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सेमेस्टर अलग, मगर कमरा एक ही,ऐसा है रांची विश्वविद्यालय का हाल

राज्य के विश्वविद्यालयों में जनजातीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की बात तो खूब होती है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है. मोरहाबादी स्थित रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय भाषा विभाग की व्यस्था चिंताजनक है. यहां एक ही कमरे में दो-दो क्लास चलाई जा रही हैं.
 

Ranchi : राज्य के विश्वविद्यालयों में जनजातीय भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की बात तो खूब होती है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है. मोरहाबादी स्थित रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय भाषा विभाग की व्यस्था चिंताजनक है. यहां एक ही कमरे में दो-दो क्लास चलाई जा रही हैं. यहां पांच जनजातिय हो,संथाली और खड़िया भाषाओं की पढ़ाई करायी जाती है. सभी भाषाओं का अपना शैक्षणिक कमरा है. लेकिन तीन जनजातिय हो,खडिया और संथाली भाषाओं की पढ़ाई एक ही कमरे में करायी जा रही है.


दरअसल उपरोक्त तीनों भाषाओं की दो सेमेस्टर (सेमेस्टर 1 और 4) की पढ़ाई एक ही कमरे में हो रही है. जो सही नहीं है. चूंकि खेत में धान रोपाई का काम चल रहा है, जिससे कई छात्र क्लास के लिए नहीं आते तो ऐसे में फिलहाल काम चल जा रहा है. विभाग के पास पर्याप्त कक्षा नहीं है. सेमेस्टर वाइज कक्षा आवंटन तो दूर की बात, एक ही कमरे में अलग-अलग सेमेस्टर की कक्षाएं एक साथ संचालित हो रही हैं. इससे छात्र पढ़ाई पर पूरा द्य़ान भी नहीं दे पा रहे हैं. इससे छात्र-छात्राओं को असुविधा हो रही है.

 

पढ़ाई पर पड़ रहा है असर

छात्रों ने बताया कि खड़िया,हो और संथाली भाषा की दो कक्षाएं एक साथ चलती हैं. इसकी वजह से न तो शिक्षक ढंग से पढ़ा पा रहे हैं, न ही विद्यार्थी ठीक से समझ पा रहे हैं. शोरगुल और जगह की कमी से शैक्षणिक माहौल प्रभावित हो रहा है. यहां पर छात्रों के लिए आडोटोरियम भी बनाया गया है. लेकिन इसमें भी मूलभूत सुविधा का अभाव है.

 

विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग


विश्वविद्यालय के विभागाध्यक्षों ने बताया कि विश्वविद्यालय प्रशासन से कई बार मांग की गई है. लिखित आवेदन भी दिए जा चुके हैं. मगर कॉलेज प्रशासन रजिस्टर के पन्नों तक ही समिति हो गया है. जिससे कॉलेज का विकास भी नहीं हो पा रहा है.छात्रों की मांग है कि जनजातीय भाषाओं की पढ़ाई के लिए पर्याप्त कक्षों की व्यवस्था की जाए ताकि इन भाषाओं की पढ़ाई गुणवत्तापूर्ण तरीके से जारी रह सके.

 

 

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