में अनोखी शादी, 36 इंच का दूल्हा और 34 इंच की दुल्हन
तांत्रिक विधि से होती है पूजा
उक्त मंदिर में तांत्रिक विधि से पूजा होती है. जिसके तहत प्रतिदिन पाठा (खस्सी), भेड़ा अथवा काड़ा (भैसा) की बलि दी जाती है. मान्यता है कि अगर किसी दिन बलि नहीं हो पाई तो रात 12 बजे के पहले मां के दरबार में खस्सी, भेड़ा अथवा भैंसा (कोई एक) स्वयं चलकर पहुंच जाता है. जिसे सेवादार भोग के रूप में मां को अर्पित कर देते हैं. बैशाख एवं कार्तिक मास की अमावस्या पर इस प्राचीन काली मंदिर में रक्षा काली पूजा का आय़ोजन किया जाता है. उस दिन पूरी रात बलि दी जाती है.तारापीठ की तर्ज पर मां को मदिरा चढ़ाया जाता है
[caption id="attachment_302956" align="aligncenter" width="300"]alt="" width="300" height="297" /> अनिर्बन भट्टाचार्य.[/caption] काली मंदिर के सेवादार अनिर्बन भट्टाचार्य ने बताया कि बड़ी काली माता की पूजा प. बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित तारापीठ की तर्ज पर तांत्रिक विधि से होती है. इस दौरान मां को प्रसन्न करने के लिये बलि के अलावे मदिरा का भोग लगाया जाता है. उन्होंने बताया कि आज जहां माता का मंदिर हैं वह स्थल पहले दुर्गम एवं बीहड़ क्षेत्र था. लोग आने से डरते थे. चूंकि यह क्षेत्र काशीपुर राजा के अधीन था. इसलिए माता के प्रकट होने के बाद काशीपुर राजा के द्वारा सबसे पहले पूजा की शुरुआत की गई. आज उक्त मंदिर की प्रसिद्धि इतनी फैल गई है कि लोग दूर-दूर से पूजा चढ़ाने के लिये आते हैं.
लॉकडाउन के कारण 2020 में नहीं लगा था मेला
[caption id="attachment_302963" align="aligncenter" width="300"]alt="" width="300" height="297" /> उज्ज्वल कुमार चटर्जी.[/caption] स्थानीय निवासी उज्ज्वल कुमार चटर्जी ने बताया कि बड़ी काली माता का मंदिर प्राचीन एवं सदियों पुराना है. आज भी काशीपुर राजा के वंशजों की ओर से प्रथा का पालन किया जाता है. हालांकि मंदिर के संचालन के लिये एक कमिटी बनी है. लेकिन लोगों की रजामंदी से मौतोर गांव के भट्टाचार्य एवं बनर्जी परिवार को पुरोहित की जिम्मेदारी सौंपी गई है. उक्त दोनों परिवार द्वारा ही बारी-बारी से जिम्मेदारियों का निर्वाह किया जाता है.
श्रद्धालुओं के ठहरने की निशुल्क व्यवस्था
[caption id="attachment_302966" align="aligncenter" width="300"]alt="" width="300" height="274" /> राणा बनर्जी.[/caption] स्थानीय निवासी सह समाजिक कार्यकर्ता राणा बनर्जी ने बताया कि मंदिर की ख्याति दूर-दूर तक फैली हैं. प. बंगाल के अलावे, झारखंड, बिहार से लोग पूजा करने के लिये आते हैं. चूंकि अमावस्या को रात में पूजा होती है. ऐसे में बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के ठहरने की व्यवस्था कमिटी की ओर से निशुल्क व्यवस्था की जाती है. मंदिर के समीप सामुदायिक हॉल बनवाए गए हैं. जहां लोगों को बैठाकर भोग खिलाया जाता है. उन्होंने कहा कि मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालु अपने सामर्थ्य के अनुसार मंदिर में चढ़ावा भेंट करते हैं. इसे भी पढ़ें: चिंताजनक">https://lagatar.in/worrying-starvation-in-53-countries-40-million-more-people-in-food-crisis-in-2021/">चिंताजनक
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