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रांचीः अंडा उत्पादन कर सबल बन रहीं जनजातीय महिलाएं

  • मुर्गी पालन से नौ माह में 50,226 अंडों का उत्पादन
  • प्रत्येक मुर्गी कलस्टर को लाखों की आमदनी
Ranchi: झारखंड ट्राइबल डेवपलमेंट सोसाइटी (जेटीडीएस) झारखंड सरकार के तहत पशुपालन व्यापार से जनजातीय समुदाय को जोड़ने की योजना की शुरूआत की गई थी. जिसके अतंर्गत 400 जनजातीय गांव के 4 हजार परिवार को जोड़ा गया. आय वृद्धि और महिला सशक्तिकरण की दिशा में देशी मुर्गी पालन जनजातीय महिलाओं के बीच काफी लाभदायी साबित हुआ है. जिसमें मुर्गी कलस्टर स्थापित कर प्रत्येक कलस्टर में 100 महिलाओं इस रोजगार से जोड़ा गया.

आत्मनिर्भर हो रही जनजातीय महिलाएं

देशी मुर्गी पालन से जनजातीय महिलाएं आत्मनिर्भर हो रही हैं. उनके परिवार की आमदनी और आर्थिक सुधार में महिलाओं का भी योगदान हो. उनके परिवेश के समान सोनालिका और असील देशी मुर्गी के 25-25 चूजे मुहैया करावाई गई थी. जेटीडीएस के आंकड़ों के अनुसार फरवरी से लेकर अक्टूबर 2020 में देशी मुर्गी पालन में महिलाएं काफी आत्मनिर्भर हुई है. नौ माह के अंतराल में मुर्गी पालन से 50,226 अंडों का उत्पादन हुआ. जिसके बिक्री करने से एक कलस्टर को करीब 209459 रुपये की आमदनी हुई. [caption id="attachment_26388" align="aligncenter" width="939"]https://lagatar.in/wp-content/uploads/2021/02/225ade73-96e7-48df-8308-6e860a393875.jpg"

alt="Lagatar.in" width="939" height="480" /> ग्रामीण इलाकों में किया जा रहा मुर्गी पालन, इससे गांवों की जनजातीय महिलाएं हो रहीं आत्मनिर्भर[/caption] इसे भी पढ़ें- ">https://lagatar.in/the-pockets-of-domestic-aircraft-passengers-will-be-loose-the-government-hiked-the-fare-by-30-percent/26360/">

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इस हिसाब से कलस्टर से जुड़ी प्रत्येक महिला को प्रति माह सिर्फ अंडों की बिक्री से ही 523 अतिरिक्त आमदनी हो रही है. इसके अलावा मुर्गों को मांस के लिए कलस्टरों से बिक्री की गई थी. लॉकडाउन में गुमला, लोहरदगा, खूंटी, रांची में सबसे ज्यादा देशी अंडों की बिक्री दर्ज की गई. 2017 में क्योलर मुर्गी पालन की योजना का लाभ नही मिला था. जेटीडीएस के अनुसार योजना की शुरूआत 2016-2017 में की थी. उस समय क्योलर (देशी और बॉयलर का मिक्स ब्रिड) पालन के लिए दिए गए थे. परंतु परिवेश के अनुसार मुर्गीयां मरने लगी और योजना सफल नही हुई. इसके बाद 2019 में देशी मुर्गी पालन को देशी तकनीकी और आधुनिक तकनीक के साथ शुरू किया गया. जेटीडीएस के द्वारा यह कार्यक्रम ट्राइबल सब प्लान जिलों में चलाया जा रहा है. इसमें लोहरदगा, गुमला, सिमडेगा, लातेहार, दुमका, जामताड़ा, पाकुड़, गोड़्डा, साहेबगंज, रांची, खूंटी, पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम, सरायकेला-खरसांवा है. इसे भी पढ़ें- ओरमांझी:">https://lagatar.in/ormanjhi-commendable-initiative-of-medanta-hospital-personnel-financial-assistance-extended-to-the-widow-of-colleague/26351/">ओरमांझी:

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जेटीडीएस के परियोजना निदेशक भीष्म कुमार ने कहा कि जनजातीय गांवों में पशुपालन के द्वारा आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है. इसके लिए मॉडल तैयार किया गया है. जिसमें कृषि के सहित पशुपालन में भी बढ़ोतरी किया जा रहा है. जिससे आमदनी का अच्छा जरिया भी गांव के क्षेत्र को मिल रहा है. इसे भी देखें-  

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