Washington : संसद में फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट (FCRA) में प्रस्तावित संशोधन बिल लाये जाने की आशंका से अमेरिकी राजनीति में खलबली मची हुई है. ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के सांसद राइली मूर ने इस प्रस्तावित बिल की आलोचना करते हुए इसे ईसाई समुदाय पर सीधा हमला करार दिया है.
साथ ही राइली मूर ने चेतावनी दी है कि यह भारत-अमेरिका के बीच द्विपक्षीय मुद्दा बन सकता है. राइली मूर ने FCRA में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर आरोप लगाया है कि इस कानून से सरकार को चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं पर शिकंजा कसने की अनुमति मिल जायेगी.
उनकी यह टिप्पणी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि संसद में जारी मॉनसून सत्र के दौरान इस बिल पर बहस हो रही है.अमेरिकी सांसद राइली मूर ने एक्स पर पोस्ट कर प्रस्तावित संशोधनों पर चिंता जताई है. इससे पूर्व भारत में ईसाई धर्म के लंबे इतिहास को याद किया है.
उन्होंने कहा, ईसाई समुदाय भारत में उस समय से है, जब सेंट थॉमस अपोस्टल ने प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान के कुछ ही दशकों बाद मालाबार तट की यात्रा की थी. ईसाई धर्म के इस लंबे इतिहास के बावजूद भारतीय संसद FCRA नियमों में संशोधन करने की सोच रही है.
राइली मूर नेआरोप लगाया कि भारत सरकार चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं का नियंत्रण अपने हाथ लेने के लिए ऐसा कर रही है.बता दें कि यदि FCRA में प्रस्तावित संशोधनों वाला यह बिल पास हो जायेगा तो नया कानून तय करेगा कि NGO, चैरिटेबल ट्रस्ट, शैक्षणिक संस्थान, धार्मिक निकाय और संस्थाओं को विदेशी चंदा कैसे मिलेगे और उसका इस्तेमाल वे किस तरह कर सकते हैं.
प्रस्तावित संशोधन बिल के बैकग्राउंड नोट में बताया गया है कि 15 जुलाई 2026 तक भारत में 14,449 सक्रिय FCRA पंजीकरण है. 22,498 पंजीकरण रद्द कर दिये हैं. 15,212 की समय-सीमा समाप्त हो गयी है.
बताया गया है 2019 और 2022 के बीच इस अधिनियम के तहत पंजीकृत संगठनों ने 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी चंदा हासिल किया.नये नियम के तहत केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त एक नामित प्राधिकरण (Designated Authority) के पास विदेशी चंदे और उन फंडों से बनाई गयी संपत्तियों का प्रबंधन अपने हाथ में लेने का पावर होगा.
FCRA में प्रस्तावित संशोधन बिल विपक्षी पार्टियां, NGO सहित कई सिविल सोसाइटी ग्रुप को रास नहीं आ रहा है. इनकी दलील कि नये संशोधनों से केंद्र सरकार को विदेशी फंडिंग पर निर्भर संगठनों पर अत्यधिक कंट्रोल मिल जायेगा.
चर्च और धार्मिक संगठन इस बात पर चिंतित हैं कि कभी अगर उनका रजिस्ट्रेशन खत्म हो जाये या रद्द कर दिया जाये तो विदेशी चंदे की सहायता से दशकों में बनाए गए स्कूल, अस्पताल, कल्याणकारी संस्थान और दूसरी संपत्तियां सरकार नियंत्रण में ले सकती है.
जानकारी के अनुसार विदेशी योगदान पर निर्भर रहने वाले केरल और मिजोरम में शैक्षणिक और स्वास्थ्य सेवा संस्थान चलाने वाले ईसाई संगठन सर्वाधिक चिंतित हैं. अहम बात यह है कि केंद्र सरकार इन प्रस्तावित संशोधनों का बचाव में उतर आयी है. उसने कहा है कि यह विदेशी फंड के इस्तेमाल में पारदर्शिता लाने, निगरानी मज़बूत करने और ज्यादा जवाबदेही सुनिश्चित करने के उपाय के तहत है.
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