Ranchi : डॉ. रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संवाद–2026 का आयोजन हुआ, जिसमें झारखंड की पांच जनजातीय कुडुख, मुंडारी, हो, संथाली, खड़िया और चार क्षेत्रीय भाषाओं पंचपरगनिया, नागपुरी, खोरठा और कुड़माली के शिक्षक-विद्वानों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों समेत 200 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया.
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बंधु तिर्की शामिल हुए. कार्यक्रम का संचालन डॉ. शैलजा बाला ने किया. इस दौरान पूर्व शिक्षा मंत्री बंधु तिर्की ने कहा कि मातृभाषाओं के संरक्षण, संवर्धन, शिक्षा एवं शोध की आवश्यकता पर बल दिए और कहा कि झारखंड की भाषाएं राज्य की सांस्कृतिक अस्मिता और पहचान की आधारशिला हैं.
प्रथम तकनीकी सत्र में नौ भाषाओं के शिक्षक-विद्वानों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने भाषावार अलग-अलग समूहों में सामूहिक परिचर्चा की. प्रत्येक समूह ने अपनी भाषा की वर्तमान स्थिति, चुनौतियों, शिक्षा, शोध, संरक्षण एवं विकास से जुड़े विषयों पर गंभीर विचार-विमर्श किया और अपने-अपने प्रस्ताव तैयार किए. सभी प्रस्तावों को समेकित कर 11 सूत्री साझा मांग-पत्र तैयार किया गया, जिसे मुख्य अतिथि बंधु तिर्की को सौंपा गया, ताकि इन्हें राज्य सरकार के समक्ष प्रभावी ढंग से रखा जा सके.
संवाद में प्रतिभागियों ने कहा कि झारखंड की जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाएं केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक विरासत, इतिहास, लोकज्ञान और सामाजिक पहचान की आधारशिला हैं. इनके संरक्षण एवं विकास के लिए ठोस नीतिगत पहल, पर्याप्त बजट और संस्थागत व्यवस्था समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है.
कार्यक्रम के अंतिम चरण में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाओ मोर्चा के गठन की घोषणा की गई. 10 सितंबर को राज्यव्यापी जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा यात्रा आयोजित करने का निर्णय लिया गया. इस मौके पर बिनाधर सांडिल, जगदीश उरांव, डॉ. बसंत कुमार, विक्की मिंज सहित विभिन्न भाषाओं के शिक्षक, विद्वान, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे. कार्यक्रम का सफल आयोजन सभी नौ भाषाओं के शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों के सामूहिक सहयोग से संपन्न हुआ.
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