Ranchi : राजधानी रांची के धुर्वा स्थित भगवान जगन्नाथपुर मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आदिवासी और सदान समाज की साझा सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक समरसता का प्रतीक है. करीब 335 वर्ष पुराने इस मंदिर में हर साल निकलने वाली रथयात्रा राज्य के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में गिनी जाती है. इसमें सिर्फ झारखंड से ही नहीं, बल्कि पड़ोंसी राज्यों ओडिशा, बिहार, पश्चिम बंगाल से भी लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के दर्शन के लिए पहुंचते हैं.
1691 में हुआ था मंदिर का निर्माण
जगन्नाथपुर मंदिर का निर्माण 25 दिसंबर 1691 को नागवंशी शासक ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव ने कराया था. यह मंदिर बड़कागढ़ क्षेत्र की लगभग 250 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है. वर्तमान भव्य स्वरूप वर्ष 1991 में तैयार किया गया, जिसकी स्थापत्य शैली ओडिशा के पुरी स्थित श्रीजगन्नाथ मंदिर से प्रेरित है.
मंदिर में अभी भी निर्माण कार्य जारी है. मुख्य मंदिर परिसर में भोग गृह, गरुड़ मंदिर और चौकीदार मंदिर भी स्थित हैं. वहीं मंदिर से लगभग आधा किलोमीटर दूर मौसीबाड़ी है, जहां रथयात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा नौ दिनों तक विराजमान रहते हैं.
आदिवासी सेवक के स्वप्न से जुड़ी है मंदिर निर्माण की कथा
जगन्नाथपुर मंदिर के निर्माण को लेकर एक लोकप्रिय कहावत प्रचलित है. मान्यता के अनुसार, वृद्धावस्था में ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव अपने एक आदिवासी सेवक के साथ भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने पुरी गए थे. वहां सेवक को स्वप्न में भगवान ने दर्शन दिए.
इसके बाद भगवान जगन्नाथ ठाकुर ऐनीनाथ शाहदेव के भी स्वप्न में आएं और उन्हें अपनी राजधानी लौटकर मंदिर निर्माण कराने का आदेश दिया. इसे ईश्वरीय संकेत मानकर उन्होंने सतरंजी लौटकर वर्ष 1691 में मंदिर का निर्माण कराया.
नेत्रदान की परंपरा के बाद शुरू होती है रथयात्रा
रथयात्रा से पहले भगवान के विग्रहों का पारंपरिक स्नान उत्सव आयोजित किया जाता है. ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन भगवान को 108 कलशों के सुगंधित जल से स्नान कराया जाता है. इसके बाद भगवान कुछ दिनों के लिए एकांतवास में रहते हैं, जहां उनका विशेष श्रृंगार किया जाता है. रथयात्रा से एक दिन पहले विग्रहों में नेत्र अंकित करने की परंपरा निभाई जाती है, जिसे 'नेत्रदान' कहा जाता है. इसी अनुष्ठान के बाद श्रद्धालुओं के लिए भगवान के दर्शन फिर से शुरू होते हैं.
नौ दिनों तक लगता है राज्य का सबसे बड़ा मेला
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा भव्य रथ पर सवार होकर मौसीबाड़ी के लिए प्रस्थान करते हैं. इस अवसर पर नौ दिनों तक विशाल मेला लगता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं. इसके बाद भगवान वापस अपने घर लौटते हैं. इसलिए इसे 'घुरती रथ' भी कहा जाता है. रथ खींचने के लिए हजारों श्रद्धालु उत्साह के साथ जुटते हैं. पूरे आयोजन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस बल और स्वयंसेवकों की तैनाती की जाती है.
ब्रिटिश इतिहासकारों ने भी किया है उल्लेख
जगन्नाथपुर मंदिर और इसकी रथयात्रा का उल्लेख ब्रिटिश काल के कई इतिहासकारों ने भी किया है. विलियम हंटर ने वर्ष 1877 में प्रकाशित अपनी पुस्तक स्टैटिस्टिकल अकाउंट ऑफ बंगाल में इसे छोटानागपुर का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन बताया था. वहीं इतिहासकार बेडलो बूट ने भी मंदिर की भव्यता, इसकी ऊंची पहाड़ी पर बनी संरचना और रथयात्रा में उमड़ने वाली विशाल भीड़ का विस्तार से वर्णन किया है.
बिरसा मुंडा भी पहुंचे थे जगन्नाथपुर
इतिहासकारों के अनुसार, धरती आबा बिरसा मुंडा ने भी अपने धार्मिक प्रवास के दौरान जगन्नाथपुर मंदिर में पूजा-अर्चना की थी. बताया जाता है कि उन्होंने यहां अपने अनुयायियों के साथ भगवान के दर्शन किए और चंदन का तिलक लगाया. इसके बाद वे तपस्या के उद्देश्य से पुरी स्थित जगन्नाथ धाम भी गए थे.
1977 में बनी न्यास समिति, अब सार्वजनिक मंदिर
वर्ष 1964 में जगन्नाथपुर मंदिर को सार्वजनिक धार्मिक संपत्ति घोषित किया गया. इसके बाद 1977 में जगन्नाथपुर मंदिर न्यास समिति का गठन किया गया, जो मंदिर की व्यवस्थाओं, विकास कार्यों, रथयात्रा और अन्य धार्मिक आयोजनों का संचालन करती है.
मंदिर का स्थापना दिवस हर वर्ष 25 दिसंबर को मनाया जाता है. इस अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना के साथ विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं.
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