Pravin Kumar Ranchi: रांची आए मुंबई और इलाहाबाद उच्च न्यायालयों में न्यायाधीश रह चुके न्यायमूर्ति अभय महादेव थिप्से ने देश के वर्तमान हालात और न्यायिक प्रक्रिया पर बेबाक राय रखी. न्यायमूर्ति थिप्से (65) शतरंज के भारतीय ग्रैंडमास्टर प्रवीण महादेव थिप्से के भाई हैं. वह विभिन्न मामलों में अपने उल्लेखनीय फैसलों के लिए चर्चित रहे. उनसे की गई बातचीत का मुख्य अंश-
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“कोर्ट ही संवैधानिक अधिकारों की कर सकती है रक्षा”
संवैधानिक अधिकारों के लिए सरकार से हम ज्यादा उम्मीद नहीं कर सकते. ऐसे में न्यायालय ही एक रास्ता बचा है. लेकिन न्यायालय के कुछ फैसले में वाइसनेस भी देखने को मिलता है. इसके लिय हमें ऊपरी अदालत में जाना चाहिए. न्यायालय के वैसे फैसले की आलोचना की जानी चाहिए. लेकिन यह आलोचना संविधान में मौजूद कानूनी प्रावधानों के आधार पर ही किया जाना उचित होगा. ब्रिटिश शासन तक हम प्रजा थे, लेकिन अब हम सिटीजन हो गए हैं. सविधान को हमने बनाया है. तो हमें संविधान को भी मानना होगा. संविधान में दिए गए अधिकारों के साथ-साथ एक नागरिक की दायित्व को भी हमें निर्वाह करनी होगी. इसे भी पढ़ें-साइबर">https://lagatar.in/the-handiwork-of-cyber-thugs-created-in-the-name-of-lohardaga-dc-fake-id/">साइबरठगों की करतूत, लोहरदगा डीसी के नाम से बनायी फेक आईडी
पूर्वाग्रह से हमें दूर रहना होगा- अभय महादेव थिप्से
देश के मौजूदा हालात में धर्म विशेष को लेकर जीतने वाइसनेस फैलाई जा रही है. इतिहास को तोड़ने की रवायत शुरु हो गया है. इसकी मुख्य वजह धर्म विशेष के लोगो के बीच बढ़ती दूरियां हैं. जिसे कुछ लोग कृत्रिम रूप से फैलाने का काम कर रहे हैं. इसका एकजुट हो कर सभी को मुकबला करना चाहिए. किसी खास लोगों या समुदाय के प्रति वाइसनेस (पूर्वाग्रह ) न्यायिक प्रक्रिया को भी प्रभावित कर रहा है. वैसे फैसले का हमे आलोचना करनी चाहिए.न्यायालय के कुछ फैसले में वाइसनेस भी देखने को मिलता है. इसके लिय हमें ऊपरी अदालत में जाना चाहिए.इंजस्टिस की शुरुआत FIR से- अभय महादेव थिप्से
देश में कई मामलों में थाने में एफआईआर दर्ज नहीं होता, या फिर एफआईआर में पीड़ित का पक्ष कमजोर कर दिया जाता है. इंजस्टिस की शुरुआत यहां से ही जाती है. बेहतर व्यवस्था के लिए लोगों को एकजुट होना चाहिए.“माइनॉरिटी के अधिकारों के लिए रहना होगा सजग”
ह्यूमन राइट्स के बारे ने न्यायमूर्ति अभय महादेव थिप्से ने कहा: ह्यूमन राइट्स का मामला सिर्फ माइनॉरिटी के लिए ही नहीं बल्कि सभी लोगों से जुड़ा हुआ मसला है. डेमोक्रेसी में बहुसंख्यक समुदाय को माइनॉरिटी के अधिकारो के लिय आगे आना चाहिए. लोकतांत्रिक व्यवस्था की यही खूबसूरती है. राजनीतिक दल अपने वोट को टारगेट करते हैं. ऐसे में जब सरकार बनती है तब वह अपने वोटर को ध्यान में रखते हुए कार्य करते हैं. इसलिए हम सरकार से ज्यादा उम्मीद नहीं कर सकते हैं. इसे भी पढ़ें-बोकारो">https://lagatar.in/bokaro-battle-of-khatian/">बोकारो: खतियान की लड़ाई तय करेगी राज्य की दिशा और दशा- जयराम महतो
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