
बैजनाथ मिश्र
देश में मुगलिया सल्तनत के अंतिम बादशाह थे बहादुर शाह जफर. लेकिन उनका रसूख खत्म हो चुका था. चूंकि उनके गद्दीनसीन रहते अंग्रेजों का शासन कायम हो गया था, इसलिए उनकी न चलती थी, ना ही अपने बचे खुचे दरबारियों से बनती-पटती थी. उस समय एक मुहावरा चलता था- “साहब-ए-आलम, दिल्ली से पालम.” यानी उनकी सल्तनत दिल्ली से पालम तक सिमट गई थी. कुछ ऐसी ही स्थिति नेहरू-इंदिरा खानदान के चश्मोचिराग राहुल गांधी की हो गई है.
आज कांग्रेस में वही हैं जो मजबूर हैं या बेगैरत हैं. वहां दानिशमंदों की कोई पूछ नहीं है. एक तो कांग्रेस की हुकूमत महज चार राज्यों तक रह गई है और केंद्र में सरकार बनने की संभावना लगभग क्षीण हो गई है. तभी तो कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में राहुल को शिकायती लहजे में कहना पड़ा कि नरेंद्र मोदी को विश्वास है कि भाजपा के बाद कांग्रेस ही सत्ता में आएगी, लेकिन आप लोगों को यकीन नहीं हो रहा है.
"बहादुर शाह भी क्रांतिधर्मी होने का स्वांग रचते थे और शेरो शायरी सुनाते रहते थे, कुछ उसी प्रकार की क्रांतिधर्मिता किसी न किसी जुमले में लपेटकर राहुल भी परोसते रहते हैं. उन्होंने क्रांति की नयी मशाल वोट चोरी को लेकर जलायी है. उन्हें उम्मीद है कि इसकी ज्वाला में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तो भस्म होंगे ही, मोदी-शाह भी निपट जाएंगे."
वह नीट आंदोलन के कारण धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से उत्साहित हैं. लेकिन वह यह तथ्य भूल गये हैं कि वह आंदोलन किसी पार्टी या तिलचट्टा गिरोह का ही नहीं था. चौबीस लाख छात्रों ने नीट की परीक्षा दी थी. पेपर लीक होने और दोबारा परीक्षा होने से इतने परिवार और उनके नातेदार प्रभावित थे. उसी समय कुछ अन्य परीक्षाओं में भी गड़बड़ी का मामला सतह पर आ गया था. इसलिए देश में कोलाहल का माहौल बन गया था. लाखों-करोड़ों लोग सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से उस आंदोलन से जुड़ रहे थे. लेकिन वोट चोरी के आंदोलन में क्या वे मतदाता जुड़ रहे हैं, जिनके नाम कथित रुप से कट गये हैं. जिनके नाम कट गये हैं, यदि वे बेचैन नहीं हैं तो राजनीतिक दलों और विघ्नसंतोषी आंदोलनजीवी गिरोहों के धरना प्रदर्शन से वह माहौल नहीं बनने वाला है जो नीट आंदोलन के समय बना था.
खैर, कांग्रेस आलाकमान का रसूख भी अब पहले जैसा नहीं रहा. अब आलाकमान जैसा रुतबा राहुल गांधी का बचा ही नहीं है. उदाहरण के लिए पंजाब में परगट सिंह को प्रदेश अध्यक्ष की गद्दी सौंपने के फैसले को ही देख लीजिए. वहां कांग्रेस अध्यक्ष थे अमरिंदर राजा वडिंग. उन्हें राहुल एंड कंपनी ने ही बनाया था. लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी उन्हें फूटी आंख भी देखना नहीं चाहते थे. यहां तक कि जब पूर्व प्रदेश प्रभारी भूपेश बघेल ने चन्नी से मुलाकात की कोशिश की तो उन्होंने मिलने से इंकार कर दिया. जब बघेल से पूछा गया कि क्या वडिंग हटाये जायेंगे, तो उन्होंने कहा कि यह गुड्डे-गुड्डियों का खेल नहीं है फैसला आलाकमान का है. लेकिन हुआ क्या? बघेल ही हटा दिये गए. नये प्रभारी बनकर पहुंचे सचिन पायलट. उन्होंने चन्नी, सुखजिंदर सिंह रंघावा, विजय इंदर सिंह सिंगला से मिले और वडिंग हटा दिये गये. परगट सिंह ओलांपियन हैं. हॉकी के लिजेंड हैं और अकाली दल से आये हैं.
