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झारखंड में बिहार के चालान पर बालू का खेल, सरकार को राजस्व का नुकसान, विभाग की व्यवस्था पर सवाल

Ranchi : राज्य के कई सीमावर्ती इलाकों में बालू स्टॉक यार्ड संचालित करने वाले कारोबारी बिहार के चालान के आधार पर झारखंड का चालान जेनरेट कर बालू के अवैध कारोबार को वैध कर रहे हैं. बताया जाता है कि स्टॉक यार्ड संचालक बिहार के चालान को इनपुट के रूप में इस्तेमाल करते हैं. इसके बाद झारखंड के पोर्टल से नया चालान जेनरेट कराया जाता है. इसके लिए मात्र 1 रुपया टन शुल्क सरकार को देना होता है. इस प्रक्रिया में बिहार से वास्तव में कितनी बालू आई, इसकी जांच नहीं होती है. साथ ही, बालू लाने वाले वाहनों की जीपीएस आधारित जानकारी भी दर्ज नहीं की जाती है.
 
बालू लदे वाहन
  • स्टॉक यार्ड संचालकों पर नियमों के दुरुपयोग का आरोप
  • चालान की मंजूरी से लेकर परिवहन तक की प्रक्रिया पर सवाल

Ranchi :   झारखंड में बालू और अन्य लघु खनिजों के परिवहन से जुड़े नियमों और ऑनलाइन चालान व्यवस्था की खामियों का फायदा बालू स्टॉक यार्ड के संचालक उठा रहे हैं.  दूसरे राज्यों से बालू, गिट्टी, पत्थर, मोरम और स्टोन डस्ट जैसे खनिजों के परिवहन के लिए इंटर स्टेट ट्रांजिट पास शुल्क  है लेकिन झाऱखंड में यह व्यवस्था नहीं है.  इससे राज्य सरकार को भारी राजस्व नुकसान हो रहा है.

 

बिहार के चालान से जेनरेट हो रहा झारखंड का नया चालान

राज्य के कई सीमावर्ती इलाकों में बालू स्टॉक यार्ड संचालित करने वाले कारोबारी बिहार के चालान के आधार पर झारखंड का चालान जेनरेट कर बालू के अवैध कारोबार को वैध कर रहे हैं. बताया जाता है कि स्टॉक यार्ड संचालक बिहार के चालान को इनपुट के रूप में इस्तेमाल करते हैं.

 

इसके बाद झारखंड के पोर्टल से नया चालान जेनरेट कराया जाता है. इसके लिए मात्र 1 रुपया टन शुल्क सरकार को देना होता है. इस प्रक्रिया में बिहार से वास्तव में कितनी बालू आई, इसकी जांच नहीं होती है. साथ ही, बालू लाने वाले वाहनों की जीपीएस आधारित जानकारी भी दर्ज नहीं की जाती है.


जेनरेट किए गए चालान पर डीएमओ की मंजूरी

बताया जाता है कि स्टॉक यार्ड संचालकों की ओर से जेनरेट किए गए चालान को जिला खनन पदाधिकारी (डीएमओ) के स्तर पर मंजूरी दी जाती है. इसके बाद झारखंड का चालान तैयार हो जाता है. सरकारी निर्माण कार्यों में बिहार के चालान को स्वीकार नहीं किए जाने की स्थिति में झारखंड के चालान का इस्तेमाल किया जाता है.

 

ऐसे में चालान की मंजूरी से लेकर बालू की बिक्री तक की प्रक्रिया बहुत ही रहस्मय है. मिली सूचना के मुताबिक, गढवा, चतरा, हजारीबाग, धनबाद, रांची, पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम में इस तरह का खेल जोर-शोर से चल रहा है.

 

पोर्टल की खामी से दूरी और ट्रिप पर सवाल

जिस पोर्टल की तकनीकी कमियों का लाभ स्टॉक यार्ड संचालक उठा रहे हैं, उससे जेनरेट होने वाले चालान में मैप लिंक नहीं होता. डीएमओ स्तर पर दूरी की मंजूरी मैन्युअल तरीके दर्ज की जाती है. 100 किलोमीटर की वास्तविक दूरी के स्थान पर 200 से 400 किलोमीटर तक दर्ज कर दिया जाता है.

 

इससे एक ही चालान के आधार पर कई ट्रिप बालू की अवैध बिक्री की जाती है. मिली जानकारी के अनुसार, धनबाद के चालान पर सोनाहातू क्षेत्र से बालू लोड कर जमशेदपुर तक भेजी जा रही है. इस तरह के मामलों में खनिज के वास्तविक स्रोत, परिवहन मार्ग और चालान की वैधता आपने-आप में ही संदेह वाला है.

 

जांच हुई तो बड़ा घोटाला आयेगा सामाने

बालू स्टॉक यार्ड के इनपुट चालान और स्टॉक की अगर जांच की गयी तो बडा घोटला सामाने आ सकता है. आरोप है कि राज्य में इस तरह की गतिविधियां वर्ष 2016 से जारी है, लेकिन अब तक व्यापक जांच नहीं हुई है. 

 

मामले की तह तक पहुंचने के लिए स्टॉक यार्डों में उपलब्ध बालू के भंडार, वास्तविक आवक, बिक्री के रिकॉर्ड, जारी किए गए चालानों की संख्या, परिवहन दूरी और वाहनों में लोड खनिज की मात्रा का मिलान जरूरी है. इसके साथ ही बिहार से जारी मूल चालानों और झारखंड के पोर्टल पर जेनरेट किए गए चालानों का तुलनात्मक सत्यापन भी किया जाना चाहिए. 

 

खनन विभाग और संबंधित अधिकारियों की निष्पक्ष जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि चालान जारी करने की प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन हुआ है या नहीं और यदि अनियमितताएं हुई हैं, तो राज्य सरकार को कितने राजस्व का नुकसान पहुंचा है. 

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