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त्वरित टिप्पणीः प्रधानमंत्री बोले, पर बहुत कम बोले

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श्रीनिवास

 

युद्ध शुरू होने के 23 या 24 दिन बाद प्रधानमंत्री सोमवार को संसद में 24 मिनट बोले और खूब बोले. यह बात और है कि बहुत जरूरी सवालों पर चुप रह गये! वही सब बताया, जो कोई भी मंत्री या अधिकारी बता सकता था. जैसे-पहले हम 27 देशों से तेल लेते थे, अब 41 देशों से ले रहे हैं. ईरान सहित विभिन्न देशों में फंसे इतने भारतीयों को वापस लाया गया है. विदेशों में हमारे दूतावास 'एडवाइजरी' जारी कर रहे हैं. हमने वैकल्पिक ईंधन के इस्तेमाल से डीजल-पेट्रोल की अपनी खपत इतनी कम कर ली है. हमें सतर्क रहना होगा कि लोग कालाबाजारी न करें. आदि आदि.

 

पर देश जानना चाहता है- कि इस युद्ध में भारत का स्टैंड क्या है? ईरान पर हमला शुरू होने के दो दिन पहले प्रधानमंत्री इजराइल क्यों गये थे? ईरान के सुप्रीम लीडर खमेनेई की हत्या पर शोक व्यक्त करने में विलंब क्यों हुआ? अमेरिका ने हमारे बुलावे पर आये ईरान के जहाज को समुद्र (हिंद महासागर) में डुबो दिया, तब सरकार उस हादसे पर खामोश क्यों रही? क्या ईरान के साथ भारत का राजनयिक संबंध टूट चुका है, क्या वह हमारा मित्र देश नहीं रहा? 

 

ट्रंप द्वारा भारत को रूस से तेल खरीदने की 'अनुमति' की घोषणा पर भारत ने कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी? क्या भारत सचमुच तटस्थ है? मोदी जी ने होर्मूज बंद किये जाने और मालवाहक जहाजों पर हमले को चिंताजनक बताया, इसे और अस्वीकार्य कहा. लेकिन ईरान और लेबनान के नागरिक ठिकानों पर अमेरिका और इजरायल के हमले पर कुछ नहीं बोले! बाकी 'सदा सत्य बोलो' टाइप बातें- युद्ध कोई समाधान नहीं है, बातचीत से ही रास्ता निकल सकता है.

 

सवाल है कि क्या भारत उस दिशा में कोई भूमिका ले रहा है? प्रधानमंत्री ने बताया कि उन्होंने खाड़ी के युद्ध प्रभावित देशों के राष्ट्रध्यक्षों से बात की है, क्या अमेरिका व इजराइल से बात की? यदि इन जरूरी सवालों पर नहीं ही बोलना था, तो बोलना ही क्या जरूरी था!

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