
Shivanand Tivary
नीतीश कुमार की राजनीति की संपूर्ण यात्रा को दो खंड में देखा जा सकता है. पहला खंड वह है जब वे सत्ता के बाहर थे. विधानसभा सदस्य वे 1985 में बने. उसके बाद तो उनकी राजनीति सरपट दौड़ी. 1989 में बाढ़ संसदीय क्षेत्र से सांसद बने. 1990 में वीपी सिंह की सरकार में कृषि और सहकारिता राज्यमंत्री बने. वह सरकार सिर्फ पंद्रह महीने ही चल पाई. 1991 में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में नीतीश जी पुनः बाढ़ से सांसद बने.
इस बीच 1990 में लालू यादव मुख्यमंत्री बन चुके थे. मंडल आयोग की अनुशंसाओं को लागू किए जाने के समर्थन में उनके अभियान और आडवाणी जी की गिरफ्तारी से उनकी लोकप्रियता आसमान छू रही थी. हालांकि उस अभियान में लालू यादव के साथ नीतीश कुमार सहित हम सब लोग सक्रिय थे.
1991 की लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद की एक चर्चित घटना है. चर्चित इस अर्थ में कि कई लोगों ने उस घटना के बारे में अपने-अपने तरीके से लिखा है. संकर्षण ठाकुर की किताब में शायद वह घटना सबसे पहले आई थी. मैंने उसको पढ़ा नहीं है. लेकिन वह घटना लालू और नीतीश दोनों के मिजाज और चरित्र को जरूर दर्शाती है.
91 के मध्यावधि चुनाव में वृष्ण पटेल भी सिवान संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीतकर लोकसभा आए थे. बिहार भवन में उनको कमरा मिला था. दिल्ली में उन दिनों मेरा मुकाम नीतीश का ही घर हुआ करता था. जिस दिन की यह घटना है, उस दिन हम लोग यानी नीतीश कुमार, ललन सिंह, वृष्ण पटेल और मैं, पटेल साहब के कमरे में टेलीविजन पर कोई फिल्म देख रहे थे.
फिल्म समाप्त होने के बाद जब हम बाहर निकले, तो पता चला कि लालू जी भी दिल्ली आ गए हैं और नीचे मुख्यमंत्री कक्ष में हैं. नीतिश कुमार ने ही कहा कि चलिए, मुख्यमंत्री जी से मिल लिया जाए. लेकिन ललन पता नहीं क्यों जाने को इच्छुक नहीं थे.
नीतीश ने कहा कि 'अरे चलिए. ऐसा क्या है.' लेकिन तब भी ललन जाने में संकोच कर रहे थे. तब मैंने ललन सिंह से कहा कि जब नेता कह रहा है तो चलो, क्या हर्ज है. मैंने नीतीश के लिए नेता शब्द का इस्तेमाल किया है. हम लोग नीतीश को ही अपनी जमात का नेता मानते थे. यह जयप्रकाश आंदोलन और लोहिया विचार मंच के जमाने से ही था.
हम लोग मुख्यमंत्री कक्ष के ड्राइंग रूम में पहुंचे. वहां देखा कि तीन लोगों के बैठने वाले लंबे सोफे पर बीच में लालू यादव बैठे हुए हैं. सामने एक लंबा टेबल था, जिस पर एक खुली हुई फाइल रखी थी. फाइल में सिर्फ एक पन्ना नजर आ रहा था. लालू यादव के हाथ में खुली हुई कलम थी. नजर फाइल पर. लालू ने हम लोगों पर नजर भी नहीं उठाई.
हम लोग अंदर गए और जिसे जहां जगह मिली, वहां बैठ गए या खड़े हो गए. एक दूसरा लंबा सोफा था. नीतीश और पटेल साहब उस पर बैठ गए. सामने एक गोदरेज की टेबल थी, जिस पर टेक लगाकर ललन खड़े हो गए. मैं लालू यादव के बगल में रखी कुर्सी पर बैठ गया.
लालू यादव ने बगैर कुछ कहे, अपनी कलम बंद की, फाइल को एक तरफ रखा और सीधे ललन की ओर देखा और उंगली के इशारे से उसको कमरे से बाहर का रास्ता दिखाया. सब लोग हतप्रभ हो गए. ललन भी पहले उस इशारे को नहीं समझ पाए. तब लालू ने दोबारा उनको बाहर जाने का इशारा किया. ललन चुपचाप सिर झुकाकर वहां से बाहर निकल गए.
मैंने नीतीश कुमार और पटेल साहब के चेहरे की ओर नजर उठाई. ललन के साथ इस व्यवहार को देखकर दोनों का चेहरा उतर गया था. ललन अपनी मर्जी से लालू के यहां नहीं गया था. एक तरह से नीतीश ही दबाव देकर उनको वहां ले गए थे.
