alt="शिबू मेहता उर्फ शिव कुमार मेहता" width="99" height="132" /> शिबू मेहता उर्फ शिव कुमार मेहता[/caption] जेल के अंदर की यह कहानी कटकमसांडी के पबरा निवासी शिबू मेहता उर्फ शिव कुमार मेहता की जुबानी ‘शुभम संदेश’ पाठकों तक पहुंचा रहे हैं. शिबू मेहता वर्ष 2017 में हजारीबाग सेंट्रल जेल में बंद थे और वह पांच साल के बाद 2022 में रिहा हुए. उन्होंने बताया कि उनके पास उतने पैसे नहीं थे, इसलिए सामान्य वार्ड में रहते थे. लेकिन उन्होंने देखा कि जेल में रसूखदार बंदियों के लिए हर सुविधाएं मौजूद है. उनके ठाठ से रहने से लेकर मनपसंद भोजन तक की व्यवस्था है. यहां तो बड़ी-बड़ी राजनीतिक हस्तियों के ठहरने के लिए विशेष वार्डों को भी किराए पर लगा दिया जाता है. पैसेवाले रसूखदार बंदी इन वार्डों में ठहरते हैं, जहां एशो-आराम की हर सुविधाएं दी जाती है. यहां से मिलनेवाले किराए की बंदरबांट अधिकारियों से लेकर जेलकर्मियों तक होती है. यह सबकुछ केंद्रस्थल पर तय हो जाता है. वहीं उसे उन बंदियों को विशेष वार्डों में भेज दिया जाता है. आम बंदियों को बाथरूम के बगल गंदगी वाले वार्ड में जगह नसीब होती है. साधारण वार्डों में जानबूझकर गंदगी छोड़ दी जाती है, ताकि बंदी विशेष वार्ड में जाने की अपनी इच्छा जाहिर करें और फिर उनसे मनमानी रकम वसूली जा सके. जेल में हर तरह का खेल चलता है, बस पैसे रहने चाहिए. इस पूरे प्रकरण में जेलकर्मियों से लेकर अधिकारियों तक का मेल-मिलाप रहता है.
केस-1 : भोजन में भी किया जाता है भेदभाव
जेल से छूटकर आए कटकमसांडी के पबरा निवासी शिबू मेहता उर्फ शिव कुमार मेहता ने बताया कि यहां बंदियों को मिलनेवाले भोजन में भी भेदभाव किया जाता है. जेल में ठेकेदार भोजन बनवाता है. ठेकेदार से कमीशन लिया जाता है. इसलिए बंदियों को घटिया भोजन कराया जाता है और वही पैसे बचाकर कमीशन चुकाया जाता है.केस-2 : कैंटीन में भेज दिए जाते हैं बंदियों को मिलनेवाली खीर के दूध, दाल का भी है वही हाल
जेल से छूटे इचाक के एक बंदी ने बताया कि जेपी केंद्रीय कारा हजारीबाग में मेन्यू के अनुसार बुधवार को शाकाहारी बंदियों के लिए खीर देने का प्रावधान है. लेकिन बंदियों को नाम का खीर दिया जाता है. पूरा का पूरा दूध कैंटीन में सप्लाई कर दिया जाता है. वहां 50 रुपए लीटर के हिसाब से दूध को बेचा जाता है. जिन बंदियों के पास पैसे हैं, वह दूध पीते हैं, नहीं तो अन्य कैदी जेल प्रशासन की ओर से मिले भोजन के भरोसे ही रह जाते हैं. यहां दाल का भी वही हाल है. दिखने में पीला और सिर्फ पानी यानी पतला दाल दिया जाता है. ऐसे में बंदी खाना पसंद नहीं करते हैं और मजबूरी में पैसे खर्च कर चूल्हे की बोली लगाते हैं. फिर चूल्हे खरीदकर उसमें वह अपना मनपसंद भोजन पका पाते हैं. ऐसे में जेल के अंदर चूल्हे का व्यवसाय खूब फल-फूल रहा है. साथ ही सरकारी पैसे का भी गबन किया जा रहा है. इसे भी पढ़ें : ‘शुभम">https://lagatar.in/shubham-sandesh-investigation-jail-workers-make-prisoners-talk-by-hiding-mobile-in-shoes/">‘शुभमसंदेश’ पड़ताल : जूते में मोबाइल छिपाकर जेलकर्मी कराते हैं बंदियों को बात [wpse_comments_template]

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