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प्रियंका गांधी का आरोप, चुनावी बांड पर फैसले के बाद न्यायपालिका पर दबाव बना रही मोदी सरकार...

  600 से अधिक वकीलों द्वारा भारत के प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ को 26 मार्च को लिखे गये पत्र में कहा गया है, उनकी दबाव की रणनीति राजनीतिक मामलों में, विशेषकर उन मामलों में सबसे ज्यादा स्पष्ट होती है जिनमें भ्रष्टाचार की आरोपी राजनीतिक हस्तियां होती हैं. New Delhi :  कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने केंद्र पर उच्चतम न्यायालय द्वारा चुनावी बांड योजना को रद्द किये जाने के बाद न्यायपालिका पर दबाव डालने का आरोप लगाया. सवाल किया कि क्या नरेन्द्र मोदी सरकार को स्वतंत्र और मजबूत न्यायपालिका मंजूर नहीं है. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा की यह टिप्पणी ऐसे समय आयी है जब वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा समेत कुछ अन्य वकीलों की ओर से प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ को पत्र लिखकर न्यायपालिका पर दबाव डालने और अदालतों को बदनाम करने के प्रयास के आरोप लगाये जाने के बाद प्रधानमंत्री  मोदी ने कांग्रेस पर निशाना साधा था.                                                                                       ">https://lagatar.in/category/desh-videsh/">

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पत्र लिखवाकर न्यायिक ढांचे को दबाव में लाने की कोशिश की जा रही है

दावा किया था कि दूसरों’ को धमकाना और धौंस दिखाना विपक्षी पार्टी की ‘पुरानी संस्कृति है. प्रियंका गांधी ने शनिवार को सोशल मीडिया मंच एक्स पर पोस्ट किया, चुनावी बांड (जनता इसे वसूली रैकेट कह रही है) पर उच्चतम न्यायालय के एक निर्णय से घोटालों की परतें खुलती देख जिस ढंग से पत्र लिखवाकर न्यायिक ढांचे को दबाव में लाने की कोशिश की जा रही है और फिर स्वयं प्रधानमंत्री का अखाड़े में उतरकर न्यायपालिका पर नकारात्मक टिप्पणी करना बताता है कि दाल में कुछ ज्यादा ही काला है कोई न कोई ऐसी बात है जिसे लेकर शायद वह स्वयं घबराए हुए हैं.

क्या मोदी जी की सरकार को एक स्वतंत्र और सशक्त न्यायपालिका मंजूर नहीं है?  

उन्होंने लिखा, राजनीतिक हस्तक्षेप से त्रस्त उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों का संवाददाता सम्मेलन करना, न्यायाधीश को राज्यसभा भेजना, न्यायाधीश को प्रत्याशी बनाकर चुनाव में उतारना, न्यायाधीशों की नियुक्ति पर भी नियंत्रण का प्रयास करना और अपने विरुद्ध निर्णय आने पर न्यायपालिका के ऊपर टिप्पणी करना…. क्या मोदी जी की सरकार को एक स्वतंत्र और सशक्त न्यायपालिका मंजूर नहीं है?  600 से अधिक वकीलों द्वारा भारत के प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ को 26 मार्च को लिखे गये पत्र में कहा गया है, उनकी दबाव की रणनीति राजनीतिक मामलों में, विशेषकर उन मामलों में सबसे ज्यादा स्पष्ट होती है जिनमें भ्रष्टाचार की आरोपी राजनीतिक हस्तियां होती हैं. ये रणनीतियां हमारी अदालतों के लिए हानिकारक हैं और हमारे लोकतांत्रिक ताने-बाने को खतरे में डालती हैं. आधिकारिक सूत्रों द्वारा साझा किये गये पत्र में बिना नाम लिये वकीलों के एक वर्ग पर निशाना साधा गया है और आरोप लगाया गया है कि वे दिन में नेताओं का बचाव करते हैं और फिर रात में मीडिया के माध्यम से न्यायाधीशों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं.

प्रियंका गांधी ने बढ़ते कर्ज को लेकर सरकार पर साधा निशाना

इसके अलावा प्रियंका गांधी ने भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की, 14 लाख करोड़ रुपये से अधिक उधार लेने के उसके प्रस्ताव को लेकर आलोचना की. सवाल किया कि सरकार राहत देने के बजाय लोगों को कर्ज के बोझ तले क्यों दबा रही है जबकि उन पर पहले से ही `बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक संकट का बोझ` बढ़ता जा रहा है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले महीने अपने बजट भाषण में, एक अप्रैल से शुरू होने वाले अगले वित्तीय वर्ष में राजस्व की कमी को पूरा करने के लिए दिनांकित प्रतिभूतियां जारी कर बाजार से 14.13 लाख करोड़ रुपये जुटाने का प्रस्ताव रखा था

10 वर्ष में अकेले मोदी जी ने कर्ज  बढ़ाकर 205 लाख करोड़ पहुंचा दिया

. प्रियंका गांधी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ‘वित्त मंत्रालय का कहना है कि भारत सरकार मौजूदा वित्त वर्ष में 14 लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज लेने जा रही है. क्यों?  हिंदी में किये गये पोस्ट में उन्होंने कहा, आजादी के बाद से वर्ष 2014 तक, 67 सालों में देश पर कुल कर्ज 55 लाख करोड़ था. पिछले 10 वर्ष में अकेले मोदी जी ने इसे बढ़ाकर 205 लाख करोड़ पहुंचा दिया. मोदी सरकार ने बीते 10 सालों में लगभग 150 लाख करोड़ कर्ज लिया. आज देश के हर नागरिक पर लगभग डेढ़ लाख रुपये का औसत कर्ज बनता है. यह पैसा राष्ट्रनिर्माण के किस काम में लगा? उन्होंने लिखा, ‘क्या बड़े पैमाने पर नौकरियां पैदा हुईं या नौकरियां गायब हो गयी?

क्या किसानों की आमदनी दोगुनी हो गयी?

क्या किसानों की आमदनी दोगुनी हो गयी? क्या स्कूल और अस्पताल चमक उठे? पब्लिक सेक्टर (सार्वजनिक क्षेत्र) मजबूत हुआ या कमजोर कर दिया गया? क्या बड़ी-बड़ी फ़ैक्ट्रियां और उद्योग लगाये गये? अगर ऐसा नहीं हुआ, अगर अर्थव्यवस्था के कोर सेक्टर्स में बदहाली देखी जा रही है, अगर श्रम शक्ति में गिरावट आयी है, अगर छोटे-मध्यम कारोबार तबाह कर दिये गये- तो आखिर यह पैसा गया कहां? किसके ऊपर खर्च हुआ? इसमें से कितना पैसा बट्टेखाते में गया? बड़े-बड़े खरबपतियों की कर्जमाफी में कितना पैसा गया? [wpse_comments_template]  

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