
बैजनाथ मिश्र
देश की संसद ठप है. इसे ठप कराया है नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने. जंतर-मंतर कांड से व्यथित राहुल को पहले गृह मंत्री अमित शाह का इस्तीफा चाहिए था. लेकिन अब सिर्फ गृह मंत्री के बयान से ही काम चल जाएगा. बयान आ नहीं रहा है और संसद चल नहीं रही है. विपक्ष चाहे तो वह संसदीय नियमों के तहत नोटिस देकर गृह मंत्री को जवाब देने के लिए बाध्य कर सकता है.
इस बीच राहुल गांधी ने रांची में जारी छात्र आंदोलन में शामिल युवाओं से बात की और छात्रों के पक्ष में बयान भी दिया है. रांची में धरना-प्रदर्शन, आंदोलन चल रहा है. वह भी करीब तीन हफ्तों से. लेकिन यह आंदोलन निहायत देसज है. यहां पिज्जा-बर्गर, बिरियानी नहीं, चिउड़ा, गुड़ और चने से काम चल रहा है. बावजूद इसके जोश कम नहीं है. अलबत्ता आइसा वाले यहां भी आ धमके हैं. परंतु मूल प्रदर्शनकारी उनसे बिल्कुल अलग कार्यक्रम चला रहे हैं. इस प्रदर्शन में न गालियों की बौछार है, न पुलिस पर हमले हो रहे हैं, ना ही विधानसभा को उखाड़ फेंकने की गर्जनाएं हो रही हैं. यहां की सरकार में कांग्रेस भी एक सहयोगी दल है.
सच कहें तो झारखंड का मामला पेपर लीक से बड़ा है. यहां नौकरी के लिए ली गयी परीक्षाओं में धांधली की गयी है और राज्य सरकार की एजेंसियों द्वारा की गयी कार्रवाई से इसकी पुष्टि भी हो रही है. निष्फल वार्ताओं का दौर जारी है.

राहुल गांधी के साथ इरफान अंसारी की फाइल फोटो.
लेकिन कांग्रेस कोटे के मंत्री इरफान अंसारी ने आंदोलनकारियों की पीड़ा और भावनाओं पर नमक छिड़कने में बेशर्मी की हद पार कर दी है. उन्होंने शांतिपूर्ण ढ़ंग से जारी मर्यादित आंदोलन को अपमानित करने का धतकर्म किया है. हालांकि उन्हें वर्बल डायरिया की बीमारी है, लेकिन मंत्री होने के नाते उन्हें हालात की नजाकत और मामले की हकीकत को ध्यान में रखते हुए ही बयान झाड़ना चाहिए था.
मीडिया में आयी खबरों के अनुसार इरफान का कहना है कि जेपीएससी की परीक्षा में कोई गड़बड़ी हुई ही नहीं है, छात्रों को आंदोलन नहीं करना चाहिए. और यह कि भूख हड़ताल पर बैठे देवेंद्र महतो भाजपा के एजेंट हैं. मंत्री जी! यदि कोई गड़बड़ी नहीं हुई है तो करीब दर्जन भर जगहों पर आपकी सरकार की एजेंसियां छापामारी क्यों कर रही हैं? जेपीएससी चेयरमैन से तीन-चार राउंड में करीब बीस घंटे पूछताछ क्यों हुई? उन्हें इस्तीफा क्यों देना पड़ा? सहायक परीक्षा नियंत्रक से लेकर संस्था के आधा दर्जन अधिकारी-कर्मचारी जेल में क्यों हैं?
इरफान जी जरा बताइए ना, यह अभय तिवारी उर्फ मनोज तिवारी है कौन जो राज्य सरकार का कर्मचारी होते हुए भी परीक्षा करानेवाली एजेंसी की मार्केटिंग का काम कैसे कर रहा था? उसने खुद तो कई परीक्षाएं ऊतीर्ण की है, अपने नातेदारों को भी परीक्षाओं की वैतरिणी पार करा दी है. मंत्री जी ने यह गौर करना भी मुनासिब नहीं समझा कि जिस ब्लैक लिस्टेड कंपनी को परीक्षा संचालन का दायित्व सौंपा गया उसके कार्यालय से जेपीएससी परीक्षा की ओएमआर शीट्स पकड़ी गयी हैं.
अब तो यह तसदीक भी होने लगा है कि परीक्षाओं में ज्यादा सही जवाब देने वालों को फिसड्डी घोषित कर दिया गया और ज्यादा गलत जवाब देने वालों ने बाजी मार ली. ऐसे कई छात्र और एजेंट पकड़े भी गये हैं. लेकिन एक निहायत गैर जिम्मेदार मंत्री कह रहा है कि परीक्षा में कोई गड़बड़ी हुई ही नहीं है. ताज्जुब तो यह है कि अब तक किसी पदधारी कांग्रेसी न उनकी खोज खबर ली है और न ही उन पर बयान वापस लेने के लिए दबाव बनाया गया है.

