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गणतंत्र का पर्व और झारखंड की सांस्कृतिक विरासत: जल, जंगल और जमीन का संकल्प

  • जल-जंगल-जमीन और जनतंत्र: झारखंड का जीवंत गणतंत्र

आज जब भारत अपना गणतंत्र दिवस मना रहा है, तो झारखंड की इस पावन माटी में लोकतंत्र की जड़ें केवल दिल्ली के लाल किले से नहीं, बल्कि यहाँ के गाँवों की अखड़ा और मुंडा-मानकी शासन प्रणाली से भी जुड़ती हैं. गणतंत्र का अर्थ ही है जनता का तंत्र, और झारखंड की धरती सदियों से अपनी विशिष्ट सामाजिक संरचना और प्रकृति-सम्मत जीवन पद्धति के माध्यम से इस अवधारणा को जीती आई है. यह राज्य केवल खनिज संपदा का केंद्र नहीं है, बल्कि यह 32 विभिन्न जनजातियों और सदनों के आपसी मेल-जोल का एक जीवंत दस्तावेज़ है.

 

लोकतंत्र की प्राचीन जड़ें और सामाजिक ताना-बाना

झारखंड की कुल जनजातीय आबादी का लगभग 91 प्रतिशत हिस्सा आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करता है, जो अपनी प्राचीन परंपराओं को सम्पूर्ण रखे हुए है. हमारे यहाँ की हो जनजाति की मुंडा-मानकी शासन प्रणाली में आज भी उस प्राचीन लघु लोकतंत्र की झलक देखने को मिलती है, जहाँ सामुदायिक निर्णय लेने की प्रक्रिया सामूहिक होती है. समाज का यह ढांचा पितृसत्तात्मक है, लेकिन महिलाओं को यहाँ सम्माननीय स्थान प्राप्त है.

 

राज्य की जनसंख्या का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा सदन समुदाय का है, जो झारखंड के गैर-जनजातीय मूल निवासी हैं. सदन और आदिवासी एक-दूसरे के पूरक हैं. जहाँ आदिवासी कबीलाई स्वभाव के हैं, वहीं सदन स्थायी स्वभाव के ग्रामीण निवासी हैं, जिनका मुख्य पेशा कृषि है. यह सामाजिक भिन्नता ही हमारे गणतंत्र को मजबूती प्रदान करती है.

 

सांस्कृतिक धरोहर: कला और सौंदर्य के रंग

झारखंड का गणतंत्र इसकी कलाओं में सांस लेता है. जब हम छऊ नृत्य की बात करते हैं, तो यह केवल एक नृत्य नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारी पहचान है. सरायकेला में जन्मी इस शैली में मुखौटों के माध्यम से पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं का मंचन किया जाता है, जिसमें वीर रस और श्रृंगार रस का अद्भुत समागम होता है. वहीं, पाइका नृत्य हमारे पूर्वजों के शौर्य का प्रतीक है, जिसमें नर्तक सैनिक वेश धारण कर हाथ में तलवार और ढाल लेकर मार्शल आर्ट का प्रदर्शन करते हैं.

 

हमारी चित्रकला की विरासत भी उतनी ही समृद्ध है. पइतकर चित्रकारी, जिसे झारखंड की स्क्रॉल चित्रकला भी कहा जाता है, आमादुबी गाँव की पहचान है. सोहराय और कोहबर की कलाकृतियाँ घरों की दीवारों पर केवल चित्र नहीं उकेरतीं, बल्कि प्रकृति और वैवाहिक जीवन के प्रतीकों को जीवंत करती हैं. सोहराय जहाँ पालतू पशुओं और फसल उत्सव से जुड़ी है, वहीं कोहबर, जिसका अर्थ है गुफा में विवाहित जोड़ा, विवाह के पावन बंधन और वंश वृद्धि का प्रतीक है.

 

भाषा और साहित्य: अभिव्यक्ति का अटूट प्रवाह

गणतंत्र की शक्ति उसकी भाषाओं की विविधता में निहित है. झारखंड में आस्ट्रिक और द्रविड़ भाषा समूहों का संगम है. संथाली भाषा, जिसे वर्ष 2004 में भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया, हमारी बौद्धिक संपदा का गौरव है. पंडित रघुनाथ मुर्मू द्वारा खोजी गई ओलचिकी लिपि संथाली साहित्य की रीढ़ है.

