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भारतवर्ष के नवनिर्माण का संकल्प

Dr. Mayank Murari राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में प्रस्ताव पारित कर लोगों से स्व आधारित राष्ट्र के नवोत्थान का संकल्प लेने का आहवान किया गया है. इस आह्वान के बाद आजादी के बाद महात्मा गांधी का संकल्प याद आ गया, जिसमें उन्होंने कांग्रेस को राजनीतिक पार्टी के तौर पर खत्म करने की बात कहीं थी. उन्होंने कहा था कि कांग्रेस का राजनीतिक आजादी के लिए कार्य संपन्न हो गया, अब देश के नवनिर्माण के लिए कार्य करना चाहिए. दुर्भाग्य से आजादी के बाद भारत के निर्माताओं की अवधाणा में यह बात प्रमुखता से नहीं आयी. आजादी के बाद राजनीतिक स्वतंत्रता में हम इतना मशगूल हो गये कि भारतवर्ष के नवउत्थान का संकल्प ही भूल गये. राजनीतिक आजादी के बाद सामाजिक एवं चरित्रिक उत्थान एवं राष्ट्र के नव निर्माण के लक्ष्य को हमने कभी गंभीरता से नहीं लिया. आज जो समाज और राष्ट्र के समक्ष समस्या सुरसा की तरह मुंह खोल कर खड़ी है, वह उसका ही परिणाम है. देश ने आर्थिक, राजनीतिक एवं आत्मनिर्भरता के क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता अर्जित की, लेकिन हम उसी तेजी से सामाजिक, शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में विकास नहीं कर पाये. हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को भूल गये, सामाजिक व्यवस्था को तिलांजलि दे दी, शिक्षा को केवल साक्षरता और नौकरी का पर्यायवाची मान लिया. विदेशी आक्रमण और संघर्ष के दौरान भारतीय जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया, हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक एवं धार्मिक मान्यताओं को चोट पहुंचाया गया और आर्थिक संपन्नता को कंगालियत में पहुंचा दिया गया. भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ तो समाज और संस्कृति के सवंर्द्धन और संपोषण पर हमारा ध्यान ही नहीं रहा. संघर्ष काल में विदेशी शासन से मुक्ति के लिए जिस प्रकार त्याग और बलिदान की आवश्यकता थी, उसी प्रकार वर्तमान समय में वैभवशाली और विविधता से परिपूर्ण भारतवर्ष की प्राप्ति के लिए खड़ा होने की जरूरत है. 19 वीं सदी के शुरुआत में वैसी ही स्थिति थी, जैसी आजादी के बाद या आज है. भारतीय विचारकों ने औपनिवेशिक काल में भी जब अंग्रेजों का हमला जीवन पर चौतरफ था, तब भी सभी क्षेत्रों में अपनी भारतीय चिंतन परंपरा एवं विरासत से सराबोर विचार एवं आदर्श को ही सामने रखकर दासता की लड़ाई लड़ी गयी. उनके चिंतन में भारतवर्ष, उसकी परंपरा एवं राष्ट्रवाद का तत्व नहीं होता तो आजादी की लड़ाई एक दूसरे धरातल पर लड़ा गया होता, जिसमें नवजागरण के भाव नहीं होते. भाषा, धर्म, कला, रहन-सहन, संगीत, संस्कृति, अर्थनीति की भांति ही राजनीति में विचारकों ने पाश्चात्य विचार को एकदम से अंगीकार नहीं किया. उन्होंने एक तो वैकल्पिक सांस्कृतिक-वैचारिक पद्धति का विकास किया और दूसरी ओर पारंपरिक संस्थाओं को पुनर्जीवित करने की कोशिश की. औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत के लिए भारतीय जनमानस को तैयार करना था. इसके लिए स्वयं की सामाजिक कुरीतियों एव धार्मिक कट्टरता को खत्म करके राजनीतिक रूप से साम्राज्यवाद को उसकी भाषा में जवाब देना था. इसलिए