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सुप्रीम कोर्ट के चार नोटिसों के क्रम में पढ़ें, समझ में आयेगा केंद्र सरकार, आयोग व अदालतों में चल क्या रहा है

जिस व्यवस्था की माफी अदालत में टिक नहीं सकी, जिसका हलफनामा समय पर नहीं पहुंचा और जिसकी "समिति" एक अदालत में, अदालत के बाद और दूसरी में अदालत से पहले बनी, क्या वह व्यवस्था कल सुबह एक लड़के से यह पूछने का नैतिक अधिकार रखती है कि तुम तिरंगा लेकर पार्क में क्यों आए?
 
सुप्रीम कोर्ट की फाइल फोटो

डॉ. पुरुषोत्तम मेघवाल

कल (15 अक्टूबर) सुप्रीम कोर्ट ने एक ही दिन में चार नोटिस जारी किए, इन्हें क्रम से पढ़िए, क्योंकि क्रम ही असली खबर है. पहला नोटिस, निर्वाचन आयोग को. दूसरा, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को. तीसरा, दोनों आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी को. पंद्रह दिन के भीतर जवाब दो कि 13 करोड़ नाम कैसे और क्यों हटे? यह वह क्षण है जिसके लिए सड़क पर हजारों लोग उठाए गए. जो आयोग पूरे सप्ताह चुप रहा, वह अब अदालत में बोलेगा, क्योंकि वहां चुप रहना विकल्प नहीं है. 

और चौथा नोटिस राहुल गांधी, अखिलेश यादव और उन नेताओं को, जो सोमवार को अदालत तक पैदल चले थे. कारण, "कोई न्यायपालिका को डराने की कोशिश न करे. हम हाथी दांत की मीनार में नहीं बैठे हैं, और पीठ ने बिना नाम लिए जोड़ा, "एक याचिकाकर्ता से उसके आचरण के बारे में पूछना चाहेंगे.”

 

"बिना शर्त माफी" नहीं

उसी सुनवाई में एक और वाक्य गूंजा. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि गृह सचिव की "बिना शर्त माफी" का यह अर्थ नहीं कि सरकार अपनी कार्रवाई का बचाव नहीं कर सकती, माफी तो "प्रक्रिया का हिस्सा" है. पढ़िए इसे दोबारा. माफी प्रक्रिया का हिस्सा है. यानी एक औपचारिकता. 

 

सुबह जिस माफीनामे में दोबारा वही करने की अर्जी भी थी, दोपहर में सरकार के सबसे बड़े वकील ने उसे खुद स्वीकार कर लिया. अदालत ने कहा, हम मीडिया रिपोर्टों का संज्ञान नहीं ले रहे. ठीक है. पर हलफनामा मीडिया रिपोर्ट नहीं है, वह अदालत की अपनी फाइल में है. 

 

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि गृह सचिव की माफी तो अवमानना की "प्रक्रिया" का हिस्सा है, इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार अपनी कार्रवाई का बचाव नहीं करेगी. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने तुरंत उत्तर दिया, "हम बिना शर्त माफी का संज्ञान नहीं ले रहे. आपकी इसी दलील से वह अब सशर्त हो गई.” एक वाक्य में सरकार ने अपनी माफी खुद उतार दी और अदालत ने उसे दर्ज कर लिया.

 

हाई कोर्ट में कुछ-सुप्रीम कोर्ट में कुछ

लेकिन 15 अक्टूबर की असली खबर यह नहीं रही. असली खबर दो अदालतों के बीच फंसा एक झूठ है. 13 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट में कहा कि जंतर-मंतर को प्रदर्शन-स्थल से हटाने का फैसला सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के आदेश के अनुसार लिया गया. आज उसी सुप्रीम कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि नहीं, अदालत का आदेश इसका आधार नहीं था, समिति तो बहुत पहले बन चुकी थी, उसकी विस्तृत रिपोर्ट है. तो हाईकोर्ट को क्या बताया गया और सुप्रीम कोर्ट को क्या?दोनों सच नहीं हो सकते. 