 

इसी तरह, कुडुख भाषा का लिखित साहित्य भी काफी समृद्ध है, जिसमें अहलाद तिर्की और बिहारी लकड़ा जैसे रचनाकारों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है. सदानी भाषाओं में खोरठा, नागपुरी, पंचपरगनिया और कुरमाली ने यहाँ की संस्कृति को जन-जन तक पहुँचाया है. नागपुरी भाषा, जो नागवंशी राजाओं की मातृभाषा थी, आज भी अपने माधुर्य के लिए जानी जाती है.

 

प्रकृति और पर्व: जल, जंगल और जमीन की आराधना

झारखंड के पर्व केवल त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का संकल्प हैं. सरहुल, जो जनजातियों का सबसे बड़ा पर्व है, चैत माह में साल के वृक्षों पर नए फूलों के आने पर मनाया जाता है. यह फूलों का त्योहार है, जहाँ पाहन सखुआ के कुंज की पूजा करते हैं. कर्मा का त्योहार भाई-बहन के प्रेम और प्रकृति की प्रधानता का संदेश देता है.

 

सोहराय का पर्व दीपावली के अगले दिन मनाया जाता है, जो हमारे जानवर धन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है. वहीं, मंडा पूजा महादेव की सबसे कठोर आराधना है, जहाँ श्रद्धालु दहकते हुए अंगारों पर चलकर अपनी अटूट आस्था का परिचय देते हैं, जिसे फूल-खुंदी कहा जाता है. टुसू मेला और हजला मेला जैसे आयोजन हमारी सामुदायिक एकता के केंद्र हैं.

 

धार्मिक और ऐतिहासिक वैभव

झारखंड की धरती पर स्थापित देवालय हमारी आध्यात्मिक चेतना के स्तंभ हैं. देवघर का वैद्यनाथ मंदिर, जहाँ शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक मनोकामना लिंग स्थित है, विश्व का सबसे बड़ा वार्षिक मानव मेला श्रावणी मेला आयोजित करता है. रजरप्पा का छिन्नमस्तिका मंदिर, जो दामोदर और भैरवी नदी के संगम पर स्थित है, शक्ति की असीम श्रद्धा का केंद्र है. राँची का जगन्नाथ मंदिर और बुंडू का सूर्य मंदिर, जिसे पत्थर पर लिखी कविता कहा जाता है, हमारी स्थापत्य कला के बेजोड़ उदाहरण हैं.

 

ऐतिहासिक दृष्टि से, पलामू का किला, नवरत्नगढ़ का महल और राजमहल की पहाड़ियों में स्थित तेलियागढ़ किला हमारे पूर्वजों के संघर्ष और वैभव की कहानियाँ सुनाते हैं. पलामू किले का नागपुरी दरवाजा आज भी अपनी खूबसूरती से पर्यटकों को आकर्षित करता है.

 

संगीत और वाद्ययंत्र: धड़कता हुआ झारखंड

झारखंड का जीवन बिना संगीत के अधूरा है. यहाँ के लोकगीतों में जीवन के हर संस्कार की धुन है, चाहे वह जन्म के समय गाया जाने वाला झंझाइन हो या विवाह के समय का डोमकच. मांदर, जो झारखंड का प्राचीनतम और प्रमुख वाद्ययंत्र है, अपनी गूंज से पूरी वादी को सराबोर कर देता है. नगाड़ा, ढोल और बाँसुरी के साथ जब केन्दरा बजता है, तो वह संगीत सीधे आत्मा को छूता है.

 

आज इस गणतंत्र दिवस पर, जब हम अपने संविधान की प्रस्तावना को दोहराते हैं, तो हमें झारखंड की उन प्राचीन लोकतांत्रिक प्रणालियों को भी याद करना चाहिए जिन्होंने हमें समानता और सहभागिता सिखाई. सांस्कृतिक विविधता ही हमारी शक्ति है. हमें अपनी ओलचिकी लिपि, अपने छऊ के मुखौटे और अपने सरहुल के संदेश को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है. झारखंड का विकास केवल सड़कों और उद्योगों से नहीं, बल्कि यहाँ की संथाली, मुंडारी, उरांव और हो जैसी भाषाओं के संरक्षण और पइतकर व सोहराय जैसी कलाओं के प्रोत्साहन से होगा. 

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