Faisal Anurag क्या क्रूर और बर्बर दमन के लिए जिम्मेदार भाजपा केंद्रीय मंत्री के पुत्र और मंत्री को न्याय के कटघरे में खड़ा किया जा सकेगा? भारत के अनेक जनसंहारों के बाद देखा गया है, समय के साथ दोषी और अपराधी न केवल बचा लिए जाते हैं बल्कि न्याय तरसता रह जाता है. लखीमपुर खीरी की घटना ऐसे समय में अंजाम दी गयी है जब उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव दस्तक दे चुका है. भाजपा की दुविधा साफ दिख रही है कि वह मंत्री के जाति प्रभाव के साथ खड़ रहे या फिर किसानों को न्याय मिले इस रास्ते में कोई बाधा नहीं खड़ा करे. वैसे भी भाजपा में मंत्रियों के इस्तीफे नहीं लिए जाते जैसा कि भाजपा के बड़े नेता अक्सर कहते रहते हैं. केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र टेनी ने जरूर गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की. अब टेनी ने ही कह दिया है कि वे सम्मन नहीं किए गए थे, खुद ही मिलने चले गए. चूंकि लखीमपुर खीरी का इतिहास बताता है कि वहां वर्चस्वशाली जातियों के कारण किसानों की स्वायत्तता, जमीन के मालिकाने और उपज पर नियंत्रण को लेकर विवाद होते रहे हैं. तीन कृषि कानूनों के विरोध में जिस तरह किसानों की भागीदारी और प्रतिबद्धता बढ़ी है, उससे टेनी समर्थकों ने किसानों के खिलाफ बदले की भावना की मंशा का बार-बार प्रदर्शन किया है. Institute for Development and Communication (IDC) चंडीगढ़ के निदेशक प्रमोद कुमार ने अपने लेख में इतिहास के इस पहलू पर विस्तार से लिखा है. प्रमोद कुमार के अनुसार : लखीमपुर खीरी की घटना किसान विरोधी और किसान-समर्थक प्रदर्शनकारियों के बीच संघर्ष तो है और पुराने शासन के पुराने मुद्दों और प्रमुख उच्च जातियों के धार्मिक-जाति आक्रोश का नतीजा भी है. यह भी साफ होता जा रहा है कि इस जनसंहार ने योगी सरकार को बैकफुट पर खड़ा कर दिया है. चुनावी कामयाबी हो या नहीं, लेकिन यूपी में प्रियंका गांधी को इसका बड़ा लाभ मिला है. हालांकि समाजवादी पार्टी भी इस जनसंहार के राजनैतिक फलाफल को अपनी तरफ करने में लगी हुई है. इस हत्याकांड के बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया किसान जातियों में हुई है, उससे साफ जाहिर होता है कि यूपी के विधानसभा चुनाव के अनेक समीकरण बदल जाएंगे और किसानों का सवाल मुख्य बन सकता है. तीन कृषि कानूनों को लेकर केंद्र के विकल्प सीमित होते जा रहे हैं. यूपी के साथ पंजाब की राजनीति में भी लखीमपुर खीरी नरसंहार के असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. इस हत्याकांड ने राजनीति और सत्ता के अनेक परतों को उजागर कर दिया है. लखीमपुर से वापसी के बाद प्रियंका गांधी ने अपनी मांग तेज कर दी है कि केंद्रीय कैबिनेट से अजय मिश्र टेनी को बर्खास्त किया जाए और उनके बेटे को गिरफ्तार किया जाए. जांच के नाम पर भी यह मामला यदि लंबा हुआ तो इसका राजनीतिक नुकसान तो भाजपा को ही उठाना होगा.यह यूपी के अधिकांश राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं. संयुक्त किसान मोर्चा के नेता राकेश टिकैत ने भी कह दिया है कि योगी सरकार के पास मात्र छह दिन हैं. इस समय सीमा में वह टेनी के पुत्र को गिरफ्तार करें या फिर किसान संगठनों के कड़े प्रतिरोध का सामना करने को तैयार रहें. लखमीपुर खीरी तिकोनिया नरसंहार के दोषियों को भी चुनावी अंकगणित की कठोर गणना के नजरिए से इस्तेमाल करने के किसी भी प्रयास को किसान स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं. इसलिए वे पूरी सतर्कता के साथ घटनाक्रम को देख रहे हैं. प्रेक्षक मान रहे हैं, जिन मुद्दों के कारण विरोध हुआ उन्हें जल्द से जल्द सुलझाया जाना चाहिए. यानी तीन कृषि कानूनों पर किसानों की मांग को मान लेने के अलावा सरकार के पास ज्यादा विकल्प भी नहीं है. इस हत्याकांड के बाद किसानों के प्रतिरोध के और ज्यादा तेज होने की संभावना बलवती हुई है. तिकोनिया नरसंहार तो भारत की न्याय व्यवस्था की भी परीक्षा है कि बर्बर और अनियंत्रित सत्ता मद को दंडित किया जाएगा या फिर आम गरीब किसान मजदूरों को कुचल देने की प्रवृति मजबूत होगी. लखीमपुर खीरी की घटना ने शासन के भेदभावपूर्ण जातिवादी- सांप्रदायिक नजरिए व तरीके की रूपरेखा को उजागर किया भी किया है. कॉरपारेटपरस्त नीतियों को प्रभावी बनाने के लिए इस रूपरेखा के इस्तेमाल के अनेक प्रयोग देखे जा सकते हैं. एक लोकतंत्र में जिस तरह थार जीप को किसानों की भीड़ पर बिना किसी भय के दौड़ा दिया गया और किसानों को कुचल कर मार दिया गया, उससे जाहिर होता है कि देश की राजनीति पर किस तरह के तत्वों ने कब्जा जमा लिया है. भारत तो पहले ही लोकतंत्र के वैश्विक रैंकिंग में काफी नीचे खिसक चुका है. किसान नेताओं को भी यह लग रहा है तिकोनिया नरसंहार उनके लिए 315 दिनों की सबसे बड़ी चुनौती ओर परीक्षा है जिस पर उन्हें खरा उतरना ही होगा. [wpse_comments_template]
सवाल है जीप दौड़ा कर कुचलने वाले दंडित होगे या फिर सत्ता उसे बचा लेगी!
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