 

जिस समिति का नाम, सदस्य और तारीख अब तक किसी को नहीं पता, वह सोमवार तक "सुप्रीम कोर्ट के निर्देश" पर काम कर रही थी और गुरुवार को "अदालत से पहले" बन चुकी थी. अदालत ने इस पर नोटिस दिया है और पिछले पंद्रह दिनों में धारा 163 के तहत जारी हर निषेधाज्ञा की प्रति मांगी है. न्यायमूर्ति बागची का वाक्य था, "जवाब पढ़ेंगे, संतुष्ट नहीं हुए तो कानून अपना रास्ता लेगा.”

 

और एक बात जो किसी सुर्ख़ी में नहीं आई. अदालत ने कहा, "डीएमआरसी के जवाब के अलावा हम कोई और जवाब पढ़ ही नहीं पाए.” सरकार ने सोमवार से गुरुवार तक का समय मांगा था और गुरुवार को हलफनामे इतनी देर से पहुंचे कि पीठ उन्हें पढ़ भी नहीं सकी. यानी जिस "बिना शर्त माफी" की सुबह सुर्ख़ियां बनीं, वह शाम तक न अदालत की नजर में माफी रही, न समय पर पहुंची फाइल.

 

माला पहनाकर स्वागत

इसी बीच अदालत ने महिला पत्रकारों से बदसलूकी के आरोपों पर एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की व्यक्तिगत उपस्थिति मांग ली. और याचिकाकर्ताओं ने वह बात रखी जो देश को सबसे ज्यादा चुभनी चाहिए, कि जिन लोगों ने बच्चों और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हमला किया, वे एक दिन में जमानत पर छूटे और बाहर उनका माला पहनाकर स्वागत हुआ. जबकि जिन्होंने गेट फांदा, वे पांचवें दिन भी जेल में हैं.

 

हां, आज निर्वाचन आयोग, ज्ञानेश कुमार, संधू और जोशी को भी नोटिस मिला और वह जरूरी था. और हां, राहुल गांधी और अखिलेश यादव को भी उनकी पैदल यात्रा के "आचरण" पर नोटिस मिला. 

 

हाथी दांत की मीनार में नहीं बैठे

"कोई न्यायपालिका को डरा नहीं सकता, हम हाथी दांत की मीनार में नहीं बैठे” इस पर इतना ही कि जिस मुख्य न्यायाधीश ने कहा था ज्ञापन नहीं, याचिका लाओ, उनके दरवाजे तक याचिका लेकर चलना धमकी कैसे हो गया, यह प्रश्न खुला है. पर आज की सुनवाई में अदालत ने जितने सवाल सरकार से पूछे, उसके सामने यह एक नोटिस छोटा पड़ता है. आज अदालत ने अपनी मीनार का दरवाज़ा सरकार की ओर खोला, और यह कम बात नहीं.

 

आज शुक्रवार है. अभिजीत दीपके ने क्नॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में "लहरा दो तिरंगा" का आह्वान किया है. दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट में कहा है कि दीपके के विरुद्ध "उचित कदम" उठाए जाएंगे. यानी जिस दिन सुप्रीम कोर्ट पूछ रहा है कि प्रदर्शन की जगह छीनी क्यों गई, उसी शाम पुलिस अगले प्रदर्शनकारी के लिए कदम तय कर रही है.

 

झूठ की उम्र उतनी ही होती है जितनी देर दो सच्चे लोग आपस में बात नहीं करते. आज दो अदालतों ने आपस में बात कर ली. हाईकोर्ट को कुछ और बताया गया था, सुप्रीम कोर्ट को कुछ और. अब दोनों कमरों में वही कागज पड़ा है, और कागज बोलता है.

 

जिस व्यवस्था की माफी अदालत में टिक नहीं सकी, जिसका हलफनामा समय पर नहीं पहुंचा और जिसकी "समिति" एक अदालत में, अदालत के बाद और दूसरी में अदालत से पहले बनी, क्या वह व्यवस्था कल सुबह एक लड़के से यह पूछने का नैतिक अधिकार रखती है कि तुम तिरंगा लेकर पार्क में क्यों आए?

 

डिस्क्लेमरः डॉ. पुरुषोत्तम मेघवाल, एक पूर्व सिविल सेवक और 29 वर्षों के अनुभव वाले अनुभवी UPSC मेंटर हैं. 

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