जयपाल सिंह स्टेडियम में आंदोलन कर रहे छात्र (फाइल फोटो)
रही बात देवेंद्र महतो की, तो इरफान बतायें कि उनके पास देवेंद्र के भाजपा एजेंट होने के क्या सबूत हैं? क्या किसी मंत्री को ऐसी लफ्फाजी शोभा देती है? जहां मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी आंदोलनरत युवाओं से बातचीत के जरिये समस्या के समाधान की दिशा में प्रयास कर रहे हैं, वहीं एक मंत्री पूरे आंदोलन को ही लांछित करने में लगा है.
राहुल गांधी इन आंदोलनरत युवाओं से बात करते हैं. उनसे हमदर्दी जताते हैं. मदद का भरोसा भी देते हैं. दे या नहीं, लेकिन पॉजिटिव तो हैं. लेकिन उन्हीं की कृपा से मंत्री बना एक नेता इस आंदोलन को हिकारत की नजर से देखता है और उस पर कोई कार्रवाई नहीं होती है तो लगता है कि कांग्रेस भी दो दांत की है.
पता नहीं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को अपने मंत्री की यह भूमिका पसंद आयी या नहीं, लेकिन उन्होंने कुछ कहा नहीं है. वैसे इरफान साहब ने इस नाजुक मोड़ पर अपने बयान से आंदोलन की अग्नि में जो समिधा डाली है, वह उनके डिस्मिसल के लिए काफी है. यकीनन ऐसा होगा नहीं. वह मंत्रिमंडल में एक वर्ग विशेष के प्रतिनिधि के रुप में हैं. इसलिए तय राहुल को करना है. उन्होंने युवाओं से जो बात की वही पार्टी का स्टैंड है या वह जो इरफान कह रहे हैं. इस महाबोल्लकड़ मंत्री ने सरकार, पार्टी सबको फंसा दिया है.
बहरहाल, इस आंदोलन में भाजपा भी कूद गई है. मामला भी है, दस्तूर भी है. संघ की छात्र इकाई अभाविप भी सरकार के विरुद्ध आवाज बुलंद कर रही है. लेकिन भाजपाइयों खासतौर से नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी को इस सवाल का जवाब जरुर देना चाहिए कि हुजूर बतौर मुख्यमंत्री आपने इसी जेपीएससी का कितना कबाड़ा किया था? इस सवाल की आंच अर्जुन मुंडा तक भी जाती है. उस समय की गड़बड़ियों की जांच अब भी चल रही है और बेईमानी से अफसर, अध्यापक आदि बने अयोग्य लोग आज भी मजे मार रहे हैं. अंदाजा लगाइए ये सरकार और छात्रों का कितना भला कर रहे हैं?

परीक्षा रद्द करने व सीबीआई जांच की मांग को लेकर विधानसभा में प्रदर्शन करते भाजपा के विधायक.
तब भी चेयरमैन सहित सभी सदस्य जेल गये थे. इन महानुभावों के कृपा सहयोग से ऐसे लोग भी डिप्टी कलक्टर, डीएसपी बन गये जिन्हें ग्रेजुएशन की डिग्री भी बड़ी मुश्किल या जुगाड़ से मिली थी. खुद खेती किसानी करने चले गये और पुड़िया बांटने-बेचने वाले छात्रों के भविष्य निर्माण में लगा दिये गये. व्यापक संघ परिवार की कई इकाइयों के महानुभावों के परिजनों की जिंदगी सुधर गयी. जेपीएससी सदस्यों के बेटे-बेटियों और रिश्तेदारों के रंग तो बिना हर्रे-फिटकिरी के चोखा हो गये.
वर्तमान सरकार में शामिल और सरकार को सहयोग दे रहे नेताओं के भाई-भतीजे और रिश्तेदार भी नालायक होते हुए लायक हो गये. इस बहती धारा में बड़े-बड़े अधिकारियों ने भी डुबकी लगायी और अपनों को सेट कर दिया. दरअसल हम्माम में सभी नंगे हैं. हमारे राजनीतिक दलों का छात्रों से रिश्ता जरूरत के हिसाब से बनता-बिगड़ता है. छात्र आंदोलन हो या कोई और, राजनीतिकों का समर्थन और विरोध इस बात पर निर्भर करता है कि इसमें उनका नफा-नुकसान कितना है. जब सभी मूल्य सिद्धांत तिरोहित हो जाते हैं तो ऐसे ही हालात पैदा होते हैं. अगर थोड़ा बहुत भी लाभ की संभावना हो तो मियां फजीहत भी नसीहत देने लगते हैं. यदि युवाओं, छात्रों से राजनीतिक दलों का सरोकार होता तो वे अपने-अपने शासनकाल में और राज्यों में पेपर लीक और नौकरियां बेचने में लगे अधिकारियों-एजेंटों को सलाखों के पीछे भेजने की पहल जरुर करते.
यदि अथक प्रयासों के बावजूद थोड़ी बहुत गड़बड़ी हो भी जाती तो छात्रों, युवाओं के सड़क पर उतरने से पहले ही समाधान का रास्ता निकल जाता. लेकिन यहां तो सभी धान बाईस पसेरी वाली कहावत चरितार्थ हो रही है. जुलाई में दिल्ली में हुआ आंदोलन भाजपा को कचोट रहा था तो अगस्त में झारखंड का आंदोलन सरकार में शामिल दलों को परेशान कर रहा है. छात्रों, युवाओं की मांगें और समस्याएं उधार चुकता करने का माध्यम बन गई हैं.
बहरहाल, झारखंड सरकार ने हफ्तों से जमे आंदोलनकारी छात्रों की अधिकतर मांगे मान ली है. जेपीएससी की परीक्षा कैंसल कर दी गई है. जेपीएससी के तीन सदस्यों ने भी इस्तीफा दे दिया है. जेएसएससी-सीजीएल की परीक्षा रद्द करने में सरकार की असमर्थता समझी जा सकती है. लेकिन जेपीएससी की कारस्तानियों की सीबीआई जांच कराने में सरकार क्यों कसमसा रही है? उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार एक कदम और आगे बढ़ेगी और एक सार्थक आंदोलन की समाप्ति हो जायेगी. सही है कि इसमें जीतेंगे तो आंदोलनकारी लेकिन सरकार भी अपना बहुत कुछ बचा लेगी.