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भागवत और शाह के बयानों से पैदा सवाल

दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन संपन्न हो गया. यह सफल रहा या असफल, इस बाबत कूटनीतिक और सामरिक विशेषज्ञों में मतैक्य नहीं है. फिर भी इसमें ब्रिक्स देशों के राष्ट्राध्यक्षों के आने और साझा घोषणा पत्र जारी हो जाने से इसे विफल तो नहीं ही कहा जा सकता. सच यह भी है कि चीन कभी भी किसी प्रकार से भारत का न तो भला चाहेगा और ना ही अपने ऑल वेदर फ्रेंड पाकिस्तान के विरुद्ध तनकर खड़ा होगा. अमेरिका भी चीन के खिलाफ बाहें जितनी चढ़ाये, वह एक सीमा से आगे नहीं बढ़ेगा. इस महीने शी जिनपिंग अमेरिका जायेंगे और डोनाल्ड ट्रंप नवंबर में बीजिंग पहुंचने वाले हैं जहां पुतिन भी पहुंचेंगे. यही राजनय है और इसे समझने में दिमाग चकरा जाएगा.
 
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बैजनाथ मिश्र

दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन संपन्न हो गया. यह सफल रहा या असफल, इस बाबत कूटनीतिक और सामरिक विशेषज्ञों में मतैक्य नहीं है. फिर भी इसमें ब्रिक्स देशों के राष्ट्राध्यक्षों के आने और साझा घोषणा पत्र जारी हो जाने से इसे विफल तो नहीं ही कहा जा सकता. सच यह भी है कि चीन कभी भी किसी प्रकार से भारत का न तो भला चाहेगा और ना ही अपने ऑल वेदर फ्रेंड पाकिस्तान के विरुद्ध तनकर खड़ा होगा. अमेरिका भी चीन के खिलाफ बाहें जितनी चढ़ाये, वह एक सीमा से आगे नहीं बढ़ेगा. इस महीने शी जिनपिंग अमेरिका जायेंगे और डोनाल्ड ट्रंप नवंबर में बीजिंग पहुंचने वाले हैं जहां पुतिन भी पहुंचेंगे. यही राजनय है और इसे समझने में दिमाग चकरा जाएगा. 

 

दरअसल, सबको अपनी पड़ी है और कोई भी अपने नुकसान की कीमत पर किसी की मदद नहीं करने वाला है. भारत को मकड़ी के जालों की तरह बुनी गयी कूटनीतिक पहेलियों को सुलझाते हुए अपनी प्रासंगिकता बनाये रखने की कोशिश करनी ही होगी. ब्रिक्स के दिल्ली सम्मेलन को इसी रुप में देखना ठीक होगा. 

 

लेकिन इसी बीच देश के दो दिग्गजों संघ प्रमुख मोहन भागवत और गृह मंत्री अमित शाह की दो घोषणाओं या बयानों ने देश के राजनीतिक मिजाज पर विमर्श के लिए विवश कर दिया है. मोहन भागवत का कहना है कि यूजीसी का दिशा-निर्देश कानून की शक्ल नहीं लेगा, तो अमित शाह ने कहा है कि 2029 से पहले राजग शासित राज्यों में यूसीसी (समान नागरिक संहिता) लागू हो जाएगी. 

 

पहले मोहन जी के बयान पर विचार करें. उन्होंने किस हैसियत से कहा है कि यूजीसी ने उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता बनाने के उद्देश्य से जो दिशा-निर्देश जारी किया है, वह न तो कानून बना है, न कभी बनेगा? दूसरा यह कि उनसे यदि इस मुद्दे पर सरकार के किसी प्रभावशाली व्यक्ति से बात हो चुकी है, तब तो ठीक है, अन्यथा सरकार में उनकी अथॉरिटी क्या है? इससे क्या विपक्षियों का यह आरोप सही साबित नहीं होगा कि नरेंद्र मोदी की सरकार संघ चला रहा है? सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यूजीसी के दिशा-निर्देशों के विरुद्ध सामान्य वर्ग के छात्रों के आक्रोश से सरकार ही नहीं, संघ भी घबराया हुआ है? 

