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गणतंत्र एक सौभाग्य, एक जिम्मेदारी…

LagatarDesk :  आजाद फिजा में हम सांस ले रहे. हमें हक मिला कि देश को अपनी पंसद के प्रतिनिधियों के हाथ में सौंपे. यह सौभाग्य हमें उनसे मिला जो अपनी जान गवां कर भी आजादी की लड़ाई में दुश्मनों के दांत खट्टे किए. यह सौभाग्य उनसे भी मिल रहा जो आजादी के बाद भी सीमा पर डटे रहे हमारी सुरक्षा के लिए, परिवार या व्यक्तिगत सुख-सुविधा से ऊपर उठ कर. यह सौभाग्य दरअसल एक जिम्मेदारी है. यह भी सच है कि इस जिम्मेदारी को हम कई बार हल्के तौर पर लेते हैं. एक सैन्य अधिकारी की मां की डायरी के जरिए हम समझेंगे कि क्या गवां कर वे हमारे लिए सुकून बटोर रहे. एक शहीद की वीरांगना के दर्द के जरिए भी आजादी और लोकतंत्र की अहमियत समझने की कोशिश करेंगे….

सैन्य अधिकारी की मां की डायरी-नंदा पांडेय

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alt="" width="600" height="400" />   एक सैन्य अधिकारी की मां से उसके जिगर के टुकड़े बेटे को लेकर अनुभव शेयर करने को कहा जाय तो मुश्किल तो है. पर कुछ अच्छी और यादगार बातें भी हैं जो कभी खत्म नहीं होंगी. मुमकिन है कि कई किताबें हो जाएं उन अनुभवों को लिखकर. आज मैं अपने बेटे मेजर मोहित मयंक के बारे में अपने कुछ अनुभव आप सबके साथ शेयर करने जा रही हूं. मोहित जिसे प्यार से हम बॉबी बुलाते हैं, बचपन से ही कुशाग्र और प्रतिभावान था. खेलकूद हो या पढाई हमेशा ही अपने क्लास में अव्वल रहता था.

बचपन के खेल में तोप-टैंक

पर वो कहते हैं न कि "पूत के पांव पालने में ही पहचाने जाते हैं" तो ऐसा ही कुछ बॉबी में दिखता था. बचपन से ही उसकी पसंद, खेल सब कुछ और बच्चों से अलग हुआ करता था. उसे खिलौनों में बंदूकें बहुत पसंद थी. खिलौनों की दुकानों में तरह-तरह के खिलौनों के बावजूद उसे तरह-तरह के गन, मशीन- गन, टैंक, तोपें, ही मैन, वगैरह ही चाहिए होते थे. उसे आर्मी वाली वर्दी, बूट पहनना बहुत पसंद था. मैं अक्सर चिढ़ जाया करती थी. उसकी बातों में पहाड़, तोप का अक्सर जिक्र रहता था. उसका पसंदीदा खेल ही यही था पहाड़ और तोपें. कभी-कभी मैं उसके सारे खिलौनों को छुपा दिया करती थी. तो पेन को ही तोप और घर के सारे तकिये को पहाड़ बना कर खेलता था. तब कोई नहीं जानता था कि बड़े होने पर असली तोपों से खेलने वाला है ये बॉबी.

बॉर्डर फिल्म का वह गाना

छोटा था जब "बार्डर" फ़िल्म आई थी और उसका गाना "संदेशे आते हैं संदेशे जाते हैं कि तुम कब आओगे" उसका पसंदीदा गाना था. चलते-चलते रोड पर भी अगर वो गाना उसे सुनाई दे दे तो सड़क पर वहीं खड़ा हो जाता था जब तक कि गाना पूरा नहीं हो जाता. फिर `राष्ट्रीय इंडियन मिलेट्री कॉलेज देहरादून " से पढ़ाई करने के बाद उसका सेलेक्शन "नेशनल डिफेंस अकेडमी" पुणे में ऑल इंडिया रैंक अंडर टेन में सेलेक्शन हुआ. सेवा परमो धर्म: का तमगा लिए आज एक स्ट्रिक्ट अधिकारी `मेजर मोहित मयंक` के रूप में उसकी अपनी एक पहचान है. बात उन दिनों की है जब उसकी पोस्टिंग "चाइना बार्डर" में थी. कई-कई महीनों उससे बात नहीं होती थी. मन में एक चोर दुबक कर बैठा रहता था. जाने कैसा होगा बॉबी! फिर जिस दिन उसका फोन आता ऐसा लगता मानो ऑक्सीजन मिल गया हो हमें. बहुत कठिन थे वे दिन जब एक हैलो के बाद फोन डिस्कनेकड हो जाता और कई -कई दिनों, महीनों उसके फोन का इंतजार रहता था हमें. उनदिनों हमलोग मैं और हमारे पति एक दूसरे से कुछ छिपाने लगे थे. हम हमारे आंसुओं को छिपाते थे, एक -दूसरे से. चीन और भारत को लेकर जब टीवी में खबरें आती तो हम विचलित हो जाते. जब बॉबी से बात होती तो पता चलता कि नहीं मां सब ठीक बस मौसम ठीक नहीं होता है, बाकी सब ठीक है. आप बेकार की चिंता न करें तो क्या कहूं की कितनी अच्छी नींद आती थी. फिर कुछ दिनों बाद वही चिंता. हर दिन एक नया दिन होता था हमारे लिए. सच ही कहते हैं लोग कि मुश्किल घड़ी जल्दी नहीं गुजरती है. खैर, जैसे - तैसे वह समय भी गुजर ही गया. दिल में और भी बहुत कुछ है फिर कभी शेयर करूंगी.