इसके बाद लालू यादव ने सरयू राय का नाम लेकर गाली गलौज करना शुरू कर दिया. लालू सरयू राय को क्यों गलिया रहे हैं, हम लोग इससे बिल्कुल अनभिज्ञ थे. बाद में पता चला कि राय जी ने पटना के नवभारत टाईम्स में एक लेख लिखा था. उन्होंने लालू सरकार पर आरोप लगाया था कि बिहार के हित के विरुद्ध इसने सोन नहर के पानी को भारत सरकार के तत्कालीन बिजली मंत्री कल्पनाथ राय के क्षेत्र में दे दिया है. विधानसभा का सत्र चल रहा था. विपक्ष ने उस खबर पर विधानसभा में शोर शराबा मचाया था. सरयू राय, नीतीश कुमार के मित्र हैं.
इसी पृष्ठभूमि में लालू यादव अत्यंत आक्रोश में थे और सरयू राय के खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग कर रहे थे. उन्होंने यह भी कहा कि वे किसी की कृपा से राजनीति नहीं कर रहे हैं. मैं जानता हूं कि यह सब कौन करा रहा है. उनका इशारा नीतीश कुमार की ओर था.
यह सब सुनकर मेरे धैर्य का बांध टूट गया. मैंने खड़े होकर कहा कि आपको यह गलतफहमी हो गई है कि बाकी लोग आपकी कृपा से राजनीति कर रहे हैं. मैंने उन्हें उनके पुराने दिनों की याद दिलाई और कहा कि मेरे जीप पर पीछे लटकने के लिए बेचैन रहते थे. वह दिन भूल गये! मैंने नीतीश को कहा उठो, इस आदमी के साथ बैठना अपना अपमान करवाना है. गुस्से से मेरी आवाज़ कांप रही थी.
नीतीश और पटेल साहब उठकर खड़े हो गए. लालू मुझे अपने स्कूल के दिनों से जानते थे. मेरी इस प्रतिक्रिया से स्थिति अचानक बदल गई. लालू यादव तुरंत उठे, मुझे पकड़कर शांत करने लगे और बाहर आवाज लगाई- “अरे कहां मर गया सब. जल्दी बाबा के लिए चाय ले आओ. दूसरी ओर नीतीश को कहा, बैठिए नीतीश जी, बाबा चाय पी कर जायेंगे. नीतीश ठस से बैठ गए. चाय आई. अब चाय गले के नीचे उतर रही है! किसी तरह चाय गले से नीचे उतार कर हम लोग वहां से बाहर निकले. बिहार भवन के बिलकुल नजदीक ही नीतीश कुमार का सरकारी आवास था. वातावरण गंभीर था. घर पहुंचते ही नीतीश कुमार ने अपने स्टाफ को आदेश दिया कि किसी का फोन नहीं देना है. किसी से मिलना नहीं है. पटना सरयू राय को फोन लगाइए. राय जी को फोन गया कि शाम जहाज से दिल्ली पहुंचिए.
शाम तक राय जी दिल्ली हाजिर हो गए. पूरी घटना पर चर्चा हुई. तय हुआ कि बिहार भवन में जो कुछ भी हुआ, उसके विरोध में लालू यादव को कड़ी चिट्ठी लिखी जाए. राय जी चिट्ठी का मजमून तैयार करें. दो ढाई पेज का मजमून राय जी ने तैयार किया. नीतीश कुमार ने राय जी को सुझाया कि इसको थोड़ा छोटा कर दें. राय जी ने फिर लिखने में हाथ लगाया. इधर नीतीश ने कहा कि वे शरद जी से मिल आते हैं. मैंने कहा कि शरद जी से मिलने जाओगे, तब तो चिट्ठी नहीं जाएगी. नीतीश जी ने झुंझला कर जवाब दिया कि शरद जी नेता हैं. उनसे क्यों नहीं मिलें. मैंने जवाब दिया कि जरूर मिलो. मैं तो सिर्फ उस मुलाकात के नतीजे की बात कर रहा हूं.
नीतीश शरद जी से मिल कर आये. इस बीच राय जी ने ढाई पेज को डेढ़ पेज में संक्षिप्त कर दिया था. नीतीश जी ने कहा कि इसको और छोटा कर दीजिए. इसको पटना पहुंचने के बाद लालू जी को भेजा जाएगा. अंततोगत्वा समझा जाए कि उस चिट्ठी का कोई औचित्य नहीं रहा. लेकिन वह मूल चिठ्ठी छपी हुई है, श्रीकांत की किताब 'चिठ्ठियों की राजनीति' में. यह प्रसंग यही समाप्त करता हूं.
लेखकः राजद के उपाध्यक्ष व पूर्व राज्यसभा सदस्य हैं.
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