Manish Singh
दूसरे विश्व युद्ध की बात है. हिटलर पर बम हमला हुआ. वाल्कायरी नाम के इस मिशन में कर्नल स्टाफनबर्ग ने हिटलर के कांफ्रेस रूम में बम लगाया. इस पर टॉम क्रूज की फिल्म भी है. हिटलर किस्मत से बच गया. सारे षड्यंत्रकारी पकड़े गए.
मालूम हुआ की फील्ड मार्शल रोमेल भी इस षड्यंत्र में शामिल था. अब रोमेल एक वॉर हीरो था. जबरजस्त फॉलोइंग थी. हिटलर ने खुद उसे कई बार मेडल दिए थे. फील्ड मार्शल बनाया था. उसे सीधे-सीधे किसी चौराहे पर गोली मार दिया जाना, जन भावनाओं के लिए अच्छा नहीं होता.
हिटलर ने दो अफसरों को रोमेल के घर भेजा. बंद कमरे में उन्होंने बताया कि रोमेल की सारी करतूतो का पता चल चुका है. अब उसके पास दो रास्ते हैं. या तो वह विरोध करें, मुकदमा लड़े. इसमें शर्तिया उसकी हार होगी. परिवार साथ गिरफ्तार होगा. बदनामी के बाद मौत फिर भी होगी. या दूसरा तरीका यह है- अफसर ने अपनी पिस्तौल निकाल कर टेबल पर रख दी. रोमेल ने दूसरा रास्ता चुना. खुद को गोली मार ली. पूरे सैनिक सम्मान से फ्यूनरल हुआ. पत्नी बच्चों की पेंशन मिलती रही.
तो कई लोग इस बात से नाराज हैं, कि 24 सितंबर की प्रेस कांफ्रेंस में राहुल गांधी ने आर-पार की लड़ाई का आवाहन नहीं किया. कोई राष्ट्रव्यापी आंदोलन की कॉल नहीं की. बड़े-बड़े बोल नहीं बोले.

राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस में एक पोस्टर जारी किया, पोस्टर में 19 लोगों की तस्वीर है.
मुझे लगता है राहुल अलग ही गेम खेल रहे हैं. तमाम चैनल उनके कांफ्रेंस का प्रसारण किया. आज के घटनाक्रम से सबसे गहरा राज तो यह है. फिर पीछे पोस्टऱ में जो चेहरे लगाये, उसमें रामदेव, विवेक अग्निहोत्री, पीयूष गोयल, कंगना रनौत, अर्णब गोस्वामी, बृजभूषण शरण सिंह, जय शाह शामिल है. राजनीति की बिसात पर इनका कोई महत्व नहीं. मगर यह सभी, किसी खास तबके के चेहरे हैं. एक चेहरा उस पूरे ग्रुप को सीधी धमकी है. पर मजेदार बात, राहुल ने उनपर एक शब्द भी न बोला. बस, फोटो टांग दिया है.
यहां जय शाह अलग है. वह निपोटिज्म का प्रतीक नहीं. वह अमित शाह को सीधी धमकी है- सुधर जा, वरना तेरे लौंडा भुगतेगा.
ज्ञानेश कुमार को उन्होंने अप्रूवर बनने की सलाह दे दी. यह साफ धमकी है. अंदर से खबरें लीक होकर आ रही है- यह बोलना अपने शत्रुओं के बीच तथा ब्यूरोक्रेसी में, पैनिक, अविश्वास और भय फैलाने का तरीका है. सबसे बड़ी धमकी उन्होंने आरएसएस को दी है.
एक पत्रकार ने पूछा- अब भी कार्यवाही न होने पर, कांग्रेस क्या करेगी? सबकी आशा थी कि राहुल कहेंगे- जनआंदोलन करेंगे, आग लगा देंगे, क्रांति कर देंगे. पर जवाब आया - "वक्त ऐसा आ रहा है कि अब अगर भाजपा चुनाव जीत गई... तो जनता इसका विश्वास नहीं करेगी.
उबाऊ जवाब. मगर इसका मतलब यह है कि राहुल ने ऐसे किसी भी आंदोलन को आखिरी विकल्प रखा है. शायद उसकी कोई टाइमलाइन उनके जेहन मे है, जिसे पसंदीदा वक्त आने तक खोलना नहीं चाहते. "एक साल के भीतर" वाला जुमला वे कई बार दोहरा चुके हैं. पर तब तक उनकी रणनीति, भाजपा और उसके तंत्र को भीतर से तोड़ने की है. इसमें वह सफल हो रहे हैं. भाजपा नियंत्रित टीवी, बंधन तोड़कर उन्हें लगातार दिखाता रहा था, इस बात का प्रमाण है.
वे अपने हाथ गंदे नहीं करना चाहते. टेबल पर, RSS के सामने उन्होंने चुनाव हारने की गन रख दी है. कह रहे हैं आने वाले चुनाव अगर जीत जाओगे, तो बहुत बुरी गत होगी. बिना प्रपंच के लड़ो. हार जाओ. तो शायद बच जाओगे.
देखना यह है कि आरएसएस यह गन उठाता है. रोमेल की तरह, अपनी साख बचाने (और फिर कभी भविष्य मे फिर सर उठाने) के लिए अपनी कनपटी पर, हार की गोली दागता है. या अपना समूल नाश चाहता है. जिसका ब्रह्मास्त्र राहुल की जेब मे है.
माई गेस, दे विल पिक द गन ऑन द टेबल.