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SC ने उमर खालिद को जमानत नहीं देने पर अपनी ही बेंच पर आपत्ति जताई, याद दिलाया, जमानत नियम है और जेल अपवाद

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने आज सोमवार को सैयद इफ्तिखारअंद्राबी की जमानत याचिका मंजूर करते हुए एक अहम टिप्पणी की. अंद्राबी कथित नार्को-आतंकवाद के एक मामले में UAPA के तहत 5 साल से ज्यादा समय से जेल में बंद हैं.
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 New Delhi : सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने आज सोमवार को सैयद इफ्तिखारअंद्राबी की जमानत याचिका मंजूर करते हुए एक अहम टिप्पणी की. अंद्राबी कथित नार्को-आतंकवाद के एक मामले में UAPA के तहत 5 साल से ज्यादा समय से जेल में बंद हैं.

 

SC की इस बेंच ने पूर्व में एक अन्य डिवीजन बेंच द्वारा दिये गये उस फैसले पर भी गंभीर आपत्ति जताई, जिसमें दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद की जमानत याचिका रद्द कर दी गयी थी.  

 

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने कहा कि जमानत एक नियम है और जेल एक अपवाद, यह सिद्धांत UAPA जैसे विशेष कानूनों के तहत भी लागू होता है. कहा कि एक डिवीजन बेंच बड़ी बेंचों के फैसलों से बंधी होती है.

 

उदाहरण दिया कि नजीब मामले में तीन जजों की बेंच ने एक फैसला दिया था. इसमें कहा गया था कि किसी आरोपी को अनिश्चित काल तक हिरासत में नहीं रख सकते.

 

एक डिवीजन बेंच उस फैसले के कारण बाध्यकारी है. जस्टिस भुइयां ने कहा,  नजीब फैसले के संदर्भ में कहा कि समय बीतने से कोई आरोपी अपने आप रिहाई का हकदार हो जाता है. 


 
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने आगे कहा कि स्वतंत्रता का अधिकार महज एक वैधानिक नारा नहीं, बल्कि यह एक संवैधानिक प्रावधान है. इसका हर हाल में पालन होना चाहिए.

 

बेंच ने जनवरी के उस फैसले पर भी आपत्ति की,  जिसके तहत उमर खालिद और शरजील इमाम को एक साल तक जमानत की मांग करने पर भी रोक लगा दी गयी थी. 

 


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