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महाबली और दंभी नेताओं की सनक का नतीजा है यूक्रेन पर आक्रमण

Faisal Anurag महाबली होने के अहंकार और सनक का नतीजा है, यूक्रेन पर हमला. जब पतवार खब्ती नेताओं के हाथ थमा दी गयी हो कि दुनिया को विध्वंसक युद्धों से बचाना मुश्किल ही है. दुनिया के दो विश्वयुद्ध ऐसे ही दंभी नेताओं के कारण ही करोड़ों लोगों की असामयिक मृत्यु,यातना और तबाही का कारण बनी वैश्विक समझौते, दूसरे महायुद्ध के बाद बने अलिखित प्रोटोकाल पिछले तीन दशकों में बेमानी साबित कर दिए गए हैं. जिसकी लाठी उसकी भैंस ही विश्व नेता माने जाने वाला का आदर्श वाक्य बना चुका है. मास्कों के समयानुसार, छह बजे बाल्दिमीर पुतिन ने युद्ध का एलान कर दिया. हालांकि उनके शब्द है : जो लोग यूक्रेन में हैं, उनसे कभी नहीं पूछा गया कि वो दरअसल कहां रहना चाहते हैं और हमें ये अधिकार है कि हम ये तय करें कि यूक्रेन के लोगों की चाह क्या है. हमने क्रीमिया के लोगों की भी रक्षा की और अब यूक्रेन के लोगों की भी करेंगे. हम आत्मरक्षा में काम कर रहे हैं. हमारे खिलाफ खतरे के मोर्चे खोल दिए गए हैं. हम इस दुखद समय से जल्दी ही निकल जाएंगे. लेकिन इस दौरान किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करेंगे. मं यूक्रेन की आर्मी से कहना चाहूंगा कि आपके पिता-दादा हमारी कॉमन लड़ाई लड़ते रहे. आप अपने हथियार डाल दें और घर चले जाएं. सभी यूक्रेन के ऐसे सैनिकों को सुरक्षित घरों तक पहुंचाया जाएगा. अगर वो ऐसा नहीं करते तो अंजाम भुगतना होगा. इसके लिए कीव जिम्मेदार है.` स्वघोषित मुक्तदाता पुतिन अनैतिक कदम को नैतिकता का जामा इस तरह पहना रहे हैं. इसकी प्रतिक्रिया तो होनी ही थी, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलेदिमीर जेलेंस्की ने कहा, ``यूक्रेन अपना बचाव करेगा और जीतेगा. दुनिया पुतिन को बिल्कुल रोक सकती है. अब कार्रवाई का समय आ गया है." अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन सहित दुनिया के अनेक नेताओं ने रूस को आक्रमणकारी करार दिया और यूक्रेन के समर्थन का एलान कर दिया. संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव अंतनियों गुतरेस ने रूस से अपील किया है कि वह सैनिकों को तुरंत वापस बुलाए. नाटो के महासचिव ने रूसी आक्रमण को अंतरराष्ट्रीय कानून का घोर उल्लंघन बताया है. चीन ने कहा है कि बातचीत के तमाम दरवाजे इस आक्रमण के बाद बंद हो गए हैं. भारत ने दोनों पक्षों से संयम बरते की अपील किया है. यूएनओ सुरक्षा परिषद की भूमिका तो केवल बैठक करने तक सीमित होकर रह गयी है. दुनिया के किसी भी विवाद में इससे अधिक भूमिका वह कभी नहीं निभा पायी है. पिछले तीस-पैंतीस सालों में अनेक युद्धों की गवाह बनी दुनिया को यूएनओ की ओर से कभी राहत भरी खबर नहीं मिली है. एएफपी की एक खबर के अनुसार, क्रेमलिन यानी रूस ने दावा किया है कि यूक्रेन विद्रोहियों ने रूस से कीव यानी यूक्रेन के खिलाफ `मदद` मांगी थी. रूस में भी 1989 में सोवियत संघ यही कहते हुए घुसा था कि अफगानिस्तान की तत्कालीन बबरक करमाल- नजीबुल्लह की सरकार ने सहयोग मांगा है और अमेरिका भी 2001 में अफगानिस्तान पर हमला करते हुए आतंकवाद के खिलाफ लोकतंत्र की दुहायी दी. इराक के युद्ध के समय तो एक झूठा प्रोपेगेंडा को आधार बनाया गया था कि इराक के पास रसायनिक हथियार हैं. लेकिन कुछ सालों बाद जब इराक तबाह हो चुका,तो चिलकॉट की रिपोर्ट ने पश्चिम के मास डिस्ट्रक्शन वाले मिथक को बेनकाब कर दिया. यूक्रेन पर हमले के बाद बेलारूस के विपक्ष ने कहा है : बेलारूस की स्वतंत्रता रूसी सैनिकों द्वारा `खतरे में. पूर्वी यूरोप के छोटे देश जो 1990 तक सोवियत संघ के साथ थे, बेचेनी में हैं. रूसी नेता पुतिन की महत्वकांक्षा कितने देशों को निगलने का प्रयास करेगी, यह इस पर निर्भर है कि दुनिया के देश यूक्रेन के साथ कितना न्याय करते हैं. नाटो की सदस्यता बढ़ाने के अमेरिका पश्चिम के इराके कम खतरनाक नहीं हैं. मास्को टाइम्स में प्रकाशित एक जैक कारडेल के एक लेख का शीर्षक है: इतिहास का पुनर्लेखन, पुतिन ने रूस को एक विस्तारित मातृभूमि के रक्षक के रूप में पेश किया. जाहिर है कि नेताओं के विध्वंसक इरादों का सारांश तो यही निकलता है कि आने वाले दिन दुनिया के हर हिस्से के लोगों की आर्थिक परेशानियों में इजाफा करेगी और सनक से भरे दंभी नेताओं के कुछ और कारनामे देखने को बाध्य होगी. रूस के साथ-साथ पश्चिमी देशों के नेताओं के विस्रतावादी और आर्थिक नवउदावादी नीतियां भी इन हालातों के लिए समान रूप से दोषी है. [wpse_comments_template]

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