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रुरल नक्सल खत्म, अर्बन कब

नक्सली

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बैजनाथ मिश्र

 

हमारा देश रुरल नक्सल से मुक्त हो गया है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस बाबत 30 मार्च को लोकसभा में यह घोषणा की. उन्होंने 24 अगस्त 2024 को देश से नक्सलवाद के सफाये की डेडलाइन 31 मार्च 2026 तय की थी. इससे एक दिन पहले ही उन्होंने संसद को बताया कि नक्सल विरोधी अभियान में 706 नक्सली मारे गये हैं और 4839 ने सरेंडर किया है, जबकि 2218 गिरफ्तार किये गये हैं. अमित शाह ने यह भी कहा कि औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद देश को विस्तृत जानकारी दी जाएगी. उन्होंने साफ कर दिया है कि अब हथियार उठानेवालों को उनकी ही भाषा में समझाया जाएगा. 

 

दरअसल, यह सरकार की बहुत बड़ी उपलब्धि है. तिरूपति से लेकर पशुपति (आंध्र प्रदेश से नेपाल तक) रेड कॉरिडोर कायम करने वालों को लगभग नेस्तनाबूद कर दिया गया है. देश का एक बड़ा भू-भाग हथियारबंद गिरोहों की गिरफ्त से आजाद हो गया है. यानी यह भी आजादी की ही एक लड़ाई थी जिसे मुकम्मल रणनीति से जीता गया है. कहा जा सकता है कि रक्तबीजों की यह मंडली अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. अपने झारखंड के ही दो शीर्ष नक्सली फरार हैं. लेकिन वे पत्तों की आड़ में कितने दिन छिपे रह सकते हैं? 

 

बूढ़ा पहाड़ और ट्रेनिंग नर्सरी झुमरा सुरक्षा बलों और पुलिस के नियंत्रण में है. सारंडा में पतिराम मांझी उर्फ अनल के मारे जाने के बाद वहां भी नक्सलियों की कमर टूट गयी है. अनमोल के खात्मे के बाद तो कोई सरगना आगे आने की हिम्मत ही नहीं कर रहा है. 

 

दंडकारण्य के कुछ नामी-इनामी नक्सली मारे जा चुके हैं, कुछ सरेंडर कर चुके हैं, कुछ बिल में घुस गये हैं तो कुछ देश ही छोड़ चुके हैं. अब नक्सलियों तक राशन और विस्फोटक की सप्लाई नहीं हो पा रही है. न भर्ती कैंप लग रहे हैं, न जन अदालतों का खौफ है. वे डफलियां भी फूट गयी हैं जो इनकी शान में बजायी जाती थीं. नक्सलियों के समर्थक बुद्धिजीवियों को मानो सांप सूंघ गया है. इसका मतलब यह कतई नहीं है कि नक्सलियों से मुकम्मल आजादी मिल गयी है. 1947 में भी तो आजादी मिलने के बाद राजघरानों को देश की संघीय व्यवस्था में शामिल कराने जैसा कार्य शेष था. गोवा तो आजाद हुआ 1961-62 में. जम्मू-कश्मीर में पैंतरेबाजी हुई तो धारा 370 हटने से पहले तक हम गहरे जख्म झेलने के लिए अभिशप्त होते रहे. इसलिए वर्तमान केंद्र सरकार को अभी बिल में घुसे नक्सलियों को खत्म करना होगा या उन्हें जेल भेजना होगा. 

 

इससे भी बड़ा कार्य है अर्बन नक्सलियों पर नकेल कसना. यह वही जमात है जो नक्सली हिंसा का कारण सामाजिक-आर्थिक बताती थी. इसी जमात के लोग पत्रकारिता, साहित्य, न्यायपालिका, प्रशासन, राजनीति और दूसरे संगठनों में पहले भी जमे थे, अब भी हैं. ये हमेशा नक्सलियों को कवर फायर देते रहे हैं और अब भी इनके खात्मे को नाजायज बता रहे हैं. इस गिरोह की एक इकाई (जेएनयू विंग) उस समय जश्न मना रही थी जब सुरक्षा बलों के पचहत्तर जवान छत्तीसगढ़ में घात लगाकर उड़ा दिये गये थे. यह गिरोह तब भी खुश था जब छत्तीसगढ़ में ही विद्याचरण शुक्ल से लेकर महेंद्र कर्मा तक कांग्रेस की पहली-दूसरी कतार के बत्तीस कांग्रेसियों को नक्सलियों ने मौत के घाट उतार दिया था. 

 

झारखंड में ही सांसद सुनील महतो, विधायक रमेश सिंह मुंडा, बाबूलाल मरांडी के पुत्र, दो आइपीएस अजय सिंह और अमरजीत बलिहार, कुछ डीएसपी, सैंकड़ों पुलिसकर्मी तथा सुरक्षा बलों के जवानों की हत्या के बाद न प्रगतिशील आवाजें उठीं, न जनवादी. ये अब जरुर कह रहे हैं कि भटके हुए लोगों से वार्ता करनी चाहिए, उनका इनकाउंटर ठीक नहीं है. ये वही लोग हैं जो गांव-देहात के स्कूलों में फोर्स के रहने से बिदकते थे और कहते थे कि बच्चों की पढ़ाई बाधित हो रही है. लेकिन जब फोर्स हट जाती थी और नक्सली स्कूल उड़ा देते थे तब इनके कलेजे को ठंडक पहुंचती थी. 