 

सही है कि संघ और भाजपा के बीच दीया-बाती का रिश्ता है. सरकार भी प्रचारक और स्वयंसेवक ही चला रहे हैं. लेकिन क्या संघ और भाजपा के बीच जो सम्माजनक बारीक विभाजक रेखा थी या है, वह भी मिट गई है? 

 

उल्लेखनीय है कि इसी साल फरवरी में यूजीसी ने उच्च शिक्षण संस्थानों के कैंपस में समानता बहाल करने के मकसद से एक नया दिशा-निर्देश जारी किया था. इसका तीव्र विरोध हुआ. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया और वहां से इस दिशा-निर्देश पर रोक लग गई. पिछले सात महीने से यथास्थिति बनी हुई है और यूजीसी का 2012 का पुराना दिशा-निर्देश प्रभावी है. 

 

लेकिन उस समय भागवत जी ने मुंह नहीं खोला था और आज दो टूक शब्दों में कह रहे हैं कि नया दिशा-निर्देश हरगिज लागू नहीं होगा तो क्या उन्हें भी इसके नफा-नुकसान का भान हो गया है? तो क्या यह भी मान लिया जाए कि सामान्य वर्ग की नाराजगी की आंच से संघ का आसन भी विचलित हो गया है? 

 

अब तो सरकार भी इस मसले पर पीछे हटने का संकेत दे रही है, लेकिन भागवत के दो टूक के बाद सामान्य वर्ग के छात्रों को थोड़ी आश्वस्ति आवश्य मिली होगी.

 

खैर, दूसरी ओर अमित शाह ने एनडीए साशित राज्यों में यूसीसी लागू करने की घोषणा कर एक तरह से सांपों के बिल में पानी डाल दिया है या कबूतरों के बाड़े में बिल्ली छोड़ दी है. कांग्रेस के बड़े नेता इस बारे में कुछ नहीं बोल रहे हैं, लेकिन मुस्लिम संगठनों के उलेमा बयानों की तलवार भांजते हुए मैदान में उतर गये हैं. ओवैसी जैसे कुछ नेता अपने बयानों से फड़फड़ाने का संकेत तो दे रहे हैं लेकिन वे कोई सियासी गोलबंदी में अभी कामयाब नहीं हुए हैं. 

 

अलबत्ता जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मुखिया अरशद मदनी ने कहा है कि मुसलमान अपने मजहब और शरीयत से समझौता नहीं कर सकता. उन्होंने सवाल खड़ा किया है कि देश संविधान के हिसाब से चलेगा या किसी राजनीतिक दल के वैचारिक एजेंडे के आधार पर? 

 

अब मदनी साहब को कौन समझाये कि यूसीसी की आवश्यकता संविधान ने ही बतायी है और सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि सरकार इस बारे में पहल करे. यदि संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में यूसीसी का जिक्र नहीं होता तो राज्य किस आधार पर यूसीसी बनायेंगे और लागू करेंगे? यदि मदनी और उनके समर्थकों को इस तथ्य पर यकीन नहीं है तो वे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा क्यों नहीं खटखटाते? 

 

यदि कोई सरकार संविधान को दरकिनार करते हुए कानून बनाना चाहती है तो वह संभव ही नहीं है. इसके लिए संविधान में संशोधन अनिवार्य होगा और केंद्र की वर्तमान सरकार ही यह संशोधन कर-करा सकती है. लेकिन यदि यूसीसी लागू करने का अधिकार राज्यों के पास नहीं होता तो उत्तराखंड की सरकार ने अपने राज्य में इसे लागू कैसे कर दिया है? यूसीसी तो गुजरात, असम और मध्य प्रदेश की सरकारों ने भी पास करा लिया है. उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने भी इस बाबत घोषणा कर दी है, लेकिन फुंफकार रहे सर्प समूहों या फड़फड़ाते कबूतरों ने अब तक सुप्रीम कोर्ट का रुख नहीं किया है. वे वहां जायेंगे किस मुंह से? राज्य सरकारें संविधान और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का ही पालन कर रही हैं. 