पंजाब में अगले साल की शुरुआत में चुनाव है. वहां आम आदमी पार्टी की सरकार है. उसके खिलाफ माहौल बन रहा है. कांग्रेस के लिए मौका है. और किसी पार्टी के पास दम नहीं है. अकाली पस्त हैं और भाजपा अपनी स्थिति ठीक करने में व्यस्त है. लेकिन कांग्रेस में गुटबाजी चरम पर है. इसके लिए जिम्मेदार है कांग्रेस का आलाकमान.
पिछले विधानसभा चुनाव से पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह को बेइज्जत करके हटा दिया गया था. यह हुआ था प्रभारी हरीश रावत और अंबिका सोनी की सिफारिश और नवजोत सिंह सिद्धू की जिद के कारण. उस समय सिद्धू मोदी को गाली देते थे और ताली ठोंकवाते थे. राहुल को यही पसंद है. इसलिए उन्होंने सिद्धू की बात मान ली. फिर खेल शुरु हुआ और सिद्धू टापते रह गये. उन्हें प्रदेश अध्यक्ष से संतोष करना पड़ा और चरनजीत सिंह चन्नी मुख्यमंत्री बन गये. कांग्रेस ने देश भर में ढ़िंढ़ोरा पीटना शुरु किया. उसने एक दलित को सीएम बनाया है. पंजाब में तीस फीसदी से ज्यादा दलित है, इसलिए फतह पक्की है. हुआ क्या, चन्नी दो सीटों से लड़ें और दोनों हार गये. कांग्रेस की दुर्गति हो गई. केजरीवाल की पार्टी दो तिहाई से अधिक सीटें जीत कर सत्ता पर काबिज हो गई.
फिलहाल अभी चन्नी सांसद हैं और सिद्धू कपिल शर्मा के शो में जुमले गढ़ते, ठहाके लगाते समय काट रहे हैं. इससे भी गंदा खेल राजस्थान में हुआ था और वह भी कांग्रेस आलाकमान के कारण. 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले सचिन पायलट कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे. उन्होंने अथक परिश्रम किया. भाजपा सरकार की नीतियों के खिलाफ जनाक्रोश पैदा किया. लेकिन जब चुनाव नतीजे आये और भाजपा हार गई तब राष्ट्रीय राजनीति में मगन सोनिया गांधी के तत्कालीन सलाहकार अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बना दिया गया.
सचिन ने एतराज किया तो उन्हें डिप्टी बना दिया गया, इस भरोसे के साथ कि ढाईं साल बाद सीएम की कुर्सी मिल जाएगी. जब समय आया तो गहलोत अड़ गये. आलाकमान के हाथ-पांव फूल गये. सचिन ने बगावत की ठानी. कुछ समर्थक विधायक हरियाणा के होटल में भेज दिये गये. आरोप भाजपा पर लगाया गया कि वह सरकार गिराने में लगी है. लेकिन देशद्रोह का मुकदमा हुआ पायलट के खिलाफ.
मामला सुलझाने के लिए मल्लिकार्जुन खरगे (तब राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं थे) और अजय माकन बतौर पर्यवेक्षक जयपुर भेजे गये. विधायकों की बैठक बुलाई गई, पर कोई आया ही नहीं. गहलोत खुद अन्तर्धान हो गये. दबाव बढ़ा तो उन्होंने अपने विधायकों के इस्तीफे की चिट्ठी स्पीकर को भेजवा दी. पर्यवेक्षक खाली हाथ लौट आये. उन्होंने रिपोर्ट दे दी. हुआ कुछ नहीं.
सोनिया गांधी ने गहलोत को दिल्ली बुलाया. उनसे कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के लिए कहा गया. उन्होंने ना कर दिया और मुख्यमंत्री बने रहने पर अड़ गये. कांग्रेस आलाकमान कुछ नहीं कर पाया. क्या इतना लाचार, बेबस कांग्रेस आलाकमान पहले किसी ने देखा था?
इसी प्रकार मध्य प्रदेश में कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के संयुक्त प्रयास से कांग्रेस भाजपा को मामूली अंतर से हराने में सफल हो गई. आलाकमान ने सिंधिया को सीएम बनाने का आश्वासन दिया था. लेकिन कमलनाथ अड़ गये. वह मुख्यमंत्री बन गये और सिंधिया की उपेक्षा करने लगे. जब आलाकमान से शिकायत के बावजूद कोई सुनवाई नहीं हुई तो सिंधिया ने दो दर्जन विधायकों से बगावत करा दी. उनसे इस्तीफा दिलवा दिया. डेढ़ साल में ही कमलनाथ की सरकार गिर गई और भाजपा ने शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बना दिया.
