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रांची : केंदू पत्ता संग्रह में पिछड़ा झारखंड, करोड़ों के राजस्व का नुकसान

  • पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से भी कम है मजदूरी
  • केंदू पत्ता से मिलने वाला राजस्व भी घटा
  • एक मानक बोरा में आते हैं 52000 केंदू पत्ते
Praveen Kumar Ranchi : झारखंड केंदू पत्ता संग्रहण के मामले में भी पिछड़ गया है. जिससे राज्य सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ है. 2021-22 में 56.60 करोड़ राजस्व संग्रह हुआ. लेकिन 2022-23 में मात्र 24.38 करोड़ के ही केंदू पत्ते बेचे गये. यही नहीं केंदू पत्ता संग्रहण में लगे मजदूरों को पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से भी कम मजदूरी मिलती है. केंदू पत्ता संग्राहकों को अब तक यह भी नहीं मालूम कि प्रति मानक बोरा कितना दर, कितनी मजदूरी निर्धारित की गई है. जबकि पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में 4500 रुपये प्रति मानक बोरा और मध्य प्रदेश में 4000 रुपये मानक बोरी दर निर्धारित थी. वहीं झारखंड में यह दर मात्र 1750 रुपए प्रति मानक बोरा ही निर्धारित है.

केंदू पत्ता संग्रह में लगे हैं एक लाख परिवार

झारखंड में केंदू पत्ता संग्रहण में लगभग एक लाख परिवार लगे हैं. जिन्हें साल भर में 20 से 30 दिन तक का रोजगार मिलता है. झारखंड में केंदू पत्ता संग्रहण को लेकर 2015 में नीति बनी थी. केंदू पत्ता को बढ़ावा देने की जिम्मेवारी झारखंड राज्य वन विकास निगम लिमिटेड को सौंपी गई है. केंदू पत्ता सबसे अधिक रांची, गढ़वा, पलामू के अलावा धालभूमगढ़ में होता है. पलामू में सिर्फ पलामू ब्याघ्र परियोजना(पीटीआर) के अंदर केंदू पत्ता संग्रहण पर रोक है. किस राज्य में कितनी है मजदूरी दर झारखंड-1750 रुपये प्रति मानक बोरा मध्य प्रदेश-4000 रुपये प्रति मानक बोरा छत्तीसगढ़-4500 रुपये प्रति मानक बोरा पिछले चार साल में वन निगम को कितनी हुई आमदनी 2021-22- 56.60 करोड़ 2022-23- 42.61 करोड़ 2023-24- 24.38 करोड़ 2024-25- 41.36 करोड़

पलामू के 199 गांवों में नहीं होता है वनोपज संग्रहण

झारखंड के वैसे आरक्षित वन क्षेत्र जिन्हें विभिन्न वन्य प्राणी संरक्षण परियोजनाओं के लिए रिजर्व किया गया है, उन इलाके के लोगों को वनोपज संग्रहण करने पर सरकार ने रोक लगा रखी है. पलामू व्याघ्र परियोजना के अंतर्गत 199 गांव आते हैं, जहां बाघ संरक्षण के नाम पर बीड़ी पत्ता तोड़ने सहित अन्य वनोत्पाद संग्रहण की सरकारी मनाही है. वनक्षेत्र में रहने वाले आदिवासी तथा दलितों के जीविकोपार्जन का मुख्य आधार वनोत्पाद ही है. ग्रामीण परिवार इसके माध्यम से 5 से 15 हजार तक पैसे कमा लेते हैं. इस पैसे से ग्रामीण खेती के लिए बीज, हल बैल, बरसात में होने वाली बीमारी के दरम्यान दवाईयां और दूसरी तरह की जरूरतों के लिए नगद सुरक्षित रखते हैं.

छत्तीसगढ़ में वन उपज संग्रह की क्या है व्यवस्था

छत्तीसगढ़ में वन अधिकार मुद्दे पर कार्य करने वाले गंगा राम पैकरा बताते हैं कि यहां 2018 में कांग्रेस के सत्ता में आने की मुख्य वजह वन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए जनपक्षीय नीतियों की घोषणा रही है. यहां वनोपज के संग्रहण एवं खरीद-बिक्री के लिए पूरे वैधानिक ढांचे विकसित किये गये हैं. विभिन्न तरह की वनोपजों का कारोबार सहकारी समितियों के माध्यम से की जाती है. प्रत्येक रेंज में दो से तीन सहकारी समितियां निबंधित है. इन समितियों पर प्रशासनिक नियंत्रण के लिए वन विभाग अपने कर्मियों में से ही खरीदी मैनेजर नियुक्त करता है. जिले के अंदर सभी सहकारी समितियों का एक जिला स्तरीय फेडेरेशन गठित है. जिले भर के लिए लोकतंत्रिक ढंग से नीतिगत निर्णय इसी फेडरेशन में लिये जाते हैं. यहां पूरे जिले भर में सहकरी समितियों के माध्यम से किये जाने वाली गतिविधियों और आय-व्यय का ब्योरा रखा जाता है. बीड़ी पत्ते के मामले में जहां-जहां फड़ खुलता है, वहां ग्राम सभा और सहयोग समिति के सदस्य मिलकर फड़ मुंशी की नियुक्ति करते हैं. इसी फड़ में बीड़ी पत्ते की खरीदी की जाती है. उन्होंने यह भी बताया कि साल का फल, पियार का फल व दाना सहित अन्य वनोपज भी इन्हीं समितियों के लोग खरीदी करते हैं. वहां साल के फल बेचने वालों को भी मुनाफे पर बोनस देने की व्यवस्था है. झारखंड सरकार को भी इस दिशा में समुचित पहल करनी चाहिए. इसे भी पढ़ें : झारखंड">https://lagatar.in/jharkhand-lok-sabha-elections-61-90-voting-till-5-pm-60-26-voting-in-chatra-63-66-voting-in-hazaribagh-and-61-60-voting-in-koderma/">झारखंड

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