 

नक्सली सड़कें नहीं बनने देते थे, पुल-पुलिया उड़ा देते थे, मोबाइल टॉवर तो आये दिन उड़ाये जाते थे. इनके डर से कोई भी अधिकारी अंचलों, प्रखंडों में नहीं रहता था. लेवी वसूली बदस्तूर जारी थी. इन्हें और इनके सरपरस्तों को लगता था कि सत्ता वैलेट से नहीं बुलेट से तय होनी चाहिए. 

 

सत्तर के दशक से शुरु हुआ संविधान और लोकतंत्र के विरूद्ध यह खूरेंजी 2014 तक 126 जिलों तक फैल चुकी थी. बिहार में तो नरसंहारों का दौर शुरु हो गया था. किसानों के खेतों पर लाल झंडे लगाकर फसलें काट ली जाती थीं. इनसे मुकाबले के लिए जातीय सेनाएं गठित हो गयी थीं, चुनाव जिताने के लिए वे बाकायदा चुनाव बहिष्कार की घोषणा करते थे और जरूरत पड़ने पर खून-खराबा भी करते थे. इनके असर वाले इलाकों में चुनाव कराना मुश्किल था. मतदानकर्मी और सुरक्षाकर्मी उन इलाकों में जाना नहीं चाहते थे. 

 

नक्सलियों का मन सिर्फ इसलिए बढ़ गया था कि सरकारों के पास इनके सफाये के लिए न इच्छाशक्ति थी, न योजना और जब वर्तमान सरकार एक संकल्प के साथ इनके विरूद्ध खड़ी हो गयी तो दो साल से भी कम समय में इनकी सारी अकड़ ढ़ीली पड़ गयी. 

 

नक्सलियों ने कितने घर-परिवार बर्बाद किये हैं, कितने मासूमों का भविष्य उजाड़ दिया है, कितनों को अनाथ किया है, यह गहन शोध का विषय है, लेकिन हर जुल्म का अंत होता ही है. इसलिए सरकार और सुरक्षा बलों की पीठ तो थपथपाई ही जानी चाहिए. यहां सरकार का मतलब सिर्फ केंद्र सरकार ही नहीं है, राज्य सरकारों ने भी केंद्र का संकल्प पूरा करने में सहयोग किया है. 

 

सरकार ने हिंसक वामपंथ को उसी की भाषा में जवाब दिया है. उसने उग्रवादी हिंसा की राह बंदूक और बारूद से रोक दी है. साथ ही विकास और पुनर्वास कार्यक्रमों के जरिए सरकार ने उग्रवादियों की तथाकथित वैचारिक जमीन भी पोपली कर दी है. 

 

हालांकि भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में ही उग्रवाद पर नकेल कसने का वादा किया था, लेकिन उग्रवाद पर निर्णायक चोट शुरु हुई 2024 से. 2004 में एमसीसीआई और पीडब्लूजी के एकीकरण के बाद उग्रवादी ज्यादा जहर उगलने लगे थे और एक से एक लोमहर्षक घटनाओं को अंजाम दे रहे थे. 

 

कांग्रेस के कुछ नेता और स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नक्सलियों के खिलाफ राष्ट्रव्यापी गुस्से के अनुरुप कार्रवाई के पक्ष में थे, लेकिन उसी समय एनएसी (नेशनल एडवाइजरी काउंसिल) और योजना आयोग में उग्रवादियों के हमदर्द भर्ती किये जाने लगे. ऊपर से तथाकथित सिविल सोसाइटी नहीं चाहती थी कि उग्रवादी बेरहमी से कुचले जायें. लेकिन भाजपा इन विकास विरोधी रक्तपिपासुओं के साथ मुरव्वत करने के पक्ष में नहीं थी. 

 

गृह मंत्रालय की कमान संभालने के बाद 2019 से ही अमित शाह बार-बार चेतावनी दे रहे थे कि उग्रवादी हथियार डालकर मुख्य धारा में लौट आयें अन्यथा मारे जायेंगे. उग्रवादी शायद इसे गीदड़ भभकी समझ रहे थे. लेकिन अब परिणाम सामने है. 

 

झारखंड में तो 2015 से ही कील कांटे दुरुस्त करने की योजना पर काम शुरु हो गया था, लेकिन उग्रवादियों के हमदर्द नये-नये विघ्न भी खड़ा करते रहे. फिर भी झारखंड में उग्रवादियों के लिए आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति चलती रही. छत्तीसगढ़ का पूना मारगेम (नया रास्ता) नीति भी विकास और पुनर्वास के लिए ही है. मामूली मामलों में बंद नक्सलियों के मामले झारखंड में भी वापस हो रहे हैं और छत्तीसगढ़ में भी. सरेंडर करने वाले नक्सलियों के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, उनके कौशल विकास की व्यवस्था भी हो रही है. नक्सलियों का एक बड़ा समूह इन योजनाओं से प्रभावित होकर भी मुख्यधारा में लौटा है. 

 

अब गांवों में सड़कें बन रही है, बिजली पहुंच रही है, इंटरनेट की सुविधा देहात में भी पहुंच रही है, स्कूल, अस्पताल खुल रहे हैं और लोगों का जीवन बदल रहा है. यानी नक्सलियों पर दोतरफा दबाव पड़ रहा है. एक तो घर-परिवार समाज का, दूसरा सरकार का. या तो गोली खाओ या सरेंडर कर चैन की जिंदगी जीओ. अब भी जो बचे खुचे उग्रवादी हैं वो हथियार डाल दें या फिर अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहें. सरकार उन्हें छोड़ने वाली नहीं है. 

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