मिथिला का जुड़ शीतल
alt="" width="600" height="400" /> सूर्य के गमन के अनुसार साल में चार संक्रांति आते हैं. मकर संक्रांति के साथ हमें गरमी की तरफ कदम बढ़ाते हैं, जब सूर्य मकर राशि से विषुवत रेखा की ओर उत्तर दिशा को गमन करता है. वही सूर्य जब विषुवत रेखा से आगे उत्तर की ओर और बढ़ता है तो मेष संक्रांति के साथ सतुआन प्रचंड गरमी के आगमन की सूचना देता है. सतुआन को वैशाखी, स्नान दान अमावस्या, बिहार और नेपाल के मैथिली भाषी क्षेत्र में इसे जुड़ शीतल कहते हैं. सतुआन में रबी फसल आने की खुशी मनाते हैं और जौ के सत्तू, गुड़, आम के टिकोरा भगवान को अर्पित करते हैं तथा छाता और पंखा दान करते हैं. बिहार में विशेषरूप से मिथिला और तिरहुत प्रमंडल में पारंपरिक रूप से मिट्टी, पानी आदि से सामूहिक खेल होता है. बड़े बुजुर्ग छोटों के सिर पर सुबह-सबेरे पानी देकर थपथपाते हुए शीतलता के साथ जीवन यापन का आशीष देते हैं. बाट यानि राह में पानी का छिड़काव व सफाई करते हैं. टिकोले की चटनी, कढ़ी-बड़ी, तरुआ जैसे व्यंजन बनते हैं. हालांकि इन्हें बासी खाया जाता है. जुड़शीतल के दिन चूल्हा नहीं जलाने की परंपरा है. तालाब में जलकीड़ा एवं उसकी सफाई का उत्सव मनाया जाता है. नई फसल होने पर पहले पुरोहित को आज भी अंगऊ या अंगऊआ (खलिहान से अनाज की राशि से निकाला गया अन्न) दिया जाता है.
समरसता का त्यौहार
alt="" width="600" height="400" /> भारतीय खाद्य पदार्थ में अनेक व्यंजन हैं लेकिन इनमें सत्तू और खिचड़ी अद्भुत हैं. इसकी खूबी है कि इसे अमीर भी बनाते हैं और गरीब भी आनंद लेकर खाते हैं. सतुआन का महत्व क्या है? इसे वैशाख-ज्येष्ठ की लू से झुलसते और भूख से तड़पते व्यक्ति से जानिए. गरमी में सत्तू अमृत है, जो सरदी में खिचड़ी संजीवनी है. खिचड़ी केवल नमक और हल्दी लगाकर बना लें या पानी और नमक मिलाकर सत्तू पी लें. अगर अमीर हैं तो सत्तू में घी डालते जाईये, यह सोखता जाएगा. उसी प्रकार खिचड़ी में केसर, जाफरानी से लेकर जितना महंगा भोज्य पदार्थ डालिए और स्वाद बढ़ाते जाईये. आज भी गांव देहात में चलने वाला राहीगर हो या भिक्षुक हो, दिन में सत्तू घोल लेता है और रात को खिचड़ी बना लेता है. भारतीय जीवन ने सत्तू के साथ खूब प्रयोग किया. हम सत्तू, बाटी टिक्कड़ के अनगिनत रूपों को विकसित किए हैं. बाटी, ढूंढी, लिट्टी, भौरी, चूरमा, पिठा, मकुनी, पराठा, भरवा पराठा, सत्तू पराठा, सत्तूबाटी आदि अनेक रूपों में सत्तू के व्यंजन विकसित हो गये हैं, लेकिन मजा और आनंद जो पिंड और भर्जन यानी पेय रूप में है, वह कहीं नहीं है. ऋग्वैदिक कालीन ऋषियों का सत्तू-आटा मुख्य भोज्य पदार्थ रहा है. अन्न के माध्यम से स्थूल नहीं सूक्ष्म शक्ति को ग्रहण करने रहस्योबोध वैदिक ऋषियों ने खिचड़ी और सत्तू के उपयोग में ही ढूंढ़े थे. वर्णन है कि वाजयन्तः वाजं जयेम. सायणाचार्य ने इसका अर्थ किया कि हम अन्न को पकाते हुए अन्न को विजीत करते हैं. भोजपुरी में विज्जे का उपयोग शक्ति के आरोहण से किया जाता है. कदाचित इसी कारण हिंदी भाषी क्षेत्रों में सतुआन और खिचड़ी जैसे प्रकृति पर्वों का आनंद और उत्साह अलग ही होता है. सतुआन जैसे पर्व में एक संतोष दिखता है, जो जीवन को सरलता के साथ सशक्त एवं फक्कड़ बनाता है. यह जीवन की कठोरता से ग्रीष्म की तरह संघर्ष का साहस देता है. साधना के तप में बढ़ने को तैयार करता है.