 

अलबत्ता मदनी का यह कहना सही है कि यूसीसी भाजपा का वैचारिक एजेंडा है. लेकिन क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दलों को अपने वैचारिक एजेंडे लागू करने का अधिकार नहीं है? यूसीसी की हिमायत भाजपा अपने जनसंघ काल से करती रही है. जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35(A) की समाप्ति भी उसका वैचारिक एजेंडा ही था. अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को भी उसने अपने पालमपुर अधिवेशन में अपना वैचारिक मुद्दा बना लिया था. 

 

भाजपा हर चुनाव में इन तीनों मुद्दों पर जनादेश मांगती रही है. इनमें से दो मुद्दे तो पूरे हो चुके हैं. बचा है सिर्फ यूसीसी और अब उसे भी लागू करने की राज्यवार तरकीब निकाल ली गयी है. 

 

इस बीच नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू से कहा जा रहा है कि वे बिहार और आंध्र प्रदेश में इसे लागू न होने दे. लेकिन क्या गृह मंत्री ने इन दोनों से बात किये बगैर एनडीए शासित राज्यों में यूसीसी लागू करने की बात कही होगी? लगता तो नहीं है. 

 

1996 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने विश्वास मत पर चर्चा का जवाब देते हुए साफ कर दिया था कि बहुमत के आभाव में विवादित मुद्दों को किनारे रख दिया गया है, लेकिन इन्हें न भाजपा ने छोड़ा है, न छोड़ेगी. 

 

बहरहाल, बिहार में राजद जद(यू) को उकसा रहा है. वह कह रहा है कि भाजपा को छोड़कर हमारे साथ गठबंधन सरकार बनाइए-चलाइए. उप मुख्यमंत्री विजय चौधरी ने इस प्रस्ताव को हंसी ठठ्ठा में उड़ा दिया है. चिराग पासवान ने हालांकि शाह के प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया है, लेकिन उन्होंने विरोध भी नहीं किया है. वह या उपेंद्र कुशवाहा क्या बिहार विधानसभा में इतनी हैसियत रखते हैं कि वे यूसीसी बिल पास ही न होने दें. जीतन राम मांझी की पार्टी खुला समर्थन कर रही है. 

 

जहां तक चंद्रबाबू नायडू की बात है, उन्हें मालूम है कि वह मुख्यमंत्री तभी बन पाते हैं जब भाजपा साथ होती है. हालांकि तथ्य यह भी है कि आंध्र में भाजपा पूरी तरह हाशिए की पार्टी है. 

 

रही बात नीतीश कुमार की तो वह पहले की तरह प्रभावी नहीं हैं. वह राज्यसभा में अपने राजनीतिक अवसान का समय व्यतीत कर रहे हैं. वैसे भी सम्राट चौधरी उनकी मर्जी और पसंद से ही मुख्यमंत्री बने हैं. जद(यू) के किसी अन्य नेता में सामर्थ्य नहीं है कि वह पार्टी को नयी ऊर्जा प्रदान कर सके. यानी जद(यू) हो या चिराग या उपेंद्र, ये भाजपा के साथ रहने को मजबूर हैं. 

 

फिर भी राजनीति में असंभव कुछ नहीं होता है. कभी-कभी खतरा मोल लेने से भी फायदा मिल जाता है. इसलिए जब बिहार और आंध्र प्रदेश की विधानसभाओं में यूसीसी बिल पेश होगा, तब देखा जाएगा. 

 

लेकिन मूल सवाल यह है कि भाजपा अपने इस कोर एजेंडे पर संसद से ही कानून क्यों नहीं पास करा लेती है? वह राज्यों के घुमावदार पचड़े के जरिये अपना एजेंडा क्यों साधना चाहती है? क्या सरकार को डर है कि कहीं इसका भी हश्र महिला आरक्षण के लिए परिसीमन बिला जैसा न हो जाय? यदि ऐसा कुछ नहीं है तो सरकार घनचक्करी खेल क्यों खेल रही है? क्या सरकार राष्ट्रीय स्तर पर किसी बवाल से बचना चाहती है और एनडीए शासित राज्यों के माध्यम से उल्लू सीधा करना चाहती है? या फिर भाजपा इस मुद्दे पर विपक्ष की टोह लेना चाहती है और 2029 तक उसे इसी पर उलझाये रखना चाहती है?

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