कहना यह है :

सरकार को चाहिए कि भारत में भी इजराइल की तरह सेना में सेवा देने की बाध्यता हो. यहां देशप्रेम सिर्फ और सिर्फ सोशल मीडिया पर 26 जनवरी और 15 अगस्त को ही दिखता है. समाज में सेना के परिवारों को समुचित सम्मान चाहिए न कि दया. एक सैनिक किसी भी परिस्थिति में, चाहे वह सियाचिन का 20° - तापमान हो या फिर पोखरण का 45°तापमान हो, अपने साहस और वीरता के साथ देश रक्षा का धर्म निभाता है. अफसोस कि बात है कि इस देश में सियाचिन की ठंड में सीमा की रक्षा करते हुए सैनिकों से आयकर को काटा जाता है परन्तु संसद में वातानुकूलित कमरे में बैठने वाले जनप्रतिनिधियों को इस कर से मुक्त रखा जाता है. क्या यही है देश प्रेम और सैनिकों के प्रति सम्मान!

हर पड़ाव पर अखरता उनका जाना -प्रिया संकल्प

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alt="" width="600" height="400" /> मम्मा आज से स्कूल फॉर्मल टाई बांध कर जाना है, आपको बांधनी आती है! बड़ी बिटिया सारा ने जब यह कहा तो संकल्प का जाना फिर टीस पहुंचा गया. काश कि यहीं होते आप! तब यू टुयूब उतने सहज नही थे. बिटिया ने मेरी मन:स्थिति समझी और खुद ही जाने कैसे ट्रायल-एरर करते बांध ली टाई, बात छोटी सी है, पर हमारे हिस्से बार-बार, कई बार आता है वह पल जब बच्चों के पिता का नहीं होना खलता है, बहुत खलता है. बड़ी बिटिया सारा का मैट्रिक में शानदार रिजल्ट हो या छोटी बिटिया मन्ना का स्पोर्ट्स में मेडल जीतना, बच्चों के जन्मदिन, उनके स्कूल का एनुअल डे, पैरेंट्स टीचर मीट, स्पोटर्स डे…हर जगह बेशक मैं होती हूं, पर नहीं होते हैं उनके पिता. मैं खुशियां बांटने के लिए उनका साथ चाहती, परेशानियों में उनका कंधा तलाशती हूं.

डायरी का वह खाली कोना

बात बेहद छोटी सी है, पर मेरे लिए, मेरी बेटियों के लिए भावुक करने वाली. स्कूल की डायरी में पिता का नाम, उनका व्यवसाय, उनका दफ्तर, फोन नंबर…सबका सेगमेंट होता है. जब बेटियां छोटी थीं, मैं इसे भरती थी और रोती जाती. बेटियों ने मां को यहां कमजोर होते देखा तो इस पन्ने को खुद अनदेखा करने लगी, या खुद ही कभी भर देती जरूरत लायक जानकारी.

किनसे बांटू खुशियां

क्या कहूं, कहां, कहां संकल्प का नहीं रहना अखरा. उनके जाने के बाद अपने वजूद को मां के रूप में ही प्रमुख रही हूं. मेरी सबसे अहम और पहली प्राथमिकता मेरी बेटियां हैं. जब अच्छे अंक आने के बाद भी सारा ने आर्ट्स सेग्मेंट चुना तो मन को कहीं तसल्ली सी हुई, चलो अच्छा है. साइंस लेती तो कोचिंग के झमेले होते. देर शाम खत्म होने वाले ट्यूशन क्लास से फिर कौन उसे लाता. छठ पूजा करती हूं. सौ के करीब लोग आते हैं प्रसाद लेने. बेशक बच्चियां सब संभाल लेती हैं. घर में नीचे-ऊपर करना, प्रसाद देना, लोगों को गेट तक छोड़ने जाना…तमाम काम संभाल लेती हैं. पर दिल में टीस तो होती है, काश, संकल्प होते.. संकल्प होते तो ऐसा होता, संकल्प होते तो वैसा होता….

प्रियतम संग अंतिम यात्रा

दानापुर कैंट में सेपरेटेड फैमिली क्वार्टर में जब फोन की घंटी उस दिन बजी थी, उसके बाद पूरी दुनिया ही हमारी बदल गई. फोन पर उरी में संकल्प के शहीद होने की सूचना मिली थी. घर में मैं अकेली थी. अपने माता-पिता और सास ससुर को फोन कर इसकी सूचना मैंने दी. बेटियां तब स्कूल में थी. उन्हें खुद स्कूटी चला कर घर लेकर आई. बेटियों को रांची सास-ससुर के पास भेज दिया. खुद दिल्ली के लिए निकल पड़ी, अपने प्रियतम के साथ अंतिम यात्रा साथ करने… आप बेटियों को कम से कम एक सुरक्षित वातारण तो दीजिए. मैं उनके गले में पट्टा नहीं लगा सकती कि इनके पिता ने देश की सुरक्षा के लिए, आपकी सुरक्षा के लिए खुद को शहीद किया. कृपया इनके साथ कोई असभ्य हरकत नहीं करें. देश की सभी बेटियों के लिए सुरक्षित व स्वस्थ माहौल हो जहां रात में भी कहीं जाने या घर लौटने के दौरान खौफ नहीं हो. [wpse_comments_template]

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