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सिमडेगाः जलडेगा के उप स्वास्थ्य केंद्रों में ताला और झोलाछाप डॉक्टरों का खेल

सिविल सर्जन ने कहा कि यदि कहीं भी उप स्वास्थ्य केंद्र बंद मिलने या स्वास्थ्य कर्मियों की लापरवाही सामने आने पर तुरंत इसकी जानकारी दी जाए. संबंधित सीएचओ, एएनएम या अन्य कर्मियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी.
 

Simdega : सिमडेगा जिले के जलडेगा प्रखंड में स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है. इससे ग्रामीण खासे नाराज हैं. भाजपा नेता रामेश्वर सिंह की मौत के बाद गुरुवार को प्रदर्शन के दौरान ग्रामीणों ने स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर सवाल उठाए. सिविल सर्जन डॉ. सुंदर मोहन सामद व जलडेगा के बीडीओ के सामने ग्रामीणों ने शिकायतें रखीं.

 

ग्रामीणों ने बताया कि प्रखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित कई उप स्वास्थ्य केंद्र अक्सर बंद रहते हैं. ड्यूटी के समय भी कई बार सीएचओ, एएनएम व अन्य स्वास्थ्य कर्मी केंद्र में ताला लगाकर अनुपस्थित रहते हैं. इसके कारण ग्रामीणों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता और उन्हें मजबूरी में निजी अस्पतालों में पैसे खर्च कर इलाज कराना पड़ता है.

 

लोगों का कहना था कि यदि उप स्वास्थ्य केंद्र नियमित रूप से खुले रहें और वहां स्वास्थ्य कर्मी मौजूद रहें, तो लोगों को समय पर इलाज मिल सकता है और उन्हें निजी अस्पतालों का सहारा नहीं लेना पड़ेगा. इस पर सिविल सर्जन ने कहा कि यदि कहीं भी उप स्वास्थ्य केंद्र बंद मिलने या स्वास्थ्य कर्मियों की लापरवाही सामने आने पर तुरंत इसकी जानकारी दी जाए. संबंधित सीएचओ, एएनएम या अन्य कर्मियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी.

 

 

उन्होंने बताया कि कई बार टीकाकरण के दिन स्वास्थ्य कर्मियों को गांवों में जाकर टीकाकरण का कार्य करना पड़ता है. इस कारण उप स्वास्थ्य केंद्र में ताला लगा रहता है. हालांकि, उन्होंने निर्देश दिया कि अब यदि कोई भी स्वास्थ्य कर्मी किसी कार्य से केंद्र से बाहर जाता है, तो उसे केंद्र के बाहर नोटिस लगाना अनिवार्य होगा. नोटिस में यह लिखना होगा कि वह किस काम से बाहर गया है. संपर्क के लिए अपना मोबाइल नंबर भी देना होगा.

 

इस दौरान प्रखंड में झोलाछाप डॉक्टरों द्वारा किए जा रहे अवैध इलाज का मामला भी सामने आया. सिविल सर्जन ने कहा कि प्रखंड में किसी भी झोला छाप डॉक्टर को मरीजों को स्लाइन चढ़ाने या किसी प्रकार का इलाज करने का लाइसेंस नहीं दिया गया है. लोगों को ऐसे अवैध इलाज से बचने की जरूरत है. कई बार झोला छाप डॉक्टरों से इलाज कराने के बाद मरीजों की स्थिति और बिगड़ जाती है. 


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