ऋषियों का सत्तू-आटा रहा मुख्य भोज्य पदार्थ
alt="" width="600" height="400" /> वैदिक ऋचाओं के कई सूक्तों में सत्तू का वर्णन आता है. वैदिक ऋषिका अपाला इंद्र से रूप और यौवन की प्रार्थना करती है- हे इंद्र, भुने जौ का सत्तू है, पुरोडाश है तथा मेरे दांतों द्वारा अभिुषत यानी घोंटा गया सोम है. भोज्य पदार्थ के माध्यम से शिक्षा और ज्ञान की बात भी बतायी जाती है. एक सूक्त में कहा गया है कि जैसे चलनी से सत्तू को परिष्कृत किया जाता है, वैसे ही बुद्धि से भाषा को परिष्कृत करके बोलते है. इसी प्रकार ऋग्वेद की एक ऋचा (6.29.4) में कहा गया है कि भूने हुए जौ हवि के लिए संस्कृत किये जाते है. यहां संस्कृत का अर्थ छांटने और पसारने से है. सत्तू के कई प्रकार से भोजन में उपयोग के वर्णन की कथाएं भी ऋग्वैदिक काल से चली आ रही है. ऋग्वेद के प्रथम में पितु यानी अन्न की उपासना की गयी है. ऋग्वेद के प्रथम मंडल के नौ मंडल में जौ और दुग्ध मिश्रित कर खाने का वर्णन है. दसवें में करंभ यानी सत्तू का पिंड बनाकर खाना ऋषियों के लिए प्रिय भोजन था. सत्तू को लोंदे या पिंड बनाकर खाने की परंपरा आजतक चली आ रही है. इस प्रकार एक मंत्र (मं0 90/112) में कहा गया है कि जौ के सत्तू को मीठे घोल में लबरी बनाकर चाटते थे. ऋषि पवमान सोमदेव से प्रार्थना करते हुए सत्तू के घोल बनाने की विधि बताते हैं- सोम और जौ को मिलाया जाता है और ये अंगुलियों से समागम पाते हैं. वैदिक ऋषियों को आटा बनाना पता था. वे लोग जौ को भूनकर धाना यानी चबेना बनाना भी जानते थे. इसके अलावा सत्तू को घोलकर पीना उनका प्रिय पेय था. इसी कारण ललित निबंधकार कुबेरनाथ राय आर्य संस्कृति को आटा- सत्तू संस्कृति कहकर पुकारते हैं. वैदिक ऋषियों का सत्तू को लेकर एक प्रसिद्ध कथन था- चरैवन्मधु विन्दति. यानी चलने वाला ही मधु प्राप्त करता है. ऋषियों का सत्तू को लेकर एक प्रसिद्ध कथन था- चरैवन्मधु विन्दति. यानी चलने वाला ही मधु प्राप्त करता है. कदाचित सत्तू का मानसिक एवं शरीरिक विकास के साथ सामाजिकता में सूक्ष्म योगदान के कारण ही भारतीय लोग प्राण, रस, मेधा और बल के उपासक बने रहे. इसे भी पढ़ें: चांडिल">https://lagatar.in/chandil-tribute-paid-to-dr-bhimrao-ambedkar/">चांडिल
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