एक नवंबर की रैली को फ्लॉप बता दिया गया है! सोशल मीडिया और सड़कों पर ‘मोदी कहीं नहीं जायेगा’ का अभियान चल रहा है! मोदी को ‘भारतरत्न’ देने की मांग हो रही है! राहुल गांधी और विपक्षी दलों को विदेशी ताकतों का एजेंट कहा जा रहा है! इंदिरा गांधी भी तब ऐसा ही कह रही थी, जेपी तक पर यह आरोप लगाया गया!
जो भी हो- कहा जाता है कि बाद में बरुआ ने कहा था- ‘इंडिया इज इंदिरा’ वाला नारा मेरी भूल थी, मैंने चापलूसी में कह दिया था. आज सत्ता पक्ष में किसी की रीढ़ में इतनी जान बाकी है? या किसी का जमीर ऐसा है कि वह कह सके कि हां, हमने चाटुकारिता की, जो नहीं करनी चाहिए थी! वैसे बरुआ ने भी वैसा तभी कहा होगा, जब इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर हो गयीं. तो क्या मोदी की विरुदावली गा रहे लोग भी उस दिन का इंतजार कर रहे हैं, जब...