Ranchi News : राष्ट्रीय घरेलू कामगार संगठन, घरेलू कामगार स्वावलंबी सहकारी समिति और झारखंड घरेलू कामगार युनियन के संयुक्त तत्वावधान में आज अंतराष्ट्रीय मर्यादापूर्ण कार्य दिवस कोकर में मनाया गया. इस समारोह में विभिन्न जिलों से हजारों घरेलू कामगार महिलाए पहुंची थी. महिलाओं ने बताया कि जिस घर को वह रोज साफ करती हैं, उसी घर में उन्हें दीवार या कुर्सी पर बैठने नहीं दिया जाता है.
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सोफा पर बैठने की इजाजत तक नहीं मिलती है. घर के बुजुर्ग महिला-पुरुष की सेवा भी करनी पड़ती है, लेकिन अलग से कोई भुगतान नहीं मिलता है. काम के दौरान गलती से कांच का गिलास टूट जाए तो मजदूरी से पैसे काट लिए जाते हैं. बीमार पड़ने पर भी मेहनताना काट लिया जाता है.
इस दौरान घरेलू कामगार महिलाओं से उनकी काम करने और दिनचर्या पर बातचीत की. इस दौरान उन्होंने कई चौंकाने वाली बात कही. इस दौरान बिरसा चौक से रानी देवी भी कार्य दिवस पर पहुची थी. पिछले 13 साल से घरेलू काम करते है. घर की जरूरतों को पूरा करने और बाल बच्चों को पढ़ाने के लिए करीब एक दिन में तीन घरों मे काम करती है.
एक घर से महीने में 1500 से 2000 रुपये मिलते हैं. सुबह-शाम दोनों वक्त काम बर्तन साफ झाड़ू, डस्टिंग, सोफा और खिड़कियां साफ करना, तो शाम को रसोई की सफाई करती है. काम तो लिया जाता है, लेकिन छुट्टी लेने पर उस दिन का पैसा नहीं मिलता है. बिना बताए एक दिन काम पर नहीं पहुंचने पर डांट सुननी पड़ती है. कभी-कभी काम से निकाल देने की धमकी भी मिलती है.
मजबूरी है, इसलिए काम कर रही हूं- कोमल सिंह
लालपुर की कोमल सिंह की कहानी भी इससे अलग नहीं है. बचपन से दूसरों के घरों में काम कर रही कोमल पांचवीं कक्षा तक ही पढ़ सकीं. कोमल बताती है कि एक दिन में तीन घरों में काम करती हैं. बीमारी में काम पर नहीं जा पाईं तो पैसा काट लिए जाते है. हर महीने 3500 रुपये किराया देना पड़ता है और बिजली का बिल अलग से जमा करना पड़ता है. श्रम कार्ड बना होने के बावजूद उसका कोई खास लाभ नहीं मिला. लेबर कार्ड तक नहीं बना है.
बचपन छूटा, पढ़ाई छूटी, अब जिंदगी दूसरों के घरों में
बोकारो की गुड़िया देवी बचपन से ही दूसरों के घरों में काम कर रही हैं. मां-पिता नहीं रहे, इसलिए पढ़ाई नहीं कर सकीं. जिन घरों में काम किया, वहां भी पढ़ने का अवसर नहीं मिला. आज एक घर से 1500 रुपये कमाती हैं. बच्चे मदरसे में पढ़ते हैं, जिसकी फीस भी हर महीने देनी पड़ती है. सरकारी सहायता के नाम पर उन्हें कुछ खास नहीं मिलता है.
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