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SC से प्रोफेसर अली खान को अंतरिम जमानत, पर जांच जारी रहेगी, SIT गठित करने का निर्देश

अभिव्यक्ति की आजादी, पर भाषा सरल और सम्मानजनक हों New Delhi :  अशोका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद को सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम जमानत मिल गयी है. हालांकि अदालत ने जांच पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है. प्रोफेसर की ओर से गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने यह फैसला सुनाया है. कोर्ट ने प्रोफेसर अली खान को सीजेएम सोनीपत की संतुष्टि के लिए जमानत बांड प्रस्तुत करने की शर्त पर अंतरिम जमानत दी है. इसके अलावा, कोर्ट ने प्रोफेसर को यह निर्देश दिया कि हाल ही में हुए भारत-पाकिस्तान संघर्ष पर कोई और ऑनलाइन पोस्ट या लेख नहीं लिखेंगे और ना ही प्रकाशित करेंगे. इसे भी पढ़ें : पूर्व">https://lagatar.in/former-ias-probationer-pooja-khedkar-gets-anticipatory-bail-from-sc-asked-did-she-commit-murder/">पूर्व

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https://twitter.com/PTI_News/status/1925080305645273351

एसआईटी में होगी एक महिला अधिकारी सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को भी नोटिस जारी किया है. जारी नोटिस में डीजीपी को तीन आईपीएस अधिकारियों की एक एसआईटी टीम बनाने का आदेश दिया गया है, जो हरियाणा या दिल्ली से बाहर के हों. टीम का नेतृत्व एक पुलिस महानिरीक्षक करेंगे और टीम में एक महिला अधिकारी को भी शामिल किया जाएगा. कोर्ट ने इस एसआईटी के गठन के लिए 24 घंटे का समय दिया है. इसे भी पढ़ें : दुर्गा">https://lagatar.in/cm-hemant-remembered-durga-soren-on-his-death-anniversary-paid-tribute/">दुर्गा

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महिला अधिकारियों के अपमान वाले बयान का कोई ठोस प्रमाण नहीं सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफेसर के खिलाफ महिला अधिकारियों के अपमान का आरोप लगाये जाने पर सवाल उठाए. न्यायमूर्ति कांत ने कहा कि आप हमें वह बयान दिखाइए, जिसमें उन्होंने महिला अधिकारियों का अपमान किया हो. कोर्ट ने यह भी पूछा कि एफआईआर में जो आरोप लगाए गए हैं, उनमें यह स्पष्ट नहीं है कि प्रोफेसर ने महिला अधिकारियों का अपमान कैसे किया. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफेसर अली खान के शब्दों के चयन पर सवाल उठाये. उन्होंने कहा कि उनका इस्तेमाल दूसरों को अपमानित करने, असहज करने के लिए किया गया. https://twitter.com/PTI_News/status/1925080942969802858

  बयान की समीक्षा पर कोर्ट की टिप्पणी

वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने प्रोफेसर की ओर से दलील पेश करते हुए कहा कि जिस पोस्ट के आधार पर उनके खिलाफ आपराधिक केस दर्ज किया गया है, वह देशभक्ति से भरा हुआ है.

जब कोर्ट ने पूछा कि यह बयान कहां प्रकाशित हुआ था, तो सिब्बल ने बताया कि इसे पहले इंस्टाग्राम और फिर फेसबुक पर साझा किया गया था. इसके बाद उन्होंने कोर्ट के सामने वह बयान पढ़ना शुरू किया.

सिब्बल ने कहा कि मीडिया में कराची और लाहौर पर कब्जे की खबरें चल रही थीं, उन्हीं के संदर्भ में प्रोफेसर ने टिप्पणी की थी. इस पर जस्टिस कांत ने कहा कि पोस्ट में प्रोफेसर ने युद्ध के प्रभावों की चर्चा की, खासकर सैनिकों के परिवारों पर पड़ने वाले प्रभावों की, लेकिन बाद में यह पोस्ट राजनीति की ओर मुड़ गया.

सिब्बल ने स्पष्ट किया कि प्रोफेसर ने यह बात दक्षिणपंथी टिप्पणीकारों को संबोधित करते हुए कही थी और उन्होंने पोस्ट का समापन जय हिंद के साथ किया. उन्होंने यह भी कहा कि पोस्ट में किसी प्रकार का आपराधिक इरादा नहीं था, बल्कि यह एक नागरिक की राय थी.

इस पर जस्टिस कांत ने टिप्पणी की कि यह एक राय है. हर किसी को अपनी राय रखने का अधिकार है, लेकिन यह भी जरूरी है कि जब आप कोई सार्वजनिक टिप्पणी करते हैं, तो भाषा में संतुलन और संवेदनशीलता बरती जाए.

सिब्बल ने अंत में प्रोफेसर के एक और बयान को पढ़ते हुए बताया कि उन्होंने कहा था कि सीजफायर हो चुका है, लेकिन कुछ लोग अभी भी युद्ध की वकालत कर रहे हैं.

इस पर कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार की टिप्पणियों को देशद्रोह के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए, जब तक कि उसमें कोई स्पष्ट आपराधिक मंशा न हो. कोर्ट ने यह भी माना कि यह एक संवेदनशील मामला है और इसके सभी पक्षों की जांच जरूरी है. इसके बाद कोर्ट ने प्रोफेसर अली खान को अंतरिम जमानत दे दी.

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