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सारंडा: खदानों के कचरे से कोयना नदी का अस्तित्व खतरे में, किनारे की कृषि भूमि भी हुई बंजर

Kiriburu : सारंडा के जामकुंडिया, राजाबेडा़, छोटा जामकुंडिया गांव के ग्रामीणों ने जामकुंडिया गांव में सारंडा पीढ़ के मानकी लागुडा़ देवगम की अध्यक्षता में बैठक की. बैठक में सेल की गुवा, चिड़िया समेत अन्य प्राईवेट खदानों प्रबंधनों के खिलाफ आंदोलन का निर्णय लिया गया. ग्रामीणों का आरोप है कि खदानों से बहकर आने वाली मिट्टी-मुरुम और फाइन्स ने उनकी दर्जनों एकड़ रैयत कृषि भूमि को बंजर बना दिया है, जिसपर वर्षों से कोई फसल नहीं हो पा रही है. बंजर खेत की मालगुजारी वह सरकार को दे रहे हैं. कोयना नदी और अन्य जल स्रोतों का अस्तित्व खतरे में है. ग्रामीण सबसे ज्यादा प्रभावित गुवा और चिड़िया खदान से हैं लेकिन माइंस प्रबंधन इन्हें रोजगार व मुआवजा तक नहीं दे रहा है. इसके अलावे डीएमएफटी फंड या सीएसआर से गांव का विकास भी नहीं किया जा रहा है. [caption id="attachment_146272" align="aligncenter" width="300"]https://lagatar.in/wp-content/uploads/2021/08/saranda-gramin-300x135.jpg"

alt="" width="300" height="135" /> अपनी बंजर कृषि भूमि और कोयना नदी में भरे लौह पत्थर व फाईन्स को दिखाते जामकुंडिया व अन्य गांवों के ग्रामीण.[/caption]

बंजर जमीन की मालगुजारी दे रहे ग्रामीण, पर खदान प्रबंधन मुआवजा तक नहीं देता

मानकी लागुडा़ देवगम ने कहा कि गुवा खदान से बहकर आने वाली लौह पत्थर से कोयना नदी किनारे की जामकुंडिया की लगभग ग्यारह एकड़ तथा छोटा जामकुंडिया की लगभग आठ एकड़ कृषि भूमि पूरी तरह से बंजर हो चुकी है. कोयना नदी व अन्य जलस्रोत की गहराई भर चुकी है, जिससे उसका अस्तित्व खतरे में पड़ गया है एवं गुवा प्रबंधन कहता है कि वह गांव हमारे सीएसआर क्षेत्र में नहीं आता है. बंजर जमीन का मुआवजा आजतक प्रबंधन ने नहीं दिया, जबकि हम उक्त जमीन की मालगुजारी सरकार को प्रतिवर्ष देते हैं. खदान प्रबंधन इस नुकसान की भरपाई के लिए ग्रामीण बेरोजगारों को रोजगार भी नहीं देती तथा गांव का विकास भी नहीं करती. इस मामले को लेकर पिछले वर्ष आंदोलन किया गया था और सारंडा के तत्कालीन डीएफओ से भी शिकायत की गई थी. जिसके बाद गुआ और मनोहरपुर के रेंजर को भेजकर इसकी जांच कराई गई थी. जांच में वन विभाग ने घटना को सही पाकर उचित कार्यवाही करते हुए पीड़ित किसानों को मुआवजा दिलाने की बात कही थी, लेकिन आज तक सेल प्रबंधन व वन विभाग के तरफ से हम रैयत जमीन मालिकों को किसी प्रकार का न्याय व मुआवजा नहीं दिया गया. उन्होंने कहा कि कोयना नदी पहले बीस फीट गहरा था जो आज विभिन्न खादानों से आई लौह पत्थर से भर चुका है तथा वर्षांत में इस नदी का पानी रास्ता बदल हमारे खेतों की मिट्टी को काटते तथा उसमें पत्थर भरते हुए बहता है.

सेल प्रबंधन व सरकार बताये, हम ग्रामीण पत्थर खायें या अनाज

जामकुंडिया गांव के मुंडा कुशु देवगम ने कहा कि सेल प्रबंधन व सरकार बताये की हम ग्रामीण पत्थर खायें या अनाज. जब कृषि भूमि को पत्थरों से भर बंजर बना दिया जायेगा तो हम जीयेंगे कैसे. खेतों के अलावे नदी-नालों का अस्तित्व भी मिटाया जा रहा है. मछलियां मर रही हैं, दूषित पानी से ग्रामीण बीमार हो रहे हैं. प्रबंधन खदानों की मिट्टी-मुरुम को नदी-नालों व हमारे खेतों में जाने से रोकने की कोई व्यवस्था तक नहीं कर पाई है. अनेकों बार प्रबंधन को पत्र दिया गया लेकिन अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई. हमारी समस्या का समाधान नहीं हुआ तो आरपार की लडा़ई लडी़ जायेगी. [wpse_comments_template]

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