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सभ्य समाज के लिए गंभीर चेतावनी

 
Braj Bhushan Pandey उत्तर प्रदेश में हाथरस के समीप एक गांव में अवस्थित एक दो मंजिले आवासीय विद्यालय में घटी रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना ने देश के जनमानस को झकझोर कर रख दिया. इस घटना में स्कूल के बीटेक पास संचालक दिनेश बघेल ने अपने स्कूल के ही एक नौ साल के कृतार्थ नामक मासूम बच्चे की बलि चढ़ा दी. अंधविश्वासी हत्यारों ने उसे छात्रावास के एक कमरे से उस समय उठा लिया, जब वह गहरी नींद में सो रहा था. उसे बलिवेदी की ओर ले जाया जा रहा था, तभी उसकी नींद टूट गयी और उसने शोर मचाने की कोशिश की तो वहीं उसे गला घोंट कर मार डाला गया. कृतार्थ के माता-पिता और पुलिस की सक्रियता के कारण कृतार्थ का शव संचालक की कार से उस समय बरामद हो गया, जब वह शव को ठिकाना लगाने जा रहा था. पुलिस अनुसंधान से पता चला है कि ऐसी घृणित सलाह संचालक को उसके तांत्रिक पिता जशोधन सिंह ने दी थी. उसने उसे समझाया था कि बच्चे की बलि देने से उसके स्कूल की दिन दूनी-रात चौगुनी तरक्की होगी. यह उस स्कूल की पहली घटना नहीं थी. इससे पूर्व भी एक बच्चे की बलि देने का प्रयास किया गया था. छात्रावास में सो रहे उस बच्चे को इसी प्रकार उठाया गया था, लेकिन बलिवेदी तक पहुंचने के पहले ही उसकी भी नींद टूट गयी थी और वह बच्चा शोर मचाने में सफल हो गया था. इस प्रकार उसकी जान बच गयी थी. वरना, कृतार्थ से पहले उस बच्चे को भी अंधविश्वास के कारण जान गंवानी पड़ती. इस प्रकरण में सबसे शर्मनाक बात यह है कि स्कूल का संचालक जो अच्छा-पढ़ा लिखा था, वह इतना बड़ा अंधविश्वासी निकला कि स्कूल की तरक्की के लिए अपने स्कूल के बच्चों को ही बलि देने जैसे दुस्साहसिक कुकृत्य पर उतारू हो गया. आम तौर पर यही समझा जाता है कि अंधविश्वास की चपेट में अनपढ़-गंवार ग्रामीण ही होते हैं, लेकिन इस स्कूल के संचालक ने इस मिथक को तोड़ दिया. अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए पढ़ा-लिखा शिक्षित कहा जानेवाला व्यक्ति भी अंधविश्वास में इतना नीचे गिर सकता है. निश्चित रूप से उसमें मानवता नाम की कोई चीज नहीं होगी. उसका विवेक मर चुका होगा. परिणाम क्या हुआ, आज खुद पूरे परिवार के साथ संचालक भी नाश के कगार पर खड़ा है. उसके स्कूल से ऐसी दो ही घटनाओं की चर्चा है, लेकिन इससे भी पूर्व कोई ऐसी घटना नहीं हुई हो, यह कैसे समझा जा सकता है? पुलिस की कार्रवाई और कानूनी प्रक्रिया में संभव है कि और चौंका देनेवाले खुलासे हों. पता नहीं इस प्रकार के और कितने कृकृत्य देश और समाज में हो रहे होंगे, जो प्रकाश में आ भी नहीं पाये. न जाने कितने मासूमों को इस अंधविश्वास ने अपना निवाला बना लिया होगा. भारतीय संस्कृति में भक्ति, श्रद्धा और विश्वास को बहुत महत्व दिया गया है. भक्ति चंचल मन और इंद्रियों को नियंत्रण में रखनेवाला सबसे सशक्त माध्यम है. यह बताती है कि सर्वशक्तिमान ईश्वर से डरो. ऐसा कोई काम न करो कि जिससे ईश्वर को कष्ट हो और वे तुम्हें दंडित करें, लेकिन भक्ति यदि ईश्वर के प्रति न होकर शैतानों के प्रति होती है तो वह अंधी हो जाती है और अनर्थों का जन्म होता है. इसी प्रकार श्रद्धा और विश्वास की तुलना तो गोस्वामी तुलसीदास ने भवानी और शंकर से की है-भवानी शंकरो वंदे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ. आदर्श जीवन में श्रद्धा और विश्वास की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण होती है. विश्वास जब विकृत हो जाता है, तब वह अंधविश्वास में परिणत हो जाता है, जो बहुत ही अनर्थकारी है. यहां विचारणीय है कि जब हम अपने बच्चों को हर दिन स्कूल भेजते हैं तो यह उम्मीद और आशा रखते हैं कि वे सुरक्षित और पोषण वाले माहौल में होंगे. माता-पिता के रूप में, हम भरोसा करते हैं कि शैक्षणिक संस्थान न केवल अकादमिक शिक्षा प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, बल्कि एक सुरक्षित आश्रय भी हैं, जहां हमारे छोटे बच्चे जीवन-पथ पर आगे बढ़ सकते हैं, खोज कर सकते हैं और सामाजिक और भावनात्मक रूप से विकसित हो सकते हैं. हमारा मानना है कि स्कूल ऐसी जगहें हैं, जहां हमारे बच्चे नुकसान से सुरक्षित रहेंगे, उनके आस-पास देखभाल करने वाले शिक्षक और कर्मचारी होंगे जो उनकी भलाई और सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं. यह सोच कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि जिस स्कूल में हम अपने बच्चों को नए कौशल, ज्ञान तथा अनुभव से परिपूर्ण अच्छा इंसान बनाने और महफूज रखने की चाह में भेजते हैं, उसी स्कूल में इस तरह के दरिंदे भी रहते हैं, जो बच्चों को केवल ‘बलि का बकरा’ समझते हैं. फिर भी हाथरस के कृतार्थ बलिकांड से यह सवाल तो उठता ही है कि आखिर इस मासूम की नृशंस हत्या की जिम्मेदारी किसकी है? उस स्कूल के संचालक की? उसके तांत्रिक पिता की? या उसके माता-पिता की जिन्होंने बिना छानबीन किये, बिना अच्छी तरह जानकारी लिये अपना लाड़ला उस हत्यारे के हाथों सौंप दिया? या पूरे समाज की, जो ऐसी मंशा रखनेवालों पर गौर करना जरूरी नहीं समझता? कृतार्थ बलिकांड सभ्य समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है, क्योंकि अंधविश्वास सामाजिक कोढ़ है और इसका इलाज भी समाज के पास ही है. कानून अपना काम कर रहा है. कृतार्थ की नृशंस हत्या करनेवालों को उनके किये की सजा मिलेगी, लेकिन अंधविश्वास के खिलाफ तो समाज को ही खड़ा होना होगा. डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. [wpse_comments_template]
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