- नदी का गंदा पानी पी रहे बैगा-बिरहोर
- डीसी ने बीडीओ को दिए तत्काल सुधार के सख्त निर्देश
Chatra : जिले के सुदूरवर्ती प्रखंडों में भीषण गर्मी और तपती धूप के बीच बूंद-बूंद पानी के लिए त्राहिमाम है. यहां प्रतापपुर, कुंदा, कान्हाचट्टी और लावालौंग प्रखंडों से सामने आई तस्वीरें सरकारी ‘हर घर नल से जल’ योजना की जमीनी स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं.
प्रतापपुर प्रखंड के सिद्दीकी पंचायत स्थित हेसातू गांव के परहिया टोला में बैगा, बिरहोर और गंझू समुदाय के लोग आज भी मूलभूत पेयजल सुविधा से वंचित हैं. ग्रामीणों को मजबूरन नदी की गंदी जलधारा से या रेत में चूआ खोदकर निकले मटमैले पानी को पीना पड़ रहा है.
स्थिति इतनी गंभीर है कि कई गांवों में चापाकल और जलमीनार सूख चुके हैं, जिससे ग्रामीणों को पीने के पानी के लिए भारी संकट का सामना करना पड़ रहा है.

ग्रामीणों के अनुसार, गंदा पानी पीने से बच्चे बीमार हो रहे हैं और इलाज का खर्च बढ़ता जा रहा है. स्थिति यह है कि गांव के स्कूलों में संचालित मध्यान भोजन तक बंद है.
गांव की महिला पार्वती देवी ने बताया कि मुखिया से कई बार शिकायत की गई, इसके बावजूद कोई स्थायी समाधान नहीं हुआ. चापाकल और जलमीनार सूख चुके हैं.
ऐसे में नदी की गंदी जलधारा से या रेत में चूआ खोदकर निकले मटमैले पानी को पीना पड़ रहा है. गंदा पानी पीने से बच्चे बीमार पड़ रहे हैं और इलाज में सारा पैसा खर्च हो जा रहा है.

पार्वती देवी का कहना है कि उनका दर्द इस टोले के हर घर की कहानी है. यहां प्यास सिर्फ गला नहीं सुखा रही, बल्कि मासूमों की सेहत से भी खिलवाड़ कर रही है. गंदा पानी पीने से बच्चे संक्रमण का शिकार हो रहे हैं, लेकिन प्रशासन की फाइलें अभी भी ठंडे बस्ते में हैं.

ग्रामीण महेंद्र बैगा ने कहा कि एक ओर जल मीनार और नल-जल योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं. वहीं धरातल पर आदिम जनजातियों के हिस्से सिर्फ गंदा पानी और बीमारियां आई हैं.
उनका कहना है कि आदिम परिवारों पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है. ऐसे में वे बालू का चूआ बनाकर पानी पीने को मजबूर हैं. कहा कि जल स्तर गिरने से कुएं और चापाकल जवाब दे चुके हैं.

अब नदी ही एकमात्र विकल्प बची है. अगर यह भी सूख गया, तो प्यासे मरने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा. मांग की कि जलमीनार और चापाकल जल्द ठीक कराए जाएं.

इस मामले में जब चतरा उपायुक्त रवि आनंद से सीधा सवाल पूछा गया, तब जाकर सिस्टम की नींद टूटी. उन्होंने मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए हैं.
साथ ही प्रतापपुर बीडीओ को आदेश दिया है कि प्रभावित गांवों में चापाकल और जलमीनार को प्राथमिकता के आधार पर दुरुस्त किया जाए, ताकि ग्रामीणों को राहत मिल सके.

डीसी ने आश्वासन तो दे दिया है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर आदिम जनजातियों के नाम पर आने वाला बजट जाता कहां है? क्या प्रशासन की नींद तभी खुलती है, जब कैमरा उनकी नाकामियों को सरेआम करता है?
अब देखना यह होगा कि हेसातू गांव के परहिया टोला को प्यास से आजादी मिलती है या ये गरीब आदिवासी गांव एक बार फिर आश्वासन की गंदी जलधारा पीने को मजबूर रहेंगे.




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