जैसा की अंदेशा था- परिमल नाथवानी राज्यसभा चुनाव जीत गये हैं. विधायकों की अंतरात्मा की वह आवाज जीत गयी, जिसे अक्सर नोटों से तौला जाता रहा है. इस बार उन्हें भी तौल दिया गया, जिनके बारे में लोग कहते थे-वे लोग अंतरात्मा की आवाज नहीं सुनते. इसके साथ ही हार गई पार्टी के प्रति निष्ठा, दल या गंठबंधन के लिए लिया गया वचन और झारखंड में एक सीट जीत कर भी हार गया इंडिया गंठबंधन. हारा झामुमो और कांग्रेस भी.
निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी की जीत ने एक बार फिर से उन्हें अश्वमेघ का वह घोड़ा साबित किया जिसे कोई रोक नहीं सकता. वह जहां चाहें, वहां से चुनाव लड़ सकते हैं और सांसद बन कर राज्य सभा पहुंच सकते हैं. उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है. उन्होंने एक बार फिर से साबित किया, वह निर्दलीय नहीं-सर्वदलीय हैं.
वैसे तो विधायकों को होटल में ठहराने के बाद से ही झारखंड शर्मिंदा था. लेकिन नाथवानी की जीत के साथ ही एक बार फिर से झारखंड शर्मशार हो गया. उनकी जीत ने साबित किया कि यहां के विधायक अंतरात्मा के नाम पर कुछ भी कर सकते हैं. पार्टी की नीति, शिद्धांत यह सब एक तरफ और अंतरात्मा की आवाज एक तरफ. यह सब पर भारी.
राज्य सभा चुनाव में नाथवानी सिर्फ जीते नहीं हैं. उन्होंने झारखंड का भविष्य भी तय कर दिया है. पहले से ही खटपट चल रही गंठबंधन की सरकार में सब कुछ कितने दिनों तक ठीक रहेगा. यह जो खटराग शुरु हुआ कि वह समय के साथ तेज होगा या कांग्रेस सब कुछ भूल कर साथ निभाता चला जायेगा.
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