राजाराम मोहन राय से लेकर विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, रानाडे आदि ने भारतीय समाज को शिक्षित एवं तैयार किया. उन्होंने मानवतावाद को इसके लिए हथियार बनाया. जब यह तैयारी पूरी हो गयी, तो दादाभाई नौरेजी, रमेशचंद्र दत्त, गोखले, मेहता, तिलक और गांधीजी ने इस मानववादी विचार के आधार पर अंग्रेजी शासन की उपयोगिता पर प्रश्न चिह्न लगाया. एक विचाधारा के स्तर पर दूसरा उस विचारधारा के साथ अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में उसके उपयोग से. 20 वीं सदी के मध्याह्न में नेहरू, सुभाष और एमएन राय आदि ने गांधी के वैचारिक नेतृत्व में इसी मानववाद की कसौटी पर अंग्रेजों की शासन व्यवस्था को कसा. आजादी के पूर्व मानववादी विचार राजनीतिक आजादी के लिए था, तो 1947 के बाद मूलतः मानवववाद के हथियार से समाज निर्माण व सांस्कृतिक विकास का कार्य किया जाना चाहिए था. यह अफसोस की बात है कि शिक्षा में हम अपनी विरासत को भूल गये . पश्चिमी देशों के विकास मॉडल को हम आधुनिकीकरण मान बैठे. खानपान, रहन सहन से लेकर सोच विचार सब में पश्चिमीकरण हावी हो गया. किसी प्रकार से नौकरी मिल जाए, यह शिक्षा का लक्ष्य हो गया. ज्ञान और विचार की समृद्धि बीते दौर की बात हो गयी. आज तो नौकरी में मूनलाइट नैतिकता की बात उठने लगी है. यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक व्यक्ति कई नियोक्ता के साथ काम करे, लेकिन एक दूसरा व्यक्ति बेरोजगारी से दम तोड़ दे. हरेक साल लाखों में इंजीनियर और प्रबंधन की डिग्री लेकर देश के नौनिहाल निकल रहे हैं, लेकिन उनके पास नौकरी नहीं है. इसी प्रकार समाज में आज पद, पैसा और प्रतिष्ठा व्यक्ति का स्टेटस सिंबल हो गया है. जो जितना धनवान है, उसकी समाज में उतनी ज्यादा पूछ होगी. एक दौर था कि समाज के गरीब लेकिन विद्वान ब्राह्मण चाणक्य के पास भारतवर्ष का सम्राट आकर बैठता था. भारतीय जनमानस में सदैव ही त्याग, ज्ञान, करुणा को पहला स्थान मिलता रहा है. जनक, याज्ञवल्क्य, वाल्मीकि, व्यास से लेकर वर्तमान में रामदास, विवेकानंद, महात्मा गांधी उदाहरण है. हम अपने नायक को भूल गये. समाज के स्तर पर जो क्षरण हो रहा है वह अकल्पनीय है. परिवार एवं गांव रूपी सामाजिक संस्थाएं खत्म हो रही है. व्यक्ति स्वकेंद्रित हो गया है. एक ही अपार्टमेंट में रहकर हम अपने पड़ोसी के लिए अनजाने हो गये हैं. समाज से न्याय, करुणा, प्रेम और सदभावना की बात तो हम गुजरे दौर की कहानी हो गयी है. हमारा खानपान भी पश्चिमीकरण का पिछलग्गू हो गया है. इसका परिणाम हमारे शरीर और स्वास्थ्य पर हो रहा है. इसके बावजूद नकल करना नहीं छोड़ रहे हैं. हमने समाज निर्माण के लिए संविधान में मौलिक कर्त्तव्य को रखा, लेकिन वह किताब में अक्षर बन कर रहा गया है. पिछले 75 सालों में कोई सरकार उसको लागू करे, इसकी जहमत भी नहीं उठा सकी. ऐसे में विख्यात इतिहासकार एएल वाशम याद आते हैं, जिन्होंने कहा था कि भारतीय सभ्यता अपनी अविच्छिन्नता को बनाये रखेगी, यदि भगवदगीता देश के क्रियाशील व्यक्तियों को तथा उपनिषद् विचारवान व्यक्तियों को प्रेरणा देना बंद नहीं करेंगे. अब समय आ गया है कि फिर से हम अपनी सभ्यता और संस्कृति की ओर लौटे. डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. 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