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स्टैंड बदलने के कारण कंटेम्प्ट में दोषी करार दिए गए RCCF व DFO

Shakeel Akhter Ranchi : बोकारो के तेतुलिया की जमीन के मामले बार-बार स्टैंड बदलने की वजह से वन विभाग के अफसरों को कंटेम्प्ट के मामले में दोषी करार दिया गया. हाइकोर्ट में विवादित जमीन को प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट और सुप्रीम कोर्ट में प्राइवेट फॉरेस्ट होने की बात कही गयी. यानी सरकार को खुद ही स्पष्ट नहीं है कि जमीन का नेचर क्या है. इस जमीन की खरीद बिक्री होने की दूसरी वजह जमीन का प्रतिबंधित सूची (NGDRS) में नहीं होना है. बोकारो जिले के तेतुलिया स्थित 74.38 एकड़ जमीन इजहार हुसैन ने उमायुष मल्टी कॉम को बेची. इसके बाद इस मामले में राज्य सरकार के साथ जमीन के मालिकाना हक के लेकर कानूनी विवाद शुरू हुआ. सरकार ने इजहार हुसैन व अन्य के नाम कायम जमाबंदी रद्द कर दी. मामला हाईकोर्ट पहुंचा.  हाईकोर्ट में इजहार हुसैन बनाम राज्य सरकार (593/2017) के इस मामले में सुनवाई हुई. इसमें राज्य सरकार की ओर से यह दावा किया गया कि 09.07.1958 को जारी बिहार गजट अधिसूचना के आलोक में जमीन प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट है. इसके बाद न्यायालय ने इजहार के नाम कायम जमाबंदी से संबंधित आदेश को रद्द कर दिया. साथ ही सरकार को इस बात की आजादी दी कि अगर वह चाहे तो अपना मालिकाना हक साबित करने के लिए टाइटल सूट कर सकती है. 
इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने एलपीए दायर किया. एलपीए में भी राज्य सरकार हार गयी. एलपीए में सरकार ने जमीन को प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट बताया. इसके बाद वन विभाग यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंची कि जमीन उसकी है. हाईकोर्ट में उसे तो पार्टी ही नहीं बनाया गया था. 
सुप्रीम कोर्ट में वन विभाग ने जमीन को प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट के बदले प्राइवेट फॉरेस्ट लैंड करार दिया. सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी. इस बीच वन विभाग ने पत्र जारी कर जमीन पर हो रहे गैर वानिकी काम को रोकने का आदेश दिया. वन विभाग के इस आदेश के आधार पर हाईकोर्ट में कंटेम्प्ट को गैर वानिकी कार्य रोकने के लिए जारी किये गये पत्र को वापस करने का आदेश दिया. लेकिन बोकारो के डीएफओ ने आरसीसीएफ के पत्र हवाला देते हुए शपथ पत्र दायर कर यह कहा कि गैर वानिकी कार्य नहीं करने के लिए जारी किये गये पत्रो को वापस नहीं लिया जा सकता है.
डीएफओ के इस शपथ पत्र के बाद न्यायालय ने कंटेम्प्ट पिटिशन में आरसीसीएफ डी.वैंकटेश्वरला को पार्टी बनाया. इसके बाद कोर्ट ने वन विभाग के इन दोनों अधिकारियों को कंटेम्प्ट में दोषी करार दिया. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के आलोक में कंटेम्पट की सजा नहीं सुनाई. 
कंटेम्प्ट के दोषी करार दिये गये दोनों अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट जाने के लिए आठ सप्ताह का समय मिला. न्यायालय ने कंटेम्प्ट के मुद्दे पर दोषी करार देने के लिए तीन महत्वपूर्ण बिंदुओं को आधार बनाया और उसकी समीक्षा की.
  • वन विभाग की दलील थी कि हाईकोर्ट में उसे पार्टी नहीं बनाया गया.
न्यायालय ने वन विभाग के इस दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि हाईकोर्ट में इजहार बनान राज्य सरकार में मुख्य सचिव को प्रतिवादी बनाया गया था. राज्य के सभी विभाग मुख्य सचिव को रिपोर्ट करते हैं. इसलिए वन विभाग के इस दावे को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि उसे पार्टी नहीं बनाया गया था.
  • राज्य सरकार ने दावा किया था कि 09.07.1958 को जारी बिहार गजट के आलोक में जमीन सरकार की है.
न्यायालय ने इस मामले की समीक्षा के बाद कहा कि सरकार हाईकोर्ट में इजहार हुसैन बनाम राज्य सरकार और एलपीए में अपने इस दावे को साबित नहीं कर सकी.
  • हाईकोर्ट में जमीन को प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट और सुप्रीम कोर्ट में प्राइवेट फॉरेस्ट होने का दावा किया गया.
न्यायालय समीक्षा के बाद इस दावे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह नया स्टैंड है. जमीन की दोनों प्रकृति एक साथ नहीं हो सकती है.
इन तीनों बिंदुओं की समीक्षा के बाद न्यायालय ने पाया कि वन विभाग के अधिकारी कोर्ट के फैसले को अमल में लाने में बाधा डाल रहे हैं. इसलिए वे अवमानना के दोषी है.

सर्वे के बाद आवंटित नया प्लॉट नंबर प्रतिबंधित सूची में नहीं

सर्वे के बाद जमीन के पुराने खाता प्लॉट नंबर में बदलाव होता है. ऐसा सिर्फ रिजर्व फॉरेस्ट में नहीं होता है. क्योंकि रिजर्व फॉरेस्ट का सर्वे नहीं होता है. सर्वे के बाद प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट के खाता प्लॉट नंबर में बदलाव होता है. तेतुलिया की वनभूमि का प्लॉट (426,450) रजिस्ट्री ऑफिस की प्रतिबंधित सूची में है. लेकिन सर्वे के बाद हुए बदलाव में प्लॉट नंबर 426 किसी अनवर अंसारी के नाम पर है, जो प्रतिबंधित सूची में है. 
प्लॉट नंबर 450 भी प्रतिबंधित सूची में है. पहले के ये प्लॉट नंबर नये सर्वे में दूसरों को आवंटित हो चुका है. नये सर्वे में वन भूमि को आवंटित नया प्लॉट नंबर प्रतिबंधित सूची में नहीं है. क्योंकि वन विभाग ने खाता प्लॉट में हुए बदलाव की सूचना रजिस्ट्री कार्यालय को नहीं दी.
दूसरी बात यह कि वन विभाग अब अपनी दावेदारी वाली जमीन को प्राइवेट फॉरेस्ट लैंड बता रहा है. इसलिए सरकार इसे प्रतिबंधित सूची में नहीं डाल सकती है.

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