आलाकमान ने छत्तीसगढ़ में भी टीएस सिंह देव को गच्चा दिया. भाजपा की रमन सिंह सरकार के खिलाफ भारी इन्कंवेंसी को भुनाने के लिए टीएस सिंह देव और भूपेश बघेल दोनों को आश्वासन दिया गया. कांग्रेस एकजुट होकर लड़ी और भाजपा बुरी तरह हार गई. बघेल मुख्यमंत्री बने और सिंह देव को ढ़ाई साल बाद मौका देने को कहा गया. इस बीच बघेल आलाकमान के एटीएम बन गये. टीएस सिंह देव इस कला में पारंगत नहीं थे. शायद इसीलिए उनकी सुनी नहीं गई. 2023 में जब चुनाव हुए तो दोनों हार गये. बघेल भ्रष्टाचार के कुछ मामलों में पुत्र सहित जमानत पर हैं और कांग्रेस आलाकमान को विजय का मंत्र सिखाने के लिए फिलहाल असम के प्रभारी बनाये गये हैं.
कर्नाटक में सिद्धारमैया को डीके शिव कुमार की जिद के कारण हटाना पड़ा है. आलाकमान को यहां झुकना पड़ा है. लेकिन टीएस सिंह देव को कोई पूछने वाला नहीं है. इस आलाकमान ने अभी उत्तर प्रदेश में अजय राय को धकियाकर आराधना मिश्र को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है. यदि प्रभाव और क्षमता की बात की जाये तो आराधना अजय के सामने कहीं नहीं ठहरती हैं. ये वही अजय राय हैं, जिन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में वाराणसी में नरेंद्र मोदी को नाकों चना चबवा दिया था. वह एक जुझारू, मेहनती और आक्रामक नेता हैं. आराधना की कुल जमा योग्यता यह है कि वह कांग्रेस के बड़े नेता प्रमोद तिवारी की बेटी हैं और प्रतापगढ़ की रामपुर खास सीट से विधायक हैं. उनके पिता भी इसी सीट से जीतते रहे हैं. इस समय वह राज्यसभा में हैं. लेकिन प्रतापगढ़ की किसी दूसरी सीट से कांग्रेस को जिता पाने की हैसियत बाप-बेटी किसी में नहीं है.
एक फर्क यह भी है कि अजय राय भाजपा से कांग्रेस में आये हैं. उनके भाई की हत्या मुख्तार अंतारी ने की-करायी थी और वह सपा को बखूबी जवाब देते थे. वह राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए जान की बाजी लगाने की घोषणा करते रहते थे.
आराधना के साथ सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है. इनकी दो विशेषताएं हैं. ये मोदी को बोटी-बोटी काटने की घोषणा कर चुके हैं. वह सपा से आए हैं और सपा पर ही हमेशा हमलावर रहते हैं. ये कांग्रेस के मुस्लिम आइकॉन हैं. प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम दलित हैं और वह हिंदुओं को बौद्ध बनाने में लगे हैं. आलाकमान शायद कांग्रेस के पुराने समीकरण ब्राह्मण-दलित-मुस्लिम पर काम कर रहा है.
संभव है नरम दल और गरम दल दोनों को साथ लेकर चलने की योजना भी बनाई गई हो. आराधना नरम हैं और सपा से उनके रिश्ते ठीक हैं. इमरान गरम हैं और सपा को लानत भेजते रहते हैं. सपा कह रही है कांग्रेस औकात में रहे और कांग्रेस कह रही है कि साथ लड़ना हो तो डेढ़ सौ सीटें दो. क्या होगा पता नहीं, लेकिन आलाकमान अकेले लड़ने की योजना पर भी काम कर रहा है.
फिलहाल, आलाकमान की पालकी न ढ़ोने वालों को गद्दार की उपाधि से नवाजने का दस्तूर चल पड़ा है. ज्योतिरादित्य से लेकर जितिन प्रसाद, आरपीएन सिंह और रवनीत बिट्टू तक. उत्तर प्रदेश में सपा से समझौता नहीं हुआ तो आराधना और इमरान तक की कलई उतर जाएगी. तब कुछ और गद्दारों की शिनाख्त होगी. लेकिन आलाकमान यह मानेगा नहीं कि “जब बुरे दिन आते हैं तो साथ न देता कोई, मौत से समय आंख खुद उलट जाती है."