- सबरीमाला मंदिर में कोई भेदभाव नहीं बरता जाता
- सबरीमाला में ईसाइयों या मुसलमानों के प्रवेश पर कोई रोक नहीं है है.
- मंदिरों में धोती के अलावा पैंट-शर्ट पहनकर नहीं जाया जा सकता.
- पुरुष पुजारियों के लिए अनिवार्य है कि वे महिला श्रद्धालुओं के पैर धोयें
New Delhi : सबरीमाला मंदिर मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में आज गुरुवार को तीसरे दिन भी नौ जजों की संवैधानिक पीठ ने सुनवाई की. जानकारी दी गयी है कि सुप्रीम कोर्ट में बहस सात संवैधानिक सवालों पर आधारित है. इसी दायरे में रहकर तर्क देने की बात रही जा रही हैं, लेकिन बहस में दायरे के बाहर के मुद्दे भी शामिल हो रहे हैं. बता दें कि सुनवाई में विभिन्न धर्मों में प्रचलित धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरे पर भी विचार किया जा रहा है.
सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कई ऐसे मंदिर भारत में हैं, जहां पुरुषों को जाने की अनुमति नहीं है. वहां पुरुष पुजारियों के लिए अनिवार्य है कि वे महिला श्रद्धालुओं के पैर धोयें. सॉलिसिटर जनरल ने केरलम में एक ऐसे मंदिर का उदाहरण दिया, जहां, पुरुष महिलाओं की वेशभूषा में जाते हैं.
तुषार मेहता के अनुसार वे ब्यूटी पार्लर जाते हैं. परिवार की महिला सदस्य उन्हें साड़ी पहनाने में सहायता करती हैं. श्री मेहता ने यह बताते हुए तर्क दिया कि यह धार्मिक प्रथा न तो पूरी तरह से पुरुष-केंद्रित है और न ही महिला-केंद्रित. यह विशेष उदाहरण(सबरीमाला) संयोगवश महिला-केंद्रित है.
इस क्रम में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन्होंने अपनी दलील सिर्फ अनुच्छेद 25 और 26 के मुद्दे तक सीमित रखी है. तुषार मेहता ने अपनी दलीलों को समाप्त करते हुए कहा कि सबरीमाला पर दिया गया पूर्व का फैसला इस धारणा पर आधारित था कि पुरुषों को श्रेष्ठ और महिलाओं को निम्न माना जाता है.
सॉलिसिटर जनरल ने इस धारणा को गलत करार दिया. सॉलिसिटर जनरल के बाद एएसजी केएम नटराज ने केंद्र की ओर से दलीलें रखीं. एएसजी नटराज ने कहा, दक्षिण भारतीय मंदिरों में प्रसाद के रूप में शराब भी दी जाती है. कल को आप इस पर यह आपत्ति नहीं उठा सकते कि शराब न दी जाये.
एएसजी नटराज ने उदाहरण दिया, कई मंदिरों में शाकाहारी भोजन परोसा जाता है अगर कोई व्यक्ति वहां कहे कि वह मांसाहारी भोजन करना चाहता है. वह यह नहीं कह सकता कि मेरा यह अधिकार है मुझे यही परोसा जाना चाहिए. उसे उन श्रद्धालुओं के अधिकारों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है.
एएसजी के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता वैद्यनाथन ने सबरीमाला की परंपरा के बारे में जानकारी दी. बताया सबरीमाला मंदिर में इस तरह का कोई भेदभाव नहीं बरता जाता कि वहां ईसाइयों या मुसलमानों के प्रवेश पर कोई रोक है.
शर्त सिर्फ यही है कि उन्हें अयप्पा की दिव्यता और शक्ति में पूर्ण आस्था और विश्वास होना चाहिए.वैद्यनाथन ने कहा कि सबरीमाला मंदिर जाने वालों को 40 दिनों का व्रतम (व्रत) रखना होता है. भक्तों को निर्धारित सभी धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करना होगा. किसी को भी वहां जाने से प्रतिबंधित नहीं किया जाता है,
वैद्यनाथन की दलील पर जस्टिस सुंदरेश ने भी परंपराओं से संबंधित कुछ बातें जोड़ी. कहा कि केरलम के कुछ मंदिरों में कोई भी धोती के अलावा पैंट-शर्ट पहनकर नहीं जा सकता. और आप यह जिद नहीं कर सकते कि आप शर्ट पहनकर ही मंदिर में जायेंगेय सीजेआई सूर्यकांत ने भी इस पर टिप्पणी की. कहा कि, गुरुवायुर मंदिर में कोई शर्ट पहनकर प्रवेश नहीं पा सकता.
सीजेआई ने कहा, उत्तर भारत में किसी गुरुद्वारे या स्वर्ण मंदिर जाते हैं, तो आपको अपना सिर ढकना पड़ता है. लाखों हिंदू गुरुद्वारे जाते हैं. वे भी अपना सिर ढकते हैं.इस क्रम में जस्टिस बागची ने कहा कि दिये जा रहे सभी उदाहरण आर्टिकल 26(b) की बात को सामने रखते हैं.
यह प्रधानता धार्मिक मामलों के प्रबंधन से जुड़े अधिकारों को लेकर है, जो रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों के जरिए प्रदर्शित होते हैं. यह प्रधानता उस कोर इंटरनल बिलीफ से ऊपर है, जिसे अंतरात्मा की स्वतंत्रता और उससे जुड़े अधिकारों के रूप में परिभाषित किया गया है.
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