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मोदी को राहुल की चुनौती पर झकझूमर, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को मिला ऐसा जवाब

Rahul challenge to PM Modi: लगातार दो दिन (दो और तीन नवंबर) राहुल गांधी ने पीएम नरेंद्र मोदी को बहस की चुनौती दी. इसके बाद निर्मला सीतारमण ने एक लंबा सा जवाब दिया. लेकिन कुछ ही देर के बाद सार्थक सिद्धांत नामक युवक यूजर ने भी लंबा जवाब दिया, जिसकी चर्चा खूब हो रही है.
 
सांकेतिक तस्वीर.

Lagatar Desk: लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बहस की चुनौती दी. कहा कि आप विदेशी ताकतों के बल पर पीएम बने हैं. विदेशी ताकतों के बल पर ही पीएम बने हुए हैं. इस मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर झकझूमर शुरू हो गया है.

 

लगातार दो दिन (दो और तीन नवंबर) राहुल गांधी ने पीएम नरेंद्र मोदी को बहस की चुनौती दी. इसके बाद निर्मला सीतारमण ने एक लंबा सा जवाब दिया. लेकिन कुछ ही देर के बाद सार्थक सिद्धांत नामक युवक यूजर ने भी लंबा जवाब दिया, जिसकी चर्चा खूब हो रही है.

 

हम यहां निर्मला सीतारमण और सार्थक सिद्धांत के पोस्ट का हिन्दी अनुवाद दे रहे हैं. ताकि हिन्दी के पाठक इसे ठीक से समझ सकें कि आखिर हो क्या रहा है? देश में चल क्या रहा है?

 

निर्मला सीतारमण का पोस्ट

राहुल जी, आप प्रधानमंत्री से बहस के लिए स्थान चुनने को कहते हैं. स्थान तो पहले से मौजूद है- संसद, जहां आप विपक्ष के नेता (LoP) हैं. कल ही गृह मंत्री अमित शाह ने SIR और ईवीएम पर बहस के लिए विशेष सत्र का प्रस्ताव रखा था. सोशल मीडिया पर चुनौतियां देते समय आप जो उत्साह दिखाते हैं, वही उत्साह संसद में बहस के लिए क्यों नहीं दिखाते?

 

जवाब मांगने के साथ-साथ उन्हें सुनने की भी जिम्मेदारी होती है.  कई मौके ऐसे आए हैं जब आप और आपकी पार्टी संसद से वॉकआउट कर गए, जबकि सरकार आपके आरोपों का जवाब दे रही थी. जब आप दूसरी तरफ की बात सुनने तक नहीं रुकते, तो बहस के लिए इतने उत्सुक होने का दावा कैसे करते हैं?

 

बात सिर्फ वॉकआउट तक सीमित नहीं है. आप और इंडिया गठबंधन ने बार-बार कार्यवाही बाधित की है, जिससे पूरे सत्र बर्बाद हो गए. अगर आप सचमुच बहस करना चाहते हैं, तो पहले संसद को काम करने दें. और फिर हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष के आवास पर आपने जो मॉक पार्लियामेंट किया, वह सच कहूं तो ‘मॉक पार्लियामेंट’ से ज्यादा ‘संसद का मजाक’ था. उस अभ्यास के लिए आपके पास समय और उत्साह था. असली संसद कम से कम उतना तो हकदार है.

 

आप लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की बातें बार-बार करते हैं. लेकिन उस सम्मान को उन संस्थानों के प्रति आपके व्यवहार में भी झलकना चाहिए, जिन्हें उन्होंने स्थापित किया है.  जिन मुद्दों को आप हल्के में उठाते हैं, उनके पीछे ठोस आरोप और सबूत लेकर आइए. आरोपों की लंबी सूची बनाकर फेंक देने से आपका पक्ष मजबूत नहीं हो जाता. विपक्ष के नेता के रूप में आपसे कुछ गंभीरता और जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है.

 

आप कहते हैं, “डरो मत.” तो तथ्य लेकर आइए, जांच-पड़ताल का सामना कीजिए और जवाब सुनने के लिए रुकिए. सदन में वही बहस के मानदंड निभाइए, जिनकी आप दूसरों से मांग करते हैं. 

 

सार्थक सिद्धांत का जवाब

सर्वाधिक सम्मानित वित्त मंत्री महोदया. मुझे एक संदेह है. कृपया समय निकालकर मेरा उत्तर दें. आप कहती हैं कि बहस का स्थान संसद है. आप कहती हैं कि मेरे गृह मंत्री अमित शाह ने विशेष सत्र की पेशकश की है. आप कहती हैं कि अगर राहुल गांधी (विपक्ष के नेता) मेरे प्रधानमंत्री से बहस करना चाहते हैं, तो उन्हें संसद में आना चाहिए.

 

मैडम, आइए कुछ तथ्यों की ओर ध्यान दें...

20 जुलाईः संसद सत्र शुरू होता है. नरेंद्र मोदी संसद के बाहर मीडिया को संबोधित करते हैं. वे तथ्य-आधारित बहस की मांग करते हैं.

24 जुलाईः अमित शाह का नेशनल ऑनर बिल राज्यसभा में नित्यानंद राय (गृह राज्य मंत्री) द्वारा पेश किया जाता है. जयराम रमेश पूछते हैं, “कैबिनेट मंत्री कहां हैं?” यह राज्यसभा के ट्रांसक्रिप्ट में मौजूद है.

29 जुलाईः विपक्ष के नेता राहुल गांधी पूछते हैं, “आज गृह मंत्री क्यों नहीं हैं?” यह लोकसभा के ट्रांसक्रिप्ट में भी दर्ज है.

30 जुलाईः  राहुल गांधी पूछते हैं, “शाह संसद आने से इतने डरते क्यों हैं?”

04 अगस्त: अमित शाह संसदीय परिसर में एनडीए संसदीय दल की बैठक में दिखाई देते हैं. वे सदन में प्रवेश नहीं करते.

06 अगस्त : मल्लिकार्जुन खड़गे राज्यसभा में पूछते हैं, “प्रधानमंत्री क्यों नहीं आ रहे? गृह मंत्री क्यों नहीं आ रहे?” केरल कामुदी के अनुसार यह राज्यसभा ट्रांसक्रिप्ट से मेल खाता है.

11 अगस्त: कांग्रेस सांसद मणिक्कम तगोरे अनुपस्थित गृह मंत्री पर हमला बोलते हैं. एएनआई की रिपोर्टिंग के अनुसार.

12 अगस्त: अमित शाह मीडिया से कहते हैं, “सत्र शुरू होने के बाद से मैं नियमित रूप से संसद आ रहा हूं, मैं अपने चैंबर में बैठता हूं.”  लगभग 12:30 बजे मीडिया से बात करते हुए अमित शाह ने कहा, “अगर विपक्ष स्पीकर को पत्र लिखे, तो बुधवार (12 अगस्त, उसी दिन) दोपहर 3 बजे से गुरुवार (13 अगस्त, अगले दिन) दोपहर 3 बजे तक बहस होगी.” 

 

यह पत्र जमा करने के लिए लगभग 2 घंटे की खिड़की थी. उन्होंने आगे कहा, “मैं सदन में बैठूंगा; मैं सबकी बात सुनूंगा और हर बिंदु का जवाब दूंगा.” राहुल गांधी ने कहा, “हमें उनका लेक्चर सुनने में कोई रुचि नहीं है. उन छात्रों को किसने गोली मारी? उस छात्र को किसने अंधा किया? लाठीचार्ज का आदेश किसने दिया?” यह छात्र साहिल लोचाव पर चलाई गई पैलेट गोलियों का संदर्भ था. उन्होंने 20 जुलाई के विरोध प्रदर्शनों में हुए लाठीचार्ज के बारे में पूछा.

विपक्ष शाह से इस पर बयान चाहता था. शाह चाहते थे कि वे स्पीकर को पत्र जमा करें, लगभग 2 घंटे की खिड़की में. जबकि वे 17 लगातार बैठकों तक उपस्थित नहीं रहे थे. उनकी कोई दर्ज उपस्थिति नहीं थी.

13 अगस्तः लोकसभा 4 मिनट के लिए बैठती है. सुबह 11:00 से 11:04 बजे तक. राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम गाया जाता है और फिर सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो जाता है. इन दिनों दोनों सम्माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री श्री अमित शाह मौजूद थे. उन 4 मिनट के लिए.

 

सम्मानित वित्त मंत्री महोदया, ये वे तथ्य हैं जिन्हें मैंने इंगित किया है. मैंने कुछ भी अपनी राय के रूप में नहीं कहा. मैंने तथ्यों को किसी पार्टी के पक्ष में फ्रेम नहीं किया. मेरे तथ्य लोकसभा और राज्यसभा पोर्टल से दस्तावेज़ स्क्रैप करके, पीडीएफ का ओसीआर करके, उन्हें पार्स करके और फिर समाचार स्रोतों को एकत्रित करके प्राप्त किए गए हैं और उनसे तथ्य निकाले गए हैं. ठंडे, कठोर रिकॉर्ड.

 

मैंने अभी तक कोई सवाल नहीं पूछा, जो मैं अब पूछूंगा.  मैं एक इंसान हूं. मैंने पैटर्न पहचानने की क्षमता विकसित की है. मैं यहां एक पैटर्न देखता हूं. मैं देखता हूं कि मानसून सत्र की पूरी अवधि में प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह ने लोकसभा के रिकॉर्ड पर एक भी शब्द नहीं कहा. वे अंतिम दिन के अंतिम 4 मिनट को छोड़कर सदन में मौजूद नहीं थे.

 

शाह कहते हैं, “मैं अपने केबिन में बैठा था.” मैडम, मुझे नहीं लगता कि अकेले केबिन में बैठकर बहस होती है. बहस फ्लोर पर होती है, जहां दूसरी तरफ वाले भी सवाल पूछ सकें.  मुझे संसद जैसे माहौल में सार्थक बहस होती हुई नहीं दिखती. मैं यह पूरी निराशा के साथ कह रहा हूं. 

 

अगर संसद बहस का स्थान है, तो सरकार के दो सबसे वरिष्ठ सदस्य 19 बैठकों में एक बार भी वहां क्यों नहीं बोले? और बहस की एकमात्र पेशकश 18वें दिन प्रेस को क्यों की गई और वह भी कुछ घंटों की डेडलाइन के साथ? “पेशकशें” क्यों हो रही हैं? मुझे लगता है कि बहस में शामिल होना आपकी ज़िम्मेदारी है, क्योंकि यही आपका पूरा काम है.

 

जैसा कि आप कहती हैं, “जवाब मांगने के साथ-साथ उन्हें सुनने की भी जिम्मेदारी होती है.” तो क्या अमित शाह या नरेंद्र मोदी पूछे जा रहे सवाल सुन रहे थे? वे तो सदन में ही नहीं थे.  कृपया मेरे संदेहों का उत्तर दें. मैं बहुत आभारी रहूंगा. 

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