National News : सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल की किताब विदाउट फियर ऑर फेवर (Without Fear or Favour) में प्रकाशित कुछ तथ्यों को लेकर कांग्रेस मोदी सरकार पर हमलावर हो गयी है. किताब में मोदी सरकार के कार्यकाल में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े किये गये हैं. कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने एक्स पर पोस्ट कर जस्टिस की किताब के कुछ अंश उद्धृत करते हुए सरकार पर हल्ला बोला है.
पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस संजय किशन कौल की किताब ने मोदी सरकार के कार्यकाल में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। न्यायाधीशों की नियुक्तियों में सरकार की दखलंदाज़ी, कॉलेजियम की बैठक से पहले ही सरकार की मंज़ूरी लेने की कोशिश और अल्पसंख्यक समुदाय के एक न्यायाधीश के नाम पर उनकी जाति को लेकर सरकार के बेतुके सवाल - जस्टिस कौल ने इन घटनाओं का ज़िक्र किया है। जिन बातों को लोग खुलकर कहने से कतराते थे, जस्टिस कौल ने वो सब बड़े सयंत शब्दों में दर्ज किया है। हैरानी की बात यह है कि पूर्व चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया ने नियुक्तियों से पहले सरकार के साथ चर्चा किए जाने की बात से इनकार नहीं किया है। जब पूर्व CJI जस्टिस चंद्रचूड़ कहते हैं कि सरकार की CJI से बातचीत और नियुक्तियों में भूमिका तो होती ही है, तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर सवाल और गंभीर हो जाता है। जस्टिस कौल का यह ख़ुलासा कि PMLA मामले में उनकी अध्यक्षता वाली बेंच द्वारा कोर्ट के फ़ैसले के कुछ पहलुओं पर पुनर्विचार का सवाल उठाए जाने के बाद मामला बिना उनसे चर्चा किए दूसरी बेंच के सामने पहुँचा दिया गया, बेहद गंभीर है। इससे सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के कामकाज में दैनिक दख़लअंदाज़ी का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। अगर न्यायाधीशों की नियुक्तियों पर सरकार की मंज़ूरी का दबाव हो और संवेदनशील मामलों की सुनवाई करने वाली बेंच भी बदल दी जाए, तो लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए पूछना ज़रूरी है: अगर यह न्यायपालिका पर दबाव और उसकी स्वतंत्रता को कमज़ोर करना नहीं है, तो फिर क्या है? संविधान की रक्षा करने वाली संस्था को सत्ता के दबाव से मुक्त होना चाहिए। लोकतंत्र में न्यायपालिका की स्वतंत्रता कोई विकल्प नहीं, अनिवार्यता है।
— Jairam Ramesh (@Jairam_Ramesh) October 25, 2026
जस्टिस संजय किशन कौल ने अपनी किताब में लिखा है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में तत्कालीन CJI डीवाई चंद्रचूड़ सरकार(मोदी) के प्रति काफी नरम या सहयोगात्मक रुख अपनाते थे, जस्टिस कौल का मानना था कि कॉलेजियम की औपचारिक बैठक से पूर्व सरकार से अनौपचारिक बातचीत या सहमति लेना गलत संदेश देता है. उन्होंने कॉलेजियम प्रणाली को भी अपारदर्शी करार दिया है.

हालांकि जस्टिस कौल ने लिखा है कि कॉलेजियम राजनीतिक दबाव से पूरी तरह अलग नहीं हो सकता, इस बात का जिक्र किया कि 2015 में नेशनल जुडिशरी अपॉइंटमेंट्स कमीशन (NJAC) रद्द होने के बाद से सरकार और न्यायपालिका के बीच खिंचतान शुरू हो गयी. जस्टिस कौल अपनी किताब में इस बात का भी उल्लेख किया है किअल्पसंख्यक समुदाय के एक न्यायाधीश के नाम पर उनकी जाति को लेकर सरकार द्वारा सवाल उठाये गये थे
जस्टिस संजय किशन कौल के अनुसार जब पूर्व CJI जस्टिस चंद्रचूड़ कहते हैं कि सरकार की CJI से बातचीत और नियुक्तियों में भूमिका तो होती ही है, तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर सवाल और गंभीर हो जाता है.जस्टिस कौल ने अपनी किताब में इस बात का ख़ुलासा किया है कि PMLA मामले में उनकी अध्यक्षता वाली बेंच ने कोर्ट के फ़ैसले के कुछ पहलुओं पर पुनर्विचार का सवाल उठाया था. इसके बाद PMLA मामला बिना उनसे चर्चा किये दूसरी बेंच को सौंप दिया गया.इससे सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के कामकाज में दैनिक दख़लअंदाज़ी का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
जयराम रमेश ने लिखा कि अगर न्यायाधीशों की नियुक्तियों पर सरकार की मंज़ूरी का दबाव हो और संवेदनशील मामलों की सुनवाई करने वाली बेंच भी बदल दी जाये, तो लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए पूछना ज़रूरी है. अगर यह न्यायपालिका पर दबाव और उसकी स्वतंत्रता को कमज़ोर करना नहीं है, तो फिर क्या है? श्री रमेश ने लिखा, संविधान की रक्षा करने वाली संस्था को सत्ता के दबाव से मुक्त होना चाहिए। लोकतंत्र में न्यायपालिका की स्वतंत्रता कोई विकल्प नहीं, अनिवार